डॉ. सांत्वना श्रीकांत की 6 कविताएं

डॉ. सांत्वना श्रीकांत

स्त्रीशिखर पर मिलूंगी मैं तुम्हें,विमुख तुम्हारे मोह से,प्रतिध्वनियों से तिरस्कृत नहीं,तुमको अविलंब समग्र समर्पण के लिए।मुक्त, बंधन इन शब्दों से परे, बुद्ध की मोक्ष प्राप्ति औरयशोधरा की विरह वेदना के शीर्ष पर स्थापित होगा शिखर।पहले चरण में-समर्पित करती हूं अपनी देह,जिसे तुम नहीं समझतेपुरुष होने के अहंकार में। दूसरे चरण में-समर्पित करती हूं अपना अहम, जो तुम्हें स्वीकार्य नहीं। तीसरे चरण में-समर्पित करती हूंअपना चरित्र।स्त्री चरित्र तुच्छता का रूपक है,पूर्वजों ने कहा तुमसे।मैंने तो मुक्त किया है स्वयं को,उसी ‘मुक्तिबोध’ के साथ,मिलूंगी मैं तुम्हें शिखर पर,जब तुम तीनों पुरुषार्थजी चुके होगे।अंतिम पुरुषार्थ के आरंभ मेंमिलूंगी मैं तुम्हें शिखर पर। पुरुषजिजीविषा मुझमें तुम्हारे कारण,बंधनों से मुक्त समर्पणतुमसे ही, तुम्हारे कारण,कल्पनाएं मेरीअविरल नदी सी,बहती तुम सागर में मिलती। सुनो मेरे पुरुष…….। बिछोह से घबरातीशून्य से तुम्हारे भावों मेंटोह लगाए हुए,श्रृंगार में ढूंढ़ती,सुनो मेरे पुरुषसुन रहे हो न तुम!स्वीकारा है मेरे नारीत्व नेतुम्हारा पुरुषत्व,मैं दासी नहीं, स्वामिनी हूंइस पुरुषत्व की।भूलना नहीं तुम यह,तुम्हारा ये पौरुष है न,यह मेरी वजह से ही है,सुनो मेरे पुरुष…..।आलिंगन की बाट जोहती,स्वयं ही सौंदर्य निहारती। कभी तो बदलेगी तुम्हारे भावों की मुद्राएं। तुम नहीं समझोगे,मेरे ब्रह्मांड का,आदि और अंत तुम ही। अतिशयोक्ति नहीं है यह,सुनो मेरे पुरुष…….।तुम्हारी हथेलियों की गरमाहट मेंपिघलता है मेरा यौवन।पूछता है- कब तुम सीमाएं लांघ कर, मुझमें मिल जाओगे।कब होगी स्तब्धता मेरी चंचल,कब होगी मेरी अधरों कीतृषा निवृत्त।सुन रहे हो न तुम…….।   पितृ स्मृति दीवार पर टंगी तस्वीरमेरे पिता की,और उस पर चढ़ी माला,खूंटी पर टंगी उनकी शर्ट,घड़ी जो आसपास ही पड़ी होगी,उनके न होने की कमी पूरी नहीं करती।नहीं कहती मुझे-क्या प्रतिउत्तर दूं,समय को,जो हर दशा में….पिता के न होने का जवाब मांगता है। मैं तो महसूस करती हूंअपनी गंभीर मुद्रा में उन्हें,जब मैं बचकानी बातेंनहीं कर रही होती हूं,तब भी,और तब भी,जब अपनी मां का हाथ थामसमझा रही होती हूं कि – मैं ही तुम्हारा हमसफर हूं।नहीं निभा पाती मैंअपने पिता के सारे किरदार,उस जगह तो बिलकुल भी नहीं,जब मैं पुत्री होती हूंऔर मुझे पिता कीअंगुली पकड़ करचलने का मन होता है।   पिता की आखिरी सांस  जब आखिरी सांस ली होगी,मेरी सुध तो की होगी।आंखें मूंदने से पहले,धप्प से गिरे होंगे मेरे सपनेउनके पांवों पर,फिर भींच कर आंखें सोचा होगा,अब मैं जन्म दूंगाएक स्त्री को, जो जन्म लेगी मेरी मृत्यु के बाद।जिम्मेदारियों से जब ढेप लेगी नैराश्यऔर बदलेगी लोगों केअपनेपन की परिभाषा,फिर वह स्त्री शिशु सेयुवा हो जाएगी।  जीवन संघर्षों में उलझती हुई वह,सुलझी हुई नारी होगी।गढ़ेगी वह स्त्री,मर्यादाओं के नए बंधन।फिर वह जन्म देगीअपने पिता की आकांक्षाओं कोएक नए शिखर पर।  वह आदमीकुछ वक्त पहले,जो उन्मुक्तता की बातें किया करता था,किस उधेड़बुन में है आज।कोई शब्द तराशा होगाया कोई रिश्ता!सम्मोहित कर रहा होगाकिसी स्त्री को,या फिर-अलंकृत कर रहा होगाकोई सौंदर्य। मुखरित हो रही होगीअलौकिकता भावों की।कोई बंधन ही गढ़ रहा होगाअपनी उन्मुक्तता का,क्या पता,क्या कर रहा होगावह आदमी।  सफरनामाऊंघता, दौड़ता और चिल्लाताअजनबियों में अपनापन ढूंढ़ता सफर।एकाकी मील के पत्थरों से गुजरतानई मंजिलें बनाता,बिगाड़ता सफर,संकेतों से उलझता,खामोशियों से कहता हुआ सफर,काफिला ठहरताऔर-फिर चल पड़ताजिंदगी का सफरनामा।

5 comments

  1. डॉ सांत्वना जी कवितायें पढ़ी लगा कि कुछ पढ़ा है
    नये संदर्भों और नये विचारों में रची बसी ये कवितायें
    मन को मथती हैं और बहुत भीतर तक कुरेदती भी हैं
    बहुत अच्छी कविताओं के लिए बधाई
    सादर

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