सरला माहेश्वरी की पांच कविताएं

डरना मना है

मत कहो कि
तुम्हें
ये सब देखकर लगता है डर
मत कहो कि
तुम्हें
कुछ कहते लगता है डर
मत कहो कि
तुम्हें
कुछ लिखते
कुछ सोचते
कुछ खाते
कुछ पहनते
प्रेम करते
इस तरह मरते
लगता है डर

यह काम का समय है
विकास का समय है
इस समय डरना मना है

तुम्हारा डरना
एक सुनियोजित साज़िश है
इस समय के खिलाफ
इस विकास के खिलाफ
उनके खिलाफ

तुम्हारा डर
डराता है उन्हें
इसलिये डरना मना है।

तुम्हारी दी हुई वो फिरन

ओ मेरे कश्मीरी भाई
ले ले मेरी इन आँखों को
इन्हीं आँखों ने देखे थे
तुम्हारे चाँदी के पहाड़
वो दूध की नदियाँ
वो फूलों से ख़ूबसूरत चेहरे
वो केसर के महकते खेत
वो डल झील पर तैरते सपनों के घर !
ये कल की नहीं
जैसे अभी की बात है
वो सोनमर्ग की पहाड़ी पगडंडी
वो घोड़े को सचेत करती
तुम्हारी होश होश की घंटी
वो बारिश की झड़ी
ठंड से काँपती मेरी देह
और तुम्हारे हाथों ने
मुझे पहना दिया था
उतार कर अपना फिरन
मेरे मना करने पर भी तुम नहीं माने
तुमने कहा था
तुम्हें तो आदत है !
आज भी नहीं उतार पाई तुम्हारी उस फिरन को
नहीं उतार पाती, कभी नहीं उतार पाऊँगी !

ओ मेरे भाई
ले लो मेरी इन आँखों की रोशनी
गोलियों से छलनी कर दो मेरा चेहरा, मेरा पूरा शरीर !
ओह तुम्हारी वो बेबसी
“हमारी ये जन्नत बहुत बदनाम हो गयी
हम पर दाग लग गया !”

ओ मेरे कश्मीरी भाई !
छीन ले मेरी भी रोशनाई !
तुम्हारी जन्नत का ये दाग-दाग चेहरा
यह लहूलुहान चेहरा !
नहीं देखा जाता मुझसे !

छोटी सी हँसी

रोते हुए बच्चे को
झुनझुना देकर
कुछ देर तो बहला सकते हो
पर
जब पेट में कुलबुलाती हो
भूख
मारती हो डंक बार बार
वह क़ाबू में नहीं रहता,
ग़ुस्से में हो लाल-पीला
हाथ पटक कर
फेंक देता है तुम्हारा झुनझुना
तुम्हारा जुमला !

तुम
लाख बहलाओ
बदलते रहो एक के बाद दूसरा झुनझुना
चमकाओ जितने भी खिलौने
वो देखता भी नहीं
चीख़-चीख़ कर
कर देता है मुहाल जीना
अपना और तुम्हारा भी

तुम ग़ुस्से में बड़बड़ाते हो
उसकी भूख को कोसते हो
जोर-जोर से थपेड़े मारते हो
कि, किसी तरह थक कर सो जाए
कुछ देर को वो चुप भी हो जाता है
पर भूख को कहाँ नींद आती है
फिर वही रोना, जोर जोर से रोना

और फिर जब कोई
प्यार से लेता है उसे गोद में
सीने से लगा
पिलाता है उसे दूध
बच्चा मुस्कुराता है, खिलखिलाता है
जैसे कोई पहाड़ी नदी
पहाड़ से निकलता झरना !
छोटी सी हँसी, तृप्ती की ख़ुशी
जैसे हो कोई जन्नत
चमकते चेहरे की जन्नत ।

क्षय हो!

सात साल के
एक अफ़्रीकी बच्चे के गले में
फाँसी का फंदा कसने से पहले
वे पढ़ रहे थे बाइबिल …!!!

वे गौरे बेल्जियन थे
सभ्य, सुसंस्कृत, शरीफ़ !!

बच्चे का ग़ुलाम बाप
रात-दिन ख़ून-पसीना बहाकर भी
नहीं पूरा कर पाया था
अपने मालिकों की लालसा !
गेंहूँ की उपज थोड़ी सी कम हुई थी !

अपने औपनिवेशिक
असभ्य दयनीय दास को…
नहीं शिकार को …
इसीलिये वे मार रहे थे !!

बाइबिल नहीं बनती कभी रीबेलियन!

हे यीशू ! क्या तुम उस वक़्त भी यही कह रहे थे…
इन्हें माफ़ करना, ये नहीं जानते ये क्या कर रहें हैं …

हे यीशू !
और इस धरती के सभी प्रभुओं सुनो !
कवि गुरु को शायद रहा होगा थोड़ा सा विश्वास
इसलिये वे तुमसे पूछना चाहते थे
उन्हें क्या तुमने क्षमा कर दिया है ?
उन्हें क्या तुमने प्यार किया है ?

मैं तो नेरुदा के साथ
माच्चु-पिच्चु के शिखर से चिल्ला-चिल्लाकर कहना चाहती हूँ…
सम्पूर्ण पृथ्वी पर सारे बिखरे हुए
मौन अधरों एकत्र हो जाओ
अपने प्राचीन दफ़्न विषाद लाओ…
मुझसे कहो, यहाँ मैं दंडित हुआ
क्योंकि एक रत्न चमकने से शेष रहा…या भूमि
अन्न या पत्थर का अपना अंश समय से न दे पायी !!

आओ मेरे शब्दों और मेरे रक्त के माध्यम से बोलो !

हिमालय की चोटी से बोलो

तुम्हारे धर्म का क्षय हो !
तुम्हारे पाखंड का क्षय हो !!

कोणार्क

कोणार्क में खड़ी
यही सोचती रही
यहाँ इतनी सारी स्त्रियाँ क्यों
और वह भी खुले में
इतनी रोशनी और तपिश के बीच में !

यह एक ख़ास कोण है
पहली किरण को सीधे गर्भस्थल तक ले जाने वाला कोण

और, स्त्रियाँ नाचने लगतीं
गाने लगतीं
उन्मत्त प्रेम करतीं
काम के हर सुख को भोगती
युद्ध के मैदान से लेकर
घर गृहस्थी तक
हर मोर्चे पर डटी रहतीं
पूरे संसार पर राज करतीं

मन में सवाल उठता है
स्त्री स्वातंत्र्य
या स्त्री लीला !

कोणार्क तो इसी लीला की कथा है
गान है जीवन का
स्त्री की मनुष्यता का

हे कोणार्क
तुम जिस प्यार की प्यास हो
वही सचमुच आज
हमारे दर्द की आवाज है

शायद इसीलिये
तुम्हारे गर्भ पर
किसी देवता का शासन नहीं हुआ
तुम तो स्त्रियों का सरताज हो ।

लौटते वक़्त ट्रेन में
बेहद ख़फ़ा था एक भक्त
कोरा खंडहर है
न कोई देवी
न कोई देवता
ऊपर से इतनी कड़ी धूप
क्यों बेकार
इसे मिलता है इतना प्रचार !

कोणार्क
तुम पुरुष की कसौटी हो
इसीलिये तुम
बेहद प्रिय हो !

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1 Response

  1. सुषमा सिन्हा says:

    बेहतरीन कविताएँ !!

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