आनंद क्रांतिवर्धन का व्यंग्य ‘एक गोदी गांव की कथा’

एक समय की बात है, किसी देश में एक गांव था। जैसा कि सब जगह होता है, उस  गांव में भी एक पनघट  था। गांव की गोरियां रोज़ पनघट पर जातीं, हालांकि वे हिंदी फिल्में नहीं देखती थीं, फिर भी पानी भरने से पहले वे पंक्ति बनाकर ,एक दूसरे की कमर में बांहें डालकर नाचतीं, गातीं। एक दूसरे को पानी की बौछार से छेड़तीं, हंसी ठिठोली करतीं और फिर पानी से भरी गागर, कमर के उस स्थान पर रखकर, जिसे ‘ढूंगा’ कहा जाता है, मटकती खिलखिलाती हुई अपने घरों को लौट जातीं ।

विधि का विधान देखिए,एक दिन अपने चुनावी अश्वमेघ यज्ञ पर निकला, अपने सफेद घोड़े को सरपट दौड़ाता, एक राजनेता पनघट के पास से गुज़रा, तो पनिहारिनों  की अठखेलियां देखकर ठगा-सा खड़ा का खड़ा रह गया ।

चुनावी युद्ध में अपने प्रतिद्वंदी को पराजय के घाट उतार, विजयी राजनेता राजधानी तो पहुंच गया लेकिन राजमहल के सुख ऐश्वर्य उसे तनिक न लुभाते  थे।अक्सर वह उदास होकर कोपभवन में चला जाता और आसन -पाटी लेकर वहीं पड़ा रहता । उसकी यह दशा देख उसके सलाहकार चिंतित हो उठे। कौन सी चिंता है जो राजनेता को भीतर ही भीतर खाए जा रही है, यह किसी को समझ न आता। वे सब के सब यह सोचकर चिंतित हो उठते कि यदि राजनेता की यही दशा रही  तो देश का क्या होगा ? राजपाट कौन संभालेगा? वे कोप भवन के द्वार पर खड़े देश की चिंता में घुले जा रहे थे। एक दिन उनके मुंह लगे सलाहकार से रहा न गया। उसने अपनी जान की परवाह न करते हुए राष्ट्र- हित में साहस जुटाकर उनकी इस दारुण व्यथा का कारण पूछ ही लिया, तब कहीं जाकर उनकी उदासी का रहस्य उजागर हुआ।

 सलाहकारों ने गहन मंत्रणा के बाद एक रास्ता निकाला । उन्होंने राजनेता को सलाह दी कि आप उस गांव को गोद ले लें , क्योंकि गांव आपकी गोद में ही रहेगा इसलिए आपको अपना अगाध प्रेम और वात्सल्य उस गांव पर लुटाने से कोई नहीं रोक सकेगा।

उत्साह के मारे गांव ने दुल्हन का -सा श्रृंगार किया है ।चारों दिशाओं में तोरण द्वार बनाए गए हैं।  बैंड -बाजे बज रहे हैं। राजधानी से आए अफ़सर और राजनेता के सलाहकार वॉकी टॉकी लेकर तेजी से इधर से उधर आ जा रहे हैं। अंततोगत्वा प्रतीक्षा की घड़ियां समाप्त हुई ।गांव की गलियों को कालीन के अंग वस्त्रों से सज्जित कर दिया गया था अतः गांव की धूलि राजनेता के जूतों का स्पर्श करने से वंचित रह गई ।

राजनेता ने आते ही गांव को गोद में उठा लिया ।उन्होंने अपनी तर्जनी और मध्यमा उंगलियों से गांव के गालों और होठों को छू कर पूरा वात्सल्य उंडेलते हुए- ‘अले.. ले ..ले ,लू.. लू.. लू ..लू का अनुनाद कर अपने प्रेम की मोहर भी अंकित कर दी।

राजनेता की सुकोमल मखमली गोद में बैठ कर गांव फूला नहीं समा रहा था। दूसरे गांव ईर्ष्या के मारे जलकर मरे जा रहे थे। शाही हरकारा दौड़ता हुआ आया और उसने घोषणा की ,कि जिल्ले इलाही ने झण्डा दिखाकर गांव के सुख और समृद्धि से भरे ट्रकों के कारवां को राजधानी से रवाना कर दिया है जो किसी भी पल उन तक पहुंच सकता है।

 समय गुजरता गया पर सुख और समृद्धि से भरे ट्रक उन तक कभी नहीं पहुंचे।  गांव ने यह सोचकर संतोष कर लिया कि -‘इस बार उद्धव की तरह उनके और उनकी समृद्धि के बीच शायद गूगल आकर खड़ा हो गया है। उसी ने गलत रास्ता दिखा कर उन ट्रकों को कहीं और भेज दिया होगा ।’

राजनेता नियम से तय समय पर डाइनिंग टेबल पर बैठते, छप्पन भोग और सुस्वादु व्यंजनों से भरी अपनी थाली से कौर उठाते और अपने मुंह तक ले जाते। उनकी जिह्वा और स्वादेन्द्रियां स्वर्गिक आनंद से आप्लावित  हो उठतीं। यह क्रम निरंतर चलता रहता। उनकी डायनिंग टेबल चार या छह व्यक्तियों के लिए बनी कोई साधारण टेबल नहीं थी। वह इतनी बड़ी थी कि उसका दूसरा छोर दिखाई नहीं देता था। वह दरअसल राजनेता की भूख का प्रतिबिंबन करती थी और राजनेता देश की । राजनेता की भूख कोई उनकी अपनी निजी  भूख थोड़े ही थी, वह राष्ट्रीय भूख थी । वे इस तथ्य से भली-भांति अवगत थे कि भूख से बड़ी कोई राष्ट्रीय आपदा नहीं हो सकती और वे डाइनिंग टेबल पर बैठ कर दूसरों की तरह सिर्फ खाना नहीं खाते हैं वे तो राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन कर रहे होते हैं।

 उनकी गोद में असहाय बैठा क्षुधातुर गांव निर्निमेष  भाव से थाली से मुंह तक की अनंत यात्रा करते उनके हाथ को निहारता रहता- ‘कभी तो थाली से सुस्वादु कौर थामें उंगलियों वाला यह हाथ रास्ता भटक कर उन तक पहुंचेगा!’ पर वह हाथ कभी रास्ता नहीं भूला। भूलता भी कैसे वह राजनेता का हाथ था, और राजनेता दूरदृष्टा थे उनकी दृष्टि गोद में बैठे गांव तक कैसे जाती?

एक दिन एक पत्रकार उस गांव में पहुंचा । पत्रकार चूंकि पत्रकार था, इसलिए वह राजनेता की तरह दूरदृष्टा न था । उसने वह सब देखा जो राजनेता नहीं देख सकता था। 

 अगला दिन बड़ा विस्फोटक था । समाचार पत्रों की कतरनों और टीवी समाचारों की फुटेज के साथ राजनेता अपने सलाहकारों पर दस हजार पटाखों की लड़ी की तरह लगातार फट रहे थे। पटाखों की लड़ी खत्म होते ही वे  डैमेज कंट्रोल स्ट्रैटेजी बनाने में जुट गए।

 रात को जब राजनेता डाइनिंग टेबल पर विराजमान हुए तो आज उनकी थाली छप्पन नहीं दोगुने व्यंजनों से सजी थी। सामने टीवी पर गांव हाथ बांधे ,रो- रो कर कह रहा था -‘हमें उस पत्रकार ने बरगला दिया था, उसने बिजली का तार लगा डंडा हमारे मुंह के आगे धरकर पता नहीं हमसे क्या क्या उगलवा लिया? सुना है वो डंडा आदमी के अंदर की सारी बातें अपने आप खींच लेता है।’

  समाचार वाचक ने ब्रेकिंग न्यूज़ चला दी -‘देश के खिलाफ़ साजिश रचने वाले पत्रकार को गिरफ्तार कर लिया गया है। जांच एजेंसियां उसके विदेशी संबंधों को भी तलाश रही हैं ।’ 

राजनेता के समर्थकों ने खबर चलाने वाले चैनल के दफ्तर को घेर कर उसमें आग लगा दी है। टीवी स्क्रीन पर वह धू-धू कर जलता दिखाई दे रहा है । जब वह जलकर ख़ाक़ हो जाएगा तो इसके बाद भी, यदि कुछ बचा रह जाएगा तो उसकी रक्षा के लिए भारी पुलिस बल वहां तैनात कर दिया जाएगा। राजनेता के एक सलाहकार इस भीड़ का कुशलतापूर्वक नेतृत्व कर रहे हैं । दूसरे सलाहकार ,पत्रकार के घर की ओर इसी पुनीत कार्य को अंजाम देने के लिए बढ़ रही भीड़ का नेतृत्व संभाल रहे हैं ।

राजनेता की उंगलियां विद्युत गति से थाली और मुंह के बीच शटल सर्विस कर रही हैं। गोद में बैठा गांव थाली से मुंह, और मुंह से थाली तक आते जाते उनके हाथ को हसरत भरी निगाहों से देख रहा है …अपलक – ‘शायद यह हाथ कभी रास्ता भूल कर उन तक पहुंच जाए।’

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आनंद क्रांतिवर्धन

जन्म तिथि :11 नवंबर ,1956

रचना कर्म: पिछले 40 वर्ष से कविता,  गीत,ग़ज़ल,कहानी लेखन में सक्रिय

भारतीय खाद्य निगम, मुख्यालय नई दिल्ली से सहायक महाप्रबंधक (हिंदी )के पद से सेवानिवृत्त

संपर्क: D -89, G&J(U) Block, Green apartment Pitampura Delhi 110034

Mob:. 9810 260 289

 email: krantivardhan@gmail.com

6 Responses

  1. आनंद क्रांतिवर्धन says:

    धन्यवाद अविनाश जी

  2. Avinash chandra Srivastava says:

    अति सुन्दर A

  3. Deepti Tyagi says:

    Ati sunder

  4. जगधारी says:

    रचना अनूठी इस मायने में भी है कि आप अनाज प्रबंधक होते हुए भी गोदी गाँवों के बहाने आम आदमी की नियति को उकेर पाए। वरना हम तो आपदा कोष प्रबंधन से ध्यान ही हटाते।…. आभार।

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