सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की पांच ग़ज़लें

एक

धीरे धीरे ही सही बदल रहा हूं मैं
दुनिया के सांचे में ढल रहा हूं मैं।

सिसकती है रात, सिसकती रहे
सुबह के लिए मचल रहा हूं मैं।

अंधेरे के बाद उजाला ही आएगा
उम्मीद झूठी है, उछल रहा हूं मैं।

इंसां था, जाने कब सांप बन गया
आदमी हूं,आदमी निगल रहा हूं मैं।

दुनिया ने इस कदर बदल दिया मुझे
मर गई आत्मा, जल रहा हूँ मैं।

दो

बात रोटी की आई तो बिफर गए
मसीहा गरीबों के थे किधर गए?

मुखौटा सरेआम इस कदर उतरा
कभी बसे थे नज़रों में, उतर गए।

नसीब ही तो था अब क्या कहें
बिगड़े कुछ केे, कुछ के संवर गए।

दीवानगी ऐसी ना देखी होगी कभी
जो आई नहीं उस आवाज़ पे ठहर गए।

तीन

ग़ज़ल खुशी की आज गाएंगे
अश्क रोक लेंगे, नहीं बहाएंगे।

तड़पाने रोज़ चली आती है
प्यार से भूख को समझाएंगे।

धधकता पेट, ठंडा है चूल्हा
वादे पीएंगे, वादे ही आज खाएंगे।

कट गई जैसी भी कटनी थी
ज़िन्दग़ी की खैर ही मनाएंगे।

वक्त अभी भी है, तान लो मुट्ठी
तोड़ दी चुप्पी, तो जीत जाएंगे।

चार

उदास होता हूं तो उदास होती है ग़ज़ल
पास कोई ना हो तो पास होती है ग़ज़ल.

हंसता हूं तो खिलखिलाती है ग़ज़ल
चुप रहूं तो मन की बात होती है ग़ज़ल.

इतना ना दबाओ कि फट ही जाऊं
टूटते सब्र तो सैलाब होती है ग़ज़ल.

ताक़त ग़ज़ल की वो आखिर जान गए
दबे-कुचलों की आवाज़ होती है ग़ज़ल

पांच

धुंध गहरी बड़ी है, वक्त ठहरा हुआ है
देगा इंसाफ़ कौन, पंच बहरा हुआ है।

चमक में झूठ की, है भौंचक हर कोई
सच पे और भी, कड़ा पहरा हुआ है।

बड़ा बेफिक्र था मैं, सभी अपने थे यहां
ज़ख्म खंजर का लेकिन बड़ा गहरा हुआ है।

उन्हें पहचानता था पर भरम टूट गया
आदमी एक ही, कई चेहरा हुआ है।

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