सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की तीन कविताएं

 सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

भूख और मुहब्बत

मैंने ठंडे चूल्हे में
मुहब्बत को दम
तोड़ते देखा है

भूख दीवानी है
किसी को नहीं छोड़ती

दिवास्वप्न

हां
यह एक
दिवास्वप्न है कि
आदमी
कभी
आदमी भी बनेगा।

अंधेरे से क्या डरना?

अंधेरे से क्या डरना?
अंधेरा है
तो उजाला आएगा ही
आखिर कहाँ जाएगा?
हां, अंधेरा थोड़ा भरमाएगा
खुद को ही
अंतिम सत्य बताएगा
खूब डराएगा
प्रेतों की तरह
चेहरे बनाएगा
तरह-तरह के कानून दिखाएगा
लेकिन याद रखना
अंधेरे का कोई कानून नहीं होता
डरना तो बिल्कुल भी नहीं
क्योंकि अंधेरे के ठीक पीछे ही
खड़ा है उजाला
अंधेरा अपनी कालिमा में
इतना मगन है कि
उसे उजाले की भनक तक नहीं।

1 Response

  1. Sushma sinha says:

    तीनों कविताएँ बहुत सुन्दर हैं। दोनों छोटी कविताएँ न भूलने वाली कविताएँ हैं। बधाई। 🙂

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