सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की पांच कविताएं

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सिस्टम
रास्ता रोका है मज़दूरों ने
क्योंकि उन्हें
रोटी की जरूरत है

पुलिस ने बरसाए हैं डंडे
क्योंकि भूख उन्हें भी  लगती है

भूख दीवानी है
मैंने ठंडे चूल्हे में
मुहब्बत को दम
तोड़ते देखा है

भूख दीवानी है
किसी को नहीं छोड़ती

दूसरा पहलू
पहली बार  उसे डर लगा
रोटी को देखकर
उसे विश्वास ही नहीं हुआ
इतनी डरावनी भी
हो सकती है रोटी

उसे लगा
व्यर्थ हो गई
हर मेहनतकश के लिए
उसकी रोटी की लड़ाई

उसके सामने पड़ी
खून से सनी रोटी पर
भिनभिना  रही थीं मक्खियां
मानो हंस रही थीं
उसकी विफलता पर

वह कांप  उठा
नहीं!
अब वह सिर्फ
रोटी के लिए
नहीं लड़ेगा
बल्कि
ढूंढेगा उन हाथों को भी
जो रोटी को
रक्तरंजित कर  रहे हैं।

आक्रोश
कुत्तों में आक्रोश है
आदमी के प्रति
क्योंकि
आदमी ने
दुम हिलाने  के
मौलिक अधिकार से
वंचित कर दिया है उन्हें।

अभाव
अभाव का ज़हर
भर रहा है
खून में आग
डर है व्यवस्था के
खाक हो जाने का

ये कविताएं सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के सद्यप्रकाशित कविता संग्रह  ‘रोटियों के हादसे’ से ली गई है। अगर आप ये किताब पढ़ना चाहते हैं तो अमेजन पर उपलब्ध है। नीचे के लिंक पर क्लिक कर इस पुस्तक  को खरीद सकते हैं।

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1 Response

  1. Sushma sinha says:

    बेहतरीन कविताएँ !!!

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