सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की लघु कथा ‘स्मार्ट फैमिली, स्मार्ट ज़िन्दगी’

डिनर का वक्त परिवार का वक्त होता है। यही वक्त होता है जब परिवार के सारे सदस्य एक साथ मौजूद होते हैं अपने अपने मोबाइल के साथ।

सब साथ होते हैं लेकिन कोई किसी की तरफ ठीक से देखता नहीं।

मम्मी अपनी फोटो पर लगातार आ रही लाइक की संख्या गिनती रहती हैं तो पापा अपनी ग़ज़ल को बार-बार खोलकर बेसब्री के साथ लाइक तलाशते रहते हैं। उनके चेहरे देखकर लाइक की संख्या का अनुमान आसानी से लग सकता है।

बेटा-बेटी व्हाट्सअप पर लगातार संवाद जारी रखे हुए हैं। वैसे घर में उसकी आवाज़ सुनने को लोग तरस जाते हैं। अब जीभ कम, अंगुलियां ज्यादा बातें करती हैं।

तभी पापा कहते हैं, ‘लो, मैंने भी लाइक कर दिया तुम्हारी फोटो।‘

मम्मी को खुशी कम, चिढ़ ज्यादा होती है, ‘मेरी फोटो लाइक करने के लिए तुम्हारे पास वक्त कहां है?’

मम्मी शायद पापा की किसी महिला मित्र का नाम लेकर ये कहने वाली थी कि उस चुड़ैल की फोटो लाइक करने से फुरसत मिले तब ना। पापा शायद मम्मी के किसी पुरुष मित्र का नाम लेकर कहने वाले थे कि उसके लाइक और कमेंट से तुम्हें ज्यादा खुशी होगी ना, इसलिए मैं देर से करता हूं। लेकिन दोनों चुप रहे गए। डाइनिंग टेबल पर बच्चे भी जो थे।

पापा-मम्मी दोनों के हाथ प्लेट और नज़रें फिर से मोबाइल पर टिक गईं। दोनों बच्चों के हाथ भी प्लेट और नजरें मोबाइल पर टिक गईं।

मम्मी ने बेटा-बेटी दोनों से कहा, ‘ये तुम दोनों हर वक्त मोबाइल पर क्यों लगे रहते हो?’

बेटे ने मम्मी की तरफ देखा और मुस्कुरा दिया। बेटी पर मानो कोई असर ही नहीं पड़ा।

पापा बिफर पड़े, ‘मुस्कुरा क्यों रहे हो। हम दोनों का जो होना था हो गया, तुम्हे तो अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। ये मोबाइल, ये सोशल मीडिया बर्बाद कर देगा। इसका एडिक्शन हो गया तो पढ़ाई-लिखाई सब चौपट।‘

‘और तुम?’ मम्मी अब बेटी पर बरस पड़ी। ‘ये तुम्हारी उम्र है दिन भर मोबाइल से चिपके रहने की। जब देखो तब व्हाट्सअप, जब देखो तब व्हाट्स अप।’

पापा ने पूछा-पढ़ाई-लिखाई के वक्त इतनी मैसेजिंग क्यों और किसे?

‘तुम्हारी उम्र अभी स्मार्ट फोन की नहीं है। अभी हाई स्कूल में हो।‘ इतना कहने के बाद मम्मी पापा पर हमला बोल बैठी, ‘अभी फोन देने की जरूरत ही क्या थी जब कॉलेज जाती तब देते लेकिन मेरी कोई सुनता कहां है।‘

बेटे ने एक मिनट देर नहीं की, ‘मैं तो कॉलेज में हूं, फिर मुझे क्यों टोकते हो?

‘पापा, सारे स्कूल के ग्रुप हैं। पढ़ाई, होम वर्क यही बातें होती रहती हैं।‘ बेटी ने सफाई दी तो पापा को अपने बचाव का मौका भी मिल गया।

‘स्मार्ट फोन में बुराई नहीं है। इस्तेमाल सही ढंग से होना चाहिए। पढ़ाई-लिखाई में बहुत मदद मिलती है।‘

‘बिगाड़ो, मुझे क्या’ कहकर मम्मी ने रोटी का निवाला मुंह में डाल लिया और फिर लाइक गिनने में जुट गई।

पापा, मम्मी, बेटा बेटी चैट, लाइक, कमेंट, शेयर करते हुए डिनर करते रहे।

एक साथ बैठकर सबने अलग-अलग डिनर कर लिया।

स्मार्ट फोन। स्मार्ट परिवार। स्मार्ट ज़िन्दग़ी।

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2 Responses

  1. विचार करने योग्य लेख। बहुत ही स्पष्ट लिखा गया है, जब डिनर में स्मार्ट फ़ोन है तो समझा जा सकता है स्मार्टफोन के डिनर के बारे में।

  2. विभूति says:

    स्मार्ट पोस्ट भी। यह सपाट बयानी है।कहानी कार की चिंता वाजिब है और लोगों को इस स्मार्ट होती जिंदगी से ख़बरदार रहने की जरुरत भी है।

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