तीन लघु प्रेम कथाएं

सत्येंद्र  प्रसाद  श्रीवास्तव

महबूबा

तुम भूख की तरह आती हो, प्यास की तरह तड़पाती हो, खुशबू की तरह लुभा कर उड़ जाती हो, अभाव की तरह रोम-रोम में बस जाती हो, सपनों में खुशी बनकर आती हो, नींद खुलती है तो महंगाई की तरह इठलाती हो,पूस की ठंड की तरह सताती हो फिर धूप बन कर खिलखिलाती हो, जिधर देखता हूं उधर बस तुम ही तुम हो। बस तुम ही तुम हो। ब

ओह! ये मैं किससे प्यार कर बैठा।

 

दगाबाज लोकल

LOCAL TRAINजब तुम साथ होती है तो लोकल ट्रेन बिल्कुल वक्त पर छूटती है। रास्ते में भी कहीं कोई गड़बड़ी नहीं। ना ही कोई सिगनल खराब होता है, ना ही कोई रेल रोको आंदोलन। आधे घंटे का सफ़र आधे घंटे में ही खत्म हो जाता है। कितनी बातें होती है कहने-सुनने को लेकिन…

जब मैं अकेला होता हूं तो अक्सर ट्रेन लेट हो जाती है. कभी-कभी तो आधे घंटे का सफ़र पूरा करने मे एक घंटे से भी ज्यादा लग गए। पता नहीं रेलवे को मेरी मुहब्बत से क्या दुश्मनी है। जब तुम साथ होती हो, लेट ही नहीं होती।

 

जाने पहचाने अजनबी

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वक्त मानो बोझ बनकर उनके सिर पर सवार हो गया था।न उठाए उठता था, ना काटे कटता था। सर्द रिश्ता बर्फ की
सिल्ली सा उनके बीच पड़ा था। रिश्ते जब ठिठुर रहे हों तब बोली कहां फूटती है। मरघट सा सन्नाटा था दोनों के बीच।
उफ्फ! एक ही छत के नीचे दो लोग कितनी आसानी से दो अजनबी की तरह रह रहे हैं। इन्हें देख कर कोई कह ही नहीं सकता कि दोनों कभी हाथों में हाथ डाले साथ-साथ चलते हुए यहां तक पहुंचे थे।

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1 Response

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