सीमा संगसार की छह कविताएं

खंडहर
स्त्रियाँ
जी लेती हैं
अपने अतीत रूपी
खंडहरों में
जो कभी कभी
सावन में हरिया जाते हैं —
वीरानगी तो उसकी पहचान है
जहाँ आवाज दो तो
वह पुनः लौट आती है
सभी खंडहरों में
दफन होते हैं
कई राज
जिसे स्त्रियों ने
दबा कर रखा होता है
किसी खजाने की तरह
बुलंद इरादे
खंडहर की इमारत है
जो कभी ढह नहीं पाई
किसी खंडहर को
गर प्यार से देखो तो
उसके खुलते बंद होते
दरवाजे में
कोई स्त्री
सिसकती हुई नजर आएगी
कठपुतली
मेरी जिन्दगी की
शिराओं को पकड़कर
खींच रहा है कोई
और/ मैं बेबस
खिंची चली जाती हूँ —
लोग ताली बजाते हैं
हँसते हैं
मेरी इन कलाबाजियों को देखकर
उन्हें मैं एक
तमाशा से अधिक
कुछ नहीं दिखती
मेरे हिलते-डुलते शरीर
और/चेहरे की भाव भंगिमाएं
सब कुछ उस पर निर्भर है
जो नियंत्रित कर रहा है मुझे
मैं तो जिन्दा हूँ
मेरी रूह मर गई है
लोग कहते हैं
मैं कठपुतली हूँ —
{रात ख्वाब में देखा था कठपुतली की रूह को कहीं दूर जाते हुए}
सुनो आवारा लड़कियों
एफ एम रेडियो की
तेज़ धुन पर
मटकते हुए
मुँह में कलम दबाए
अखबारों के पन्ने
पलटते हुए
आइडियाज समेट सकती है
अगले संपादकीय के लिए
एक आवारा लड़की
नीली जींस की जेब में
अपने हाथ छुपाए
घूम सकती है
थियेटरों में
नए नाटक के मंचन तक
बारिश में भींगती हुई
लौट सकती है अपने घर
बिना किसी छतरी के
“क” से कविता के
क्या हो सकते हैं मायने
अच्छी तरह जानती है
ये आवारा लड़कियाँ —
सुनो आवारा लड़की
मोबाइल , अखबार
रेडियो और कविता
ये लक्षण सभ्य है या नहीं
यह अब तुम्हें तय करना है
कि लड़के नहीं होते आवारा —-
इक पहाड़
पूरे जीवन में
मांझी ने
तोड़ा होगा
इक पहाड़
फगुनिया तो
हर रोज
तोड़ती है
इक पहाड़ —
काम के बोझ तले
दब कर
हो जाती है ढेर
इक दिन
मांझी
दर्ज हो जाता है
इतिहास के पन्नों में
तोड़ कर
इक पहाड़ —–
बंद दरवाजे खुली खिड़कियाँ
कुंडियां लगा दी जाती हैं
बंद दरवाजों में
उनके बाहर निकलने के
सारे रास्ते
बंद हो जाते हैं
फिर आहिस्ते से
खोलती हैं वह
अपने दिमाग की खिड़कियाँ
जब वह भोग रही होती है
एकांत को
विचारों की कई लड़ियां
मछलियों की तरह
फिसलती जाती है
और / वह
लगा रही होती हैं
गोता उनके साथ
बहते पानी में
दरवाजे बंद हों तो क्या
खुली खिड़कियों से
ताजी हवा के झोंके
अंदर आ ही जाते हैं
ओ री सूरजमुखी
ओ री सूरजमुखी
ताकती है सूरज का मुँह
अंधेरों से घबराकर
सौंप देती हो
अपना सर्वस्व
सूरज के हवाले—-
एक सूरज के इशारे पर
कठपुतली सी नाचती हुई
खो दी है
तुमने अपनी सारी महक
तुम्हारा सारा वजूद समा गया है
सूरज की किरणों में
ओ री सूरजमुखी
तुम्हारा पीला रंग भी
चढ़ चुका है
सूरज की भेंट
सुन री सूरजमुखी
कभी होश आए तो
आना चाँदनी रात में
रात रानी बनकर
करना दीदार चाँद से
जब तेरी रूह में
समा जाए चाँदनी
यकीन मानो
छोड़ देगी गुलामी
सूरज की —-
—————–
सीमा संगसार
फुलवड़िया 1 , बरौनी
जिला -बेगूसराय
 (बिहार)
शिक्षा – अर्थशास्त्र स्नातकोत्तर
प्रकाशन – हिन्दुस्तान समाचार पत्र समेत नया
ज्ञानोदय मासिक पत्रिका व ई न्यूज व ” शब्द सक्रिय हैं ” हिन्दी प्रतिलिपि आदि ब्लागों में प्रकाशित रचनाएँ ।
संप्रति – मध्य विद्यालय मसनदपुर , बीहट (बेगूसराय) में सहायक शिक्षिका के रूप में कार्यरत।

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3 Responses

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    jo ek dum jiwant hain aur istri, pahaar, kavita ki sahi vayakhya karti hain
    badhai-
    -om sapra

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