सेवा सदन प्रसाद की तीन लघुकथाएं

गुमशुदा इंसान

एक आदमी पागल की तरह सड़क पर दौड़ रहा था।

ट्राफिक पुलिस ने डपट कर कहा — “अरे! पागल है क्या ? बार – बार सड़क पे दौड़ रहा है – – क्या ढूंढ रहा है  ?।”
” इंसान ढूंढ रहा हूं ” पागल ने याचना भरे शब्दों में कहा ।
” पूरा मार्केट लोगों से भरा है,  दीखता नहीं है
” हाँ,  ये तो आम लोग हैं,  संवेदनहीन ।इंसान नहीं है  ।”
ट्राफिक पुलिस को उसकी बात समझ में नहीं आई ।उसे पागल समझ कर भगा दिया ।
अगले मोड़ पर एक सज्जन ने पूछा तो यही जवाब दिया — ” इंसान ढूंढ रहा हूं ।”
सज्जन ने भीड़ की ओर इशारा किया ।तब पागल ने जवाब दिया –” ये तो भीड़ है जो बस तमाशा देखती है – – इंसान तो कर्मठ होता है जो पहाड़ काट कर रास्ता बनाता है ।”
सज्जन तब आश्चर्य भरे शब्दों में बोला — ” लोग तुझे पागल क्यों कहते हैं? ”
” क्योंकि मैं बहुत चिल्लाता हूं ।आखिर चिल्लाऊं भी क्यों न – – सरेआम मेरी पत्नी का बलात्कार हुआ – – भीड़ बस तमाशा देखती रही – – नवयुवक वीडियो बनाते रहे और मैं सहायता के लिए गुहार लगाता रहा।पर कोई भी  इंसान आगे नहीं आया ।बलात्कार के बाद पत्नी तो आत्महत्या कर ली क्योंकि वो अपमान बर्दाश्त न कर सकी और मैं इंसाफ के लिए इंसान ढूंढ रहा हूं जो मेरे साथ आवाज बुलंद करे ।

चर्चा
— सुना तुमने,  अरुणा सानबाग मर गई ।
—   कौन थी अरूणा सानबाग  ?
— अरुणा सानबाग एक नर्स थी जो अपनी ड्यूटी के दौरान दिन -रात मरीजों की सेवा करतीं रहती थी ।
— मर गई कि मार दी गई  ?
— नहीं नहीं,  मर गई. 42 साल तक कोमा में थी – – – उसके ही सहयोगी कर्मचारी ने बलात्कार करने का प्रयास किया था ।बचाव में काफी संघर्ष की थी ।
– – – और यातना सहनी पड़ी 42 वर्षो तक – – फिर तो ये मौत नहीं शहादत है ।
—- इसे शहादत कैसे कह सकते हैं  ?
—- अपनी आहुति देना ही शहादत कहलाता है न — –  चाहे अपने वतन के लिए हो या अपने बदन के लिए ।
अब चर्चाएं गूंजने लगी

 भीख
चर्चगेट स्टेशन पर लंबी क्यू थी ।लोग बस का इंतजार कर रहे थे ।क्यू का मैं आखिरी व्यक्ति था ।वैसे मुंबई में क्यू का जल्द अंत नहीं होता।अपनी व्यस्तता की वजह से ही लोग क्यू में खड़े – खड़े ही पेपर,  मैगजीन या नाॅवल पढ़ने में  लीन थे ।
तभी एक भिखारी आया ।हाथ में एक पीतल की थाली थी और उसमें भगवान की मूर्ति ।थोड़ा सा सिंदूर और चावल भी था ।अगरबत्ती जला रखा था ।वह लोगों से याचना करने लगा  और लोग बड़ी ही श्रद्धा से रूपये  , दो रूपये देने लगे ।अंत में वह मेरे पास भी आया । मैंने गौर से उसे देखा और थाली में रखी भगवान की मूर्ति को निहारा ।इंसान की इस चतुराई पे भगवान भी हैरान दीखा ।भिखारी मेरे समक्ष ढीठ की तरह खड़ा रहा ।वह इस इंतजार में था कि कब मैं पर्स से पैसे निकालूं ।
मैं भी अपनी जिद पे कायम रहा।थोड़ी देर के बाद उस भिखारी से पूछा –” तुम विकलांग तो नहीं हो फिर भी भीख क्यों मांगते हो ? – – वो भी भगवान की मूर्ति लेकर ।
भिखारी ने बेधड़क जवाब दिया — ” साहब,  बिना सिफारिश कहीं भी नौकरी नहीं मिलती – – – मजदूरी के लिए भी पहचान एवं जमानत की जरूरत है ।भीख भी यूं ही नहीं मिलती ।अगर भगवान की मूर्ति न हो तो मुझ असहाय पे कौन तरस खायेगा  ? ”
तब मैं सोचने लगा कि लोग भीख किसे दे रहे हैं — भिखारी को या भगवान को ?

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