शहंशाह आलम की पांच कविताएं

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पेंटिंग : शहंशाह आलम

  खोलना

खोलने की जहाँ तक बात है

लगता है रहस्य का रहस्य

आश्चर्य का आश्चर्य तक

खोल डाला है किसी परिचित जैसा

 

लेकिन मेरे जैसे झूठे ने

उस घर का द्वार खोला

तो लगा कितना कुछ खोलना

बाक़ी रह गया है अभी भी

 

अपने समय के बारे में मुझे लगता रहा है

कि मैंने जान लिया है उसे पूरी तरह

पर क्या अपने समय को जानना-समझना

इतना आसान हुआ है कभी भी

 

या फिर ऋतुक्रम के रहस्य को लीजिए

हम कितना कुछ भुला बैठते हैं जीवन में

ऋतु है कि आती-जाती रहती है अपने वक़्त पर

 

इस खुले पथ पर चलते हुए

हम कितनी-कितनी दूर चले जाते हैं

इस उम्मीद में कि इसे तो

हमीं बनाते रहे हैं

बिगाड़ते भी रहे हैं

सो इस खुले पथ का कुछ भी खोलने जैसा

क्या बचा रह जाता है किसी भी क्षण

 

मेरे लिए इन पथों का अंत न होना

अबूझ रहस्य-सा रहा है तब भी

 

इस आकाश के आकाश का

क्या-क्या खोलना रह गया है

जैसे मेरे दुःख का आत्मीय रहस्य

सदियों से नहीं खोल पाया है कोई

 

बहुत सारी चीज़ों का रहस्य खोलने को लेकर

बहुत सारे रहस्य रहा किए हैं हमारे जीवन में

 

जैसे मैंने उसकी उत्सुक देह को

अपनी देह की प्रार्थना बनाते हुए

किसी आश्चर्य के खुलने-खोलने

जैसा ही तो गढ़ा है हर बार

उसे बिना कुछ बताते हुए।

 

तमाशे : दो कविताएँ

एक

इस शहर के

तमाशे भी अजीब हैं

 

कोई किसी को

यहाँ कुछ देता नहीं

बस छीन लेता है

किसी की रोटी

किसी की बेटी

 

यह छीना-झपटी

शहर के दिन-रात में

हर पल

हर क्षण

चलती ही रहती है

बिना किसी आहट के

 

दो/

कैसा है यह शहर

आस्माँ के नीचे

बसी हुई

इस ज़मीं पर

 

इस शहर के

जितने घर हैं

घरों के

जितने तमाशे हैं

 

सभी डरे हैं

सभी बुझे हैं

 

इस ख़ौफ़ में

कि सब घर के

सब तमाशे

छीन लेगा

एक-न-एक दिन

कोई अजनबी

डाकू आकर

 

और वह डाकू

हमारे द्वारा चुनी हुई

सरकार की तरफ़ से

भेजा गया होगा।

 

दुःख की बात

कोई ठीक कर रहा है निरंतर

पृथ्वी के ज़ख़्म अपने गान से

 

वह लड़की टूट रहे बिखर रहे

अपने प्रेम के धागे को

समेटती-सहेजती है

विषाद को परे रखते हुए

 

पृथ्वी को प्रेम को

बचाने वालों की संख्या

लगातार कम हो रही है

इस दुनिया में

जोकि सबकी है

बगुलों तोतों की भी मेरी भी

 

दुःख की बात यही है

इस छोटी-सी दुनिया में

हत्यारे लगातार बढ़ रहे हैं।

 

 कितने सारे सच हैं इस घर के

कितने सारे सच हैं इस घर के

जिन सचों को झूठ से ढंका गया है

अपनी कारीगरी को सजधज देते हुए

 

सच को झूठ के बूटों से बार-बार रौंदकर वे ख़ुश हैं

जितना ख़ुश उन्हें होना चाहिए अपनी खलनायकी में

 

सच को दबाए रखने वाले खलनायकों ने

मेरी जीभ को दाग़ा था गर्म लोहे से बार-बार

ऐसा करना एक खेल भर रहा है उनके लिए

 

सच को मारने की मारते रहने की

उनकी कैसी-कैसी कोशिशें चलती रहती हैं

समय के अंधेरे कोने में छिपकर

 

अपनी झूठ को जिलाए रखने के लिए

मेरे सच को अपने ज़ुल्म से मारने की

उनकी हज़ार कोशिशों के बाद भी क्या

सच लिखना मुझसे छूट चुका माँझी मेरे!

 

     चुनौती 

 

सदन की दीर्घा में बैठकर उनकी चुनौती इतनी भर होती है

कि पंक्ति में खड़े सबसे अंतिम आदमी की गुत्थियाँ

वे अनसुलझा छोड़ देते हैं प्रत्येक सत्र के रोज़ो-शब में

चाहे वह ग्रीष्मकालीन हो या शीतकालीन या कोई और सत्र

 

उनकी चुनौती उनकी चिंता इस बात में अधिक होती है

कि उनके चेहरे जगमग रहें कालिख की कोठरी में रहते हुए

 

ये कौन लोग हैं, सोचते हैं आप और मैं भी

ये कौन लोग हैं, सोचता है पंक्ति में अड़ा खड़ा

वह अंतिम आदमी भी जो मुस्कुरा रहा है

अपने दिन-रात की चुनौतियाँ स्वीकारते हुए

 

जबकि उस आख़िरी आदमी की सदा कोई नहीं सुनता

न कार्यपालिका न न्यायपालिका न कोई चौथा खंबा

जिनके लिए हँसती हुईं सुब्हें हँसते हुए नए-नए अल्फ़ाज़

सजाए जाते रहे हैं हर बजट-सत्र के सरकारी विज्ञापनों में

 

उस अंतिम आदमी जो कि होते हैं मुल्क के पहले नागरिक

कोई उसकी गुत्थियाँ सुलझाने की चुनौती स्वीकारता है

तो पॉकेटमार सरकार नगर के न्यायाधीश से कहकर

देशद्रोह के इल्ज़ाम में काल कोठरी की सज़ा सुनवाती है

उन्हें, जो लड़ाई लड़ना जानते हैं हर पिछड़े हर दलित पक्ष की

 

इसलिए कि हर अंतिम आदमी हर सरकार के लिए

अल्लाह मियाँ की गाय होती है वोटों का दूध देनेवाली

 

यह चुनौती डरावनी है बरसों-सदियों से हर रात के अंतिम भाग में

यह चुनौती तब भी मैं स्वीकारता हूँ आज की सरकारों से बिना डरे

आज के न्यायाधीश से बिना घबराए जोकि सरकारों का समर्थन करते हैं

और हमें देशद्रोह की सज़ा सुनाते हुए उस अंतिम आदमी का हमदर्द मानते हैं

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