शहंशाह आलम का आत्मकथ्य

5 Responses

  1. Dr Zeaur rahman jafri says:

    शहंशाह आलम से आप चाहे पहली बार ही मिलें, ये एहसास ही नहीं होता कि आप उनसे पहले कभी नहीं मिले हैं. वह सबसे सम्मान पाते हैं और सबको पूरा सम्मान देते हैं
    -डॉ जियाउर रहमान जाफरी
    बेगूसराय

  2. Sushma sinha says:

    शहंशाह आपने अपना आत्मकथ्य बहुत बढ़िया लिखा और उसमे आई कविता तो बेहतरीन है।जो अपने दुखों को जीत लेता है खुशियाँ उसके चेहरे पर झलकती रहती हैं। ढेर सारी शुभकामनाएँ और शानदार आत्मकथ्य के लिए बहुत बधाई।

  3. शिवदयाल says:

    पढ़ गया। तुम्हारे आत्मसंघर्ष से वाकिफ हुआ।अंधेरे-उजाले के बीच तुम्हारी रचनात्मकता ऐसे ही निष्कंप चमकती रहे..!

  4. बहुत खूब! तुम्हारी भाषा में ग़ज़ब की रवानगी है। मज़ा आया।..लेकिन तुम खुद को कंट्राडिक्ट करते दीखते हो, शहंशाह! शुरुआत में अपने ग़मगीन मिजाज की बात करते हो और आगे चलकर ख़ुशी और उसकी महत्ता को प्रतिपादित करते हो…

  5. रमेश प्रजापति says:

    पढ़ा भाई ।बहुत ही सटीक लिखा है आपने। बधाई हो आपको

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