शहंशाह आलम का आत्मकथ्य

ख़ुद को जीते हुए एक आत्मकथ्य : ख़ुशी तो बची रहती है कुएँ के सन्नाटे तक में

सच पूछिए तो मैं एक निहायत कम बोलने-बतियाने वाला, कम हँसोड़, कम ख़ुश रहने वाला और अपनी ज़िंदगी में ज़्यादा परेशान, ज़्यादा ग़मग़ीन, ज़्यादा ग़मज़दा रहने वाला आदमी हूँ। अब हर कोई अपनी ज़िंदगी में ख़ुश रहे, यह ज़रूरी तो नहीं। मैं भी बुनियादी तौर पर ज़्यादातर दुखी रहने वालों में अपने को शामिल पाता हूँ। मेरे इस कथन के बाद गर कोई पूछे कि भैया शहंशाह, आप देखने में तो कहीं से दुःख में जीने वाला व्यक्ति दिखाई नहीं देते। तो भइये, दुःख भी कोई दिखाने की चीज़ है भला! अब आप ही बताइए, मैं कहीं निकल रहा होऊँ और आप ही के घर की खिड़कियों के शीशे टूट-टूटकर मेरे पाँवों के पास आ गिरें, गिरकर मेरे पाँवों को लहूलुहान कर दें, तो मेरे जैसा अव्वल दर्जे का बुड़बक आदमी, जो हमेशा पिछली रोटी खाता आया हो, इस घटना से ख़ुश रहने की कौन-सी इबरत हासिल करेगा या ख़ुश रहने का कौन-सा नया तर्ज़े-बयाँ अपनी ज़िंदगी में ढूँढ़ता फिरेगा? लेकिन ठहरिये, मुझे अब याद आ रहा है कि मैंने एक बार ख़ुदकुशी करने का फ़ैसला ले लिया था तब उन दिनों एक बुज़ुर्ग शख़्स ने गंगा के किनारे ले जाकर बहती हुई गंगा की तरफ़ इशारा करते हुए मुझसे पूछा था कि ग़ौर से देखो गंगा के इस पानी को, गंगा का यह पानी तुम्हें ख़ुश लगता है या ग़मज़दा? यक़ीनी बात है कि उस बुज़ुर्ग के सवाल ने मुझे ख़ामोश कर दिया होगा। उस बुज़ुर्ग ने कुछ पल मेरे चेहरे की ओर देखने के बाद मेरी पीठ पर मुहब्बत से हाथ रखते हुए कहा था कि, ‘भई, हर बहता हुआ पानी हमें ख़ुश रहने की ही कहानियाँ सुनाता आया है। इस पानी में हम अपने हिस्से का कितना कुछ नापाक-अपवित्र डालते रहते हैं, तब भी यह बदले में हमें जीवन ही देता है। और हम इंसान हैं कि हमारी ज़िंदगी में ज़रा-सी ऊँच-नीच हुई नहीं कि हम अपनी ज़िंदगी से ही हाथ धोने की फ़िराक में लग जाते हैं।’ यह बात उन्होंने हँसते हुए कही थी। तब मुझे लगा था कि ख़ुशियाँ तो हम बहते हुए पानी में भी ढूँढ़ना चाहें तो ढूँढ़ ले सकते हैं। यहाँ मैं यह जोड़ना चाहूँगा कि सिंदबाद जहाज़ी ने भी अपनी जितनी महान यात्राएँ की होंगी, मेरे ख़्याल से, ख़ुशियाँ पाने के लिए ही की होंगी। इसलिए कि सिंदबाद का सफ़रनामा भी बहते हुए पानी के जैसा ही था, जीवन से भरा हुआ।

 

अब आप ही अंदाज़ा लगाइए जनाब, कि एक इंसान को ख़ुशियाँ पाने के लिए कित्ते-कित्ते और कित्थे-कित्थे जाकर पापड़ बेलने पड़ते हैं। इस ख़ुशी को ढूँढ़-ढ़ाँढ़ के क्रम में मुझे अपने समय के हिन्दी के बड़े और अत्यन्त सजग कवि श्रीकान्त वर्मा बेतरह याद आ रहे हैं। ये साहब भी तो ख़ुशी की तलाश में उस मगध की यात्रा पर निकले थे, जहाँ लोगबाग अपने समय की नदी पार करने की चाह में डूब जा रहे थे। तभी तो मगध में आमों का मौसम खोजते हुए उन्होंने पाया कि इस मगध में टोकरियों में आम नहीं बल्कि अर्थियों पर शव ही शव भरकर आ रहे हैं : ‘तुमने देखी है काशी?/ जहाँ, जिस रास्ते/ जाता है शव/उसी रास्ते/ आता है शव!/ शवों का क्या!/ शव आएँगे/ शव जाएँगे।’ अब बाज़ कवि अपने बचपन में मेरे जैसे ही दुखी आदमी रहा किए होंगे। उन्हें भी कोई बुज़ुर्ग टाइप अथवा सिंदबाद जहाज़ी टाइप से इम्प्रेशन मिला होगा कि ख़ुशी को हर हाल में पकड़े रहना है। मेरे ख़्याल से हर कवि एक कुशल कपड़े धोने वाला ही होता है, जो बहरहाल मौसम का बहाना ढूँढ़ ही लेता है। इसीलिए लेओन ब्लाय ने लिखा है कि, ‘मनुष्य के हृदय में कुछ ऐसे भी स्थल हैं जिनका अभी कोई अस्तित्व नहीं; और पीड़ा उन्हीं को छूती है जिससे वे अस्तित्व में आ सकें।’ ग्रेहम ग्रीन थोड़ा आगे जाकर मेरे जैसे नाशुक्रे को समझाते हैं, ‘कहानी का अपना कोई आरंभ या अंत नहीं होता। लिखने वाला अपने अनुभव का कोई भी एक क्षण चुन लेता है और वहाँ से आगे या पीछे की ओर देखने लगता है।’ उसी तरह मेरा मानना है कि ख़ुशियाँ तो हमारे दुखों में भी ओस के कण की तरह बिखरी दिखाई देती हैं। हमारे साहस पर है कि उन दुखों से ख़ुशियों को हम अपने भीतर चुन-बटोरकर कितना रख पाते हैं। ऐसा अकसर हमसब नहीं कर पाते हैं। तभी तो श्रीकान्त वर्मा ‘काशी का न्याय’ शीर्षक अपनी कविता में यह लिखते हैं : ‘सभा बर्ख़ास्त हो चुकी/ सभासद चलें/ जो होना था सो हुआ/ अब हम, मुँह क्यों लटकाए हुए हैं?/ क्या कशमकश है?/ किस्से डर रहे हैं?/ फ़ैसला हमने नहीं लिया/ सिर हिलाने का मतलब फ़ैसला लेना नहीं होता/ हमने तो सोच-विचार तक नहीं किया/बहसियों ने बहस की/ हमने क्या किया?’

हज़रात, सच तो यही है कि ख़ुशी को हर हाल में पकड़कर रखना पड़ता है। ऐसा हमें सिर्फ़ अपने लिए नहीं, औरों के लिए भी करना होगा। इसलिए कि इन दिनों मनुष्य का मनुष्य के प्रति घृणा-भाव बढ़ा हुआ दिखाई देता है। मनुष्यों के प्रति घृणा हम रोज़ देखते ही हैं। सवाल यह भी है कि जिस तरह से एक इंसान दूसरे इंसान के लिए नफ़रत रखता है, तो क्या एक इंसान का दूसरे इंसान के लिए प्यार उमड़-उछलकर सामने नहीं आ सकता? आ सकता है, बशर्ते कि हम अपने सामने वाले को भी अपना मानें। अगर वह किसी दुःख में, किसी संकट में है, तो हम किसी अपने की तरह उसके साथ खड़े हो जाएँ, तो अपने लिए भी ख़ुशी को लाँघ-फलाँघकर हासिल कर सकते हैं। यहाँ अपने लिए से ज़्यादा अपनों के लिए अपनी ‘वसंत बचा रहेगा’ शीर्षक कविता आप सबको सौंपता हूँ :

वसंत छूटा नहीं है जीवन की तरह

बार-बार इस बोल रहे समय से

छोड़ देते हैं हम ही बहती हुई नदी को

पहाड़ को जंगल को पक्षियों को

जैसेकि छोड़ दिया है हमने इन दिनों

पड़ोसियों को देखकर प्यार से मुस्करना

जैसेकि छोड़ दिया है हमने चोरी से देखना

माउथऑर्गन बजाती उस लड़की को

जो जादू जानती है

नई प्रेम की भाषा जानती है

आपके विरुद्ध खड़ा होना जानती है

इतने बड़े इस शहर में

आप कैसे बिना बोले रह लेते हैं

इतने बड़े इस शहर में

आप कैसे बिना गूँजे रह लेते हैं

जैसे यह पृथ्वी बची हुई है

आपके बार-बार मारने के बावजूद

जैसे भेड़ें बची हैं बकरियाँ बची हैं गाएँ बची हैं

जैसे पानी बचा है अब भी

आपके बार-बार बेचे जाने के बावजूद

जैसे जल में मछलियाँ बची हैं

कछुए बचे हैं शंख बचे हैं

वनस्पतियाँ बची हैं असँख्य

वैसे ही वसंत बचा रहेगा

कुएँ में बची रह गई चुप्पी को तोड़ता हुआ

वैसे ही वसंत बचा रहेगा

मेरे घर को मेरे घर की स्त्री को

बहुत सारी कठिनाइयों के बावजूद

साहस देता हुआ कोई अनूठा

किसी नए निकल रहे कोंपल की तरह

5 Responses

  1. Dr Zeaur rahman jafri says:

    शहंशाह आलम से आप चाहे पहली बार ही मिलें, ये एहसास ही नहीं होता कि आप उनसे पहले कभी नहीं मिले हैं. वह सबसे सम्मान पाते हैं और सबको पूरा सम्मान देते हैं
    -डॉ जियाउर रहमान जाफरी
    बेगूसराय

  2. Sushma sinha says:

    शहंशाह आपने अपना आत्मकथ्य बहुत बढ़िया लिखा और उसमे आई कविता तो बेहतरीन है।जो अपने दुखों को जीत लेता है खुशियाँ उसके चेहरे पर झलकती रहती हैं। ढेर सारी शुभकामनाएँ और शानदार आत्मकथ्य के लिए बहुत बधाई।

  3. शिवदयाल says:

    पढ़ गया। तुम्हारे आत्मसंघर्ष से वाकिफ हुआ।अंधेरे-उजाले के बीच तुम्हारी रचनात्मकता ऐसे ही निष्कंप चमकती रहे..!

  4. बहुत खूब! तुम्हारी भाषा में ग़ज़ब की रवानगी है। मज़ा आया।..लेकिन तुम खुद को कंट्राडिक्ट करते दीखते हो, शहंशाह! शुरुआत में अपने ग़मगीन मिजाज की बात करते हो और आगे चलकर ख़ुशी और उसकी महत्ता को प्रतिपादित करते हो…

  5. रमेश प्रजापति says:

    पढ़ा भाई ।बहुत ही सटीक लिखा है आपने। बधाई हो आपको

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