शहंशाह आलम की कविता ‘घर वापसी’

घर वापसी

सहसा मेरा घर

कहीं खो गया है

कहीं गुम हो गया है

जो चीन्हा-पहचाना था

 

आपने देखा

आपने सुना…

 

मैं किस सूराख़ से झाँककर

अपने चीन्हे-पहचाने घर को

तलाशूँ

ढूंढूँ

 

जबकि इस बीते-अनबीते में

सबका घर है सदृश्य

 

बस मेरा ही घर खो-गुम गया है

जैसे गहरे पानी में

जैसे गहरे पाताल में

 

कब

कैसे

कहाँ होगी

मेरी घर वापसी

 

उन खोजी कुत्तों ने

शोध करना शुरू कर दिया है

सूँघना शुरू कर दिया है

मुस्तैदी से

 

अब जो भी तय करेंगे

अब जो भी फ़रमान जारी करेंगे

वे ही करेंगे

 

अब जो भी घर देंगे

अब जो भी धर्म देंगे

अब जो भी पहचान देंगे

अब जो भी रहन-सहन देंगे

वे ही देंगे

मेरी घर वापसी के एवज़ में।

2 comments

  1. वाह जी सुन्दर आलम जी सभी कवितायेँ बधाई जी

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