शहंशाह आलम की पांच कविताएं

तब भी मैं

द्वार जो खुल रहा है प्राचीन का
इस द्वार के भीतर असंख्य प्राचीन तोते
प्रेम कर रहे हैं अपने प्राचीन तरीक़े से
अंतहीन बार प्रेम की सहजता को बचाए

आप कहना चाहें तो कह दें मेरे बारे में
कि प्रेम को लेकर यह आदमी हमेशा से
किसी आदिम प्रार्थना की तरह रहा है

तब भी मैं प्रेम के सारे प्राचीन तरीक़े
बचाए रखना चाहूँगा इस बेहद पुराने घर में
तोतों के रहस्यों से भरे प्रेम को देखकर

जबकि आप रोज़ किसी से प्रेम करते हैं
रोज़ हत्या कर देते हैं नए प्रेम में उतावले।

एक स्त्री के पास

एक स्त्री के पास प्राचीन क्या है
वह बुहारती है घर अंतरिक्ष जानकर

वह पृथ्वीतल में बीज डालती है
कि उगेंगे रहस्यों से भरे अन्न
सुग्गों को नहलाती है ओस की बूँदों से
हरी पत्तियों में से चुन-चानकर

जल में उझलती है अपने इकट्ठे किए आँसू
जो हथियार बनेंगे पानियों में घिसकर
संहारने आदिम दैत्यों को एक न एक दिन

यह सच है एक स्त्री के पास उसके लिए
समय का सबसे पुराना वह कोना होता है
जिसमें गाती है अपने समय का अनूठा कोरस
जो बारिश लाता है वृक्षों वनस्पतियों के लिए

और इस तरह एक स्त्री इस ग्रह की आयु
बढ़ाती जाती है अपने लिए प्रेम को बचाते।

सजाता हूँ

बाँसुरी की भाषा से
सजाते हो तुम बाँस की दुनिया
जल की बोली से
सज्जित करते हो यह मरुप्रदेश

दिशाओं के वस्र से
सजाता हूँ तुम्हारी दिगंबर देह
इस हरी-भरी पृथ्वी को
संभावनाओं से भर-भरकर

चलो अच्छा है जब तक
तुम सजा रहे हो पत्तियों से
अपने घर के समय को

मैं सजाता हूँ अनथक
बरामदे के बाहर खड़ीं देवकन्या को
चाँद से आकाशगंगा से
और अपनी जादुई धुन से।

जुड़ता हूं
मैं जुड़ता हूँ अटूट तुम्हारी आत्मा से
तुम जुड़े हो जिस तरह हरे केले के पत्तों से
शहद के पुष्ट छत्तों से मासूम गिलहरियों से

जुड़ता हूँ प्रकट तुम्हारे इर्द-गिर्द की घासों से
जिन पर तुम चलते हो दबे पाँव चिड़ियों-सी

तुम्हारे भीतर रोज़ खुल रहे नए द्वार से
कमल के बीजकोष से वनस्पतियों से
नाभि पर उग रहीं उत्सुक जड़ों से जुड़ता हूँ

जुड़ता हूँ तुम्हारी परछाइयों से अपनी परछाईं मानते हुए
देहें ऐसे ही तो मिलती हैं अनंत-अनंत समय के लिए।

कहाँ मिलेगी पृथ्वी

तोते कुतरते हैं अमरूद
अपने इस काम में डूबे हुए मग्न
पृथ्वी के दुखों को कम करते
आदमी तोड़ता है रोज़ थोड़ा-थोड़ा इस पृथ्वी को
अपने लिए अँधेरे को ज़रा-सा और बढ़ाता हुआ

यह पृथ्वी तोतों के लिए एक घर है हमेशा से
आदमी के लिए एकांत में पड़ी एक स्त्री है शायद
जिसे वह अपनी वस्तु समझता रहा है बलात्कारी

एक दिन आदमी पूछता फिरेगा कहाँ पर है पृथ्वी
तोते हँसेंगे गिलहरियाँ झल्लाएँगी नेवले बिदकेंगे
आदमी के इस प्रश्न पर इसलिए कि पृथ्वी पर
कोई उत्तर कहाँ बचा रहेगा ऐसे आदमियों के रहते।

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