शहंशाह आलम की पांच कविताएं

राग : पाँच चित्र

एक

उस लड़की ने

तीली जलाई माचिस की

तीली की ज़रा-सी रौशनी ने

आग का नया गीत ईजाद किया

 

तीली की वही आग

हमारे भीतर बची है

और सूरज के भी।

 

दो

आज जिस भी द्वार को

खोला मैंने

उसमें चुप्पी नहीं मिली

अनंत दिवसों की छुपी हुई।

तीन

मेरी ही दस्तक है

अन्तरिक्ष में तैर रही

 

और यह अन्तरिक्ष में

किसी नए पर्व का समय है

विजड़ित को तोड़ता।

चार

मेरी खिड़की पर

एक चिड़िया आ बैठी है

मुझे ही झाँकती-सी

 

रात का अँधकार भाग रहा है

मेरे कमरे से

चिड़िया का गान सुनकर।

 

पाँच

कौन है जो पृथ्वी पर

गाए जा रहा है

जीवन का राग अनथक

 

परदा हटाकर बाहर देखा

उसके पैरों की आहट थी

अपने लिए मेरे ही घर में

जगह खोजती हुई

 

गान

जो गाया जा रहा है

बिना लय बिना ताल के

वह आपके समय का नहीं

मेरे समय का गान है

 

आपके समय का गान

भरा है चकाचौंध से

सुस्वादु वनस्पतियों से

अमृतमय औषधियों से

अप्सराओं के नृत्य से

मृत्यु के पराजय से

 

मेरे गान में मेरे चेहरे का

बस रुदन है अनंत तक फैल रहा

अनंत-अनंत बार

आपका मुँह चिढ़ाता

आपके गान का

वाक्य-विन्यास बिगाड़ता

 

जबकि आप मेरे साथ

जो कुछ करते हैं

पूरे अधिकार से करते हैं

सर्वसम्मत

धर्मसम्मत

विधिसम्मत करते हैं

मेरा बलात्कार

मेरी हत्या भी।

 

छाता

 

बारिश के बाद छाते में

थोड़ा पानी बचा रह गया है

 

यह बचा पानी

उन स्त्रियों की देह पर

बचा पानी है

जिन्होंने जी भर नहाया है

दिगंबर आकाश से

झरते पानी में

 

जैसे नहाती हैं यक्षिणियाँ

पृथ्वी पर नया रूपक गढ़ते

अन्तरिक्ष के लिए

अपनी देह पर पानी बचाते

 

रहने दूँगा मैं भी

छाते का पानी छाते में

स्त्रियों यक्षिणियों के

कठिन दिनों के लिए।

 

तल

तल, गहरे तल जाकर

मैं क्या लाऊँगा

जिस तल में रहती है पनडुब्बी

अपने भीतर परमाणु छिपाए

आदमियों को शहरों को

नष्ट करने के लिए तत्पर

 

तब भी तल में मैं बचाता हूँ

छंद पानी के आपके लिए

शब्द के भाषा के मुहावरे

नए द्वार खोलता हुआ।

 

चाँद की कथा

 

तुमसे शुरू हुई चाँद की रहस्य-कथा अकस्मात्

जब तुम लेटे थे ग्रहों-नक्षत्रों को अपना बिस्तर बनाकर

धोखों से बने सपनों को अपनी नींद से मुक्त करते

चाँद की लय को हरी घास पर पसारे सजग रहकर

फिर इस स्थापन को जीते चकित मैंने देखा तुम्हें

 

तुम में और इस चाँद में क्या कोई भिन्नता है

मैंने यह प्रश्न आकाशयात्री महापक्षी से किया तुम से नहीं

आकाशयात्री महापक्षी का औचक उत्तर यही-यही था

कि चाँद का छंद भंग होते देखा है अपनी आकाशयात्रा में

इनकी देह का छंद आप में आबद्ध दिखा कई-कई काल से

 

कोई कथा ऐसे ही तो बनती होगी कथा-समय में

जैसे तुम्हारी वजह से चाँद की कथा बनी

मेरी वजह से तुम्हारी अनवरत कथा रची गई

ध्रुपद में शहनाई में हारमोनियम में माउथऑर्गन में

 

इस कथा में तुम्हारा भी कंठ रहा और मेरा भी

जिसे सुनाता है हर अंतरिक्षयात्री पृथ्वी पर लौटकर

एकदम कुशल कथावाचक हो-होकर प्रत्येक बार।


शहंशाह आलम

जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार

शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी)

प्रकाशन : ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’, ‘अभी शेष है पृथ्वी-राग’, ‘अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस’, ‘वितान’, ‘इस समय की पटकथा’ पांच कविता-संग्रह प्रकाशित। सभी संग्रह चर्चित। ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’ कविता-संग्रह बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। ‘मैंने साधा बाघ को’ कविता-संग्रह शीघ्र प्रकाश्य। ‘बारिश मेरी खिड़की है’ बारिश विषयक कविताओं का चयन-संपादन। ‘स्वर-एकादश’ कविता-संकलन में कविताएं संकलित। ‘वितान’ (कविता-संग्रह) पर पंजाबी विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य।

हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। बातचीत, आलेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित।

पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार का राजभाषा विभाग, राष्ट्रभाषा परिषद पुरस्कार तथा बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘कवि कन्हैया स्मृति सम्मान’ के अलावे दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।

संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में सहायक हिन्दी प्रकाशन।

संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।

मोबाइल :  09835417537

ई-मेल : shahanshahalam01@gmail.com

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2 Responses

  1. काफी प्रभावकारी पंक्तियाँ हैं –
    “जबकि आप मेरे साथ
    जो कुछ करते हैं
    पूरे अधिकार से करते हैं
    सर्वसम्मत
    धर्मसम्मत
    विधिसम्मत करते हैं
    मेरा बलात्कार
    मेरी हत्या भी।”

  2. Paritosh kumar piyush says:

    अच्छी कविताएं…
    बधाई।

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