शहंशाह आलम की तीन कविताएं

शहंशाह आलम

 

उचाट

इन दिनों जिन रास्तों से गुज़रता हूँ
जिन पहाड़ों जिन जंगलों से टपता हूँ
ऊब उदासी से भरे दिखाई देते हैं
रास्ते पहाड़ जंगल सारे के सारे

मुँह फेर लेते हैं पेड़ भी
मकानात भी खंडहरात भी

झीलों पर नदियों पर समुद्रों पर चलता हूँ
विरक्ति से भर जाता हूँ किसी मृग-सा
पानी को किसी दूसरे रास्ते जाता देख

यह कैसी ऊब है, कैसा अधीरपना, कैसा दुष्चक्र
जलकुण्ड में उसी के साथ उगता हूँ, सँवरता हूँ
तब भी मन है कि किसी और गूँज में गूँजना चाहता है
तन है कि किसी और धार में बहना चाहता है

इन दिनों आदमियों को हाँफते-काँपते देख घबराता हूँ पूरी तरह
मालूम नहीं इस मरुथली में किस और किसके जीवन को ढूँढता हूँ

यह उचाट समय गहरे बहुत गहरे जाकर मारता है मुझे
और उस हत्यारे को लग रहा है कि जीवित हूँ मैं अब भी।
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जल को जपता हूँ

जल को जपता हूँ
जब-जब तपता हूँ

समुद्र को मथता हूँ
अगर उपेक्षित महसूस करता हूँ

गहरे तल में बैठ
सचमुच-सचमुच
गहरी शक्ति पाता हूँ।
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अपने को रचते हुए

मैंने ख़ुद को रचा
समुद्र के खारे जल को
मीठा बहुत मीठा करते हुए

इस खंडहर में जो कुछ धूल-धूसर
बचा दिखाई दे रहा है अब भी
उस धूल में उस धूसर में
ख़ुद को रचता पाता हूँ

जो शब्द जाकर वापस लौट आते हैं

या जो जल जाकर
या जो फल जाकर
या जो दल जाकर
वापस लौट आते हैं
उनमें भी ख़ुद को रचता हूँ
उन्हीं में तल्लीन

मुझे कायर जान-समझकर
कितनी-कितनी बार मारा गया
जैसे की लोगबाग
पेड़ों को
चिड़ियों को
स्त्रियों को
कायर जान-समझकर मार डालते हैं

परंतु उनके द्वारा मार गिराए जाने के बावजूद
मैं रच ही लेता हूँ ख़ुद को बारंबार
उनसे लोहा लेने के लिए।

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