शहंशाह आलम की चार कविताएं

शहंशाह आलम

जिस तरह झरना गूँजता है

जिस तरह झरना गूँजता है
आत्मीय-आत्मविभोर बार-बार
वैसे ही आकाश को गूँजते देखता हूँ
हुगली नदी के गान में आनंदित

झरने में आकाश में जो कुछ गूँजता है
उस गूँज में तुम्हारी भी भाषा की गूँज सुनता हूँ
घनीभूत अपनी इस यात्रा की गहरी चुप्पी में

फिर घन-घन ख़ुद भी बजता हूँ
लोहार के घन सरीखा
लाल उगते सूरज के रक्तकमल को
सबकुछ पारदर्शी करते देख अपने अँगार से

खीँच रहा हूँ खिंचा ही चला जा रहा हूँ
तुम्हारी ही काया-छाया में बिना ऊबे
जैसे कि रात के तारे तुम्हारे होने की धुन में
आदिवासी नृत्य करते दिखाई देते हैं
नर्म दूब को ओस-कण से नहलाते हुए

यह भी सच है अचंभित-चकित है कलकत्ता
बिचाली घाट के किनारे मुझे जल को
किसी की देह की तरह जपते हुए देखकर।
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मारने की कला

उन्होंने मारने की कितनी ही कलाएँ विकसित कर ली हैं
उन सारी-सारी मारने की कलाओं को वे हम पर ही आजमाते हैं
और यह कोई नया अचंभा कोई नया अजूबा नहीं है न कोई विस्मय
न किसी नए आखर के जन्म लेने जैसा ही है उनके शब्द-भंडार में

इसलिए कि वे हत्यारे होते हैं बस पागल हत्यारे
और बरसों से हत्या करने का काम करते चले आ रहे होते हैं
जैसे कि कोई जादूगर कोई मदारी वाला कोई नट कोई ठग
एक ही काम से लगा-भीड़ा होता है पूरी तरह लगनशील निपुण
वैसे ही एक हत्यारा किसी स्त्री से प्रेम करते समय तक में
इस-उस की हत्या का नया तरीक़ा ढूँढ़ रहा होता है अवरोधरहित

कोई कवि कोई शायर कोई लयताल करने वाला
अपनी कविता में अपनी ग़ज़ल में अपने सुर-ताल में
चाँद को कभी इस तरफ़, तारों को कभी उस तरफ़ रखता-बिठाता है
वैसे ही एक हत्यारा अपने हथियार को रोज़ एक नया मुहावरा देता है

जैसे कि आप-हम किसी हत्यारे से छिपने के लिए कैसी-कैसी जगहें रखते हैं
एक हत्यारा मारना चाहता है तो मार ही डालता है आपको हमको खोजकर

एक बात बिलकुल सच है हम अपने जीवन में बहुत कुछ नहीं चाहते हैं
बस रोटी चाहते हैं, भात चाहते हैं, किताबें चाहते हैं, चाकरी चाहते हैं
जीने के लिए इस छोटे-से जीवन को इस कम दिनों की आयु को

जबकि सच यही है कि एक हत्यारा अपना जीवन अपनी आयु बढ़ाने के लिए
किसी न किसी को मारता-काटता ही जाता है दुर्व्यसनी रोज़-ब-रोज़।
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प्रकट जो रह गया है
उसने खिड़की खोली अपरिवर्तनीय अनंत के बीच
जिसके बाहर दिखा वही प्राचीन अतिप्राचीन सबकुछ

वही अपरिसीम दुःख, जो पूरी तरह अपना था
वही दोषयुक्त दिवस, जो अपवचन से भरा था
वही अपरिभाषित अपरिमार्जित पदचिह्न, जो भय युक्त थे

बस, जो नया था अनूठा था
जादू भरा था उस खिड़की से बाहर
उसका प्रेम था अपरिमित अपरिमेय
बचा हुआ उस महुआ-वृक्ष की जड़ में
उसके जीवन को रोज़ नया आकार नया साकार
देता हुआ मीठे पानी की तरह।
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गाली

इन दिनों गाली देने की उच्चकला विकसित की गई है

जैसे कोई कुछ-न-कुछ गाकर अपने को ख़ुश रखता है
थवा कोई किसी प्रसिद्ध मंत्र का जाप करके स्तुति करके
स्वयं को स्वयं के द्वारा किए गए पापों से मुक्त करने का स्वांग रचता है
वैसे ही गाली देनेवाला दूसरों को असमर्थ जान
गालियाँ देता जाता है मस्त पूरी तरह तल्लीन

सच यही है अब जो भी गालियाँ देता है उसे पता होता है
कि गालियाँ देते हुए अपने चेहरे का गांभीर्य बनाए रखना है
ताकि किसी और किसी और किसी और को लगे
कि वह गालियाँ नहीं दे रहा माँ-बहन की बाप-भाई की
बल्कि समझा रहा है अत्यधिक सीधे-सादे तरीक़े से
उस अगले व्यक्ति को उस पगले व्यक्ति को

जैसे उसने मुझे गालियाँ दीं स्वादिष्ट और पुष्टिकारक शब्दों में
और जब शिकायत लेकर उसके आका तक पहुँचा भयभीत
तो उस आका ने मेरी पीठ थपथपाई किसी अपने की तरह प्यार से
फिर सौ गालियाँ दीं यह कहते हुए
कि गाली अब गाली रही कहाँ
गाली भी तो जीने की एक कला हो गई है

उस आका ने यह भी गाली की भाषा में ही समझाया
कि रोज़ यहाँ आ जाया करो मेरी गालीमंडली में

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3 Responses

  1. सुषमा सिन्हा says:

    बेहतरीन कविताएँ !!

  2. रमेश प्रजापति says:

    मैं हमेशा से ही शहंशाह आलम की कविताओं का प्रसंसक रहा हूँ। आप उनकी ताज़ातरीन बेहतरीन कविताओ से रूबरू कराया धन्यवाद। भाई शहंशाह आलम को बधाई

  3. Parmod singh says:

    Bahut uttam poems hai
    bahut kuch vaikt karti

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