शहंशाह आलम की पांच कविताएं

 विस्थापन

मेरा यह विस्थापन करोड़ों-करोड़ बरस का है जाना हुआ

जिसमें छिपाने जैसा कुछ भी नहीं न बचाने जैसा कुछ है

कुछ है भी बचा हुआ तो वह दूर किया जा चुका है मुझसे

 

अड़ा खड़ा उस पेड़ को जब हटाया गया बलपूर्वक

कितने-कितने पक्षी विस्थापित हो गए बरसात में

कितनों से उस पेड़ की छाया छूट गई गर्मी के दिनों की

 

मेरे समय की बुराइयाँ करोड़ों बरस की हैं जो अंतहीन हैं

जिसमें जब-जब वे आते हैं अपने झूठ की खेती ही बोते हैं

उनके झूठ बके जाने के विरुद्ध कोई ज़िक्र नहीं है संविधान में

 

यह बात वे बख़ूबी जानते रहे हैं हर मध्यांतर के पहले और बाद में

वे क़समें खाते हैं हर दफ़ा ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा पाने से पूर्व

वे एक ख़ास वर्ग एक ख़ास जाति एक ख़ास वक़्त को चुनते हैं

फिर अपने दिन-रात हमें विस्थापित करने में गुज़ारते हैं उम्मीद से भरे

कि उनके इन कारनामोँ के एवज़ उन्हें एक बार फिर सत्ता सौंपी जाएगी

जबकि मेरे विस्थापन से पानी के सोते सूख जाते हैं नदियाँ रुख़ मोड़ लेती हैं

जंगल का घनापन ख़त्म हो जाता है उनके इन कारनामोँ की मुख़ालफ़त में

सवेरा ख़ुद को अँधेरे में बदल लेता है अँधेरा और अँधेरे में मुकम्मल तरीक़े से

 

मैं जो ढोल बजाने वाला हूँ मदारी का खेल दिखाने वाला हूँ शहद बेचने वाला हूँ

मैं जिसके जीवन में न स्वाद है न रस न उनके रंग में भंग डालने वाला कुछ हूँ

फिर वे हमारे विस्थापन को और ज़्यादा बढ़ाने के लिए क्यों फ़िक्रमंद हैं इन दिनों।

 

बस लाठी

बहुतों ने बहुतों बार बनना चाहा बहुत कुछ

अपने-अपने अनुभवों के हिसाब से

सूखी घासों पर चलते हुए टेढ़ी चाल में

समय की हालत को और बिगाड़ने के लिए

मैंने बनना चाहा लाठी बस लाठी

इस बिगाड़े जा रहे इतिहास को

दुरुस्त-ठीक करने के लिए चतुराई से

आप मेरे लाठी बनने के विचार से सहमत नहीं होंगे

मेरी शून्यता में शून्य का एक और पत्थर मारते

तब भी मैं लाठी ही बनना चाहूँगा

अँकुरा रहे बीजों की रक्षा में।

युद्ध

मैं अपने करोड़-करोड़ दिनों में

करोड़-करोड़ बार लड़ता हूँ युद्ध

और हारता हूँ करोड़-करोड़ बार

 

उनकी अनुभवहीनता का तमाशा देखिए

वे युद्ध को इतना आसान जानते हैं

कि देश को युद्ध में धकेलना चाहते हैं

अपने हारने वाले चुनावों से बचने के लिए

 

देश के अमात्य-महामात्य के करोड़ों बरस

बीतते हैं जनता को मारने-काटने में

मैं दिल से चाहता हूँ करोड़-करोड़ युद्ध

उन्हीं के विरुद्ध सिर्फ़ उन्हीं के विरुद्ध लडूँ

ताकि उन्हें मालूम पड़े युद्ध होते क्या हैं

 

सच तो यही है बस यही है

कि देश का कोई अमात्य-महामात्य

अपने करोड़-करोड़ बरस के इतिहास में

मनुष्य बनकर नहीं रहना चाहता

बस ख़ूनी क़ातिल बनकर रहना चाहता है

पृथ्वी की हालत ख़राब करने के लिए

 

मैं होऊँ या आप, अपनी पृथ्वी के विरुद्ध

किसी को ऐसा कैसे करने दे सकते हैं

आने वाले करोड़-करोड़ बरसों में

 

ख़राबी

हमारे भीतर जो भी ख़राबी है

वह करोड़ों बरस की है

 

इस ख़राबी को ठीक करने के लिए

हमारे करोड़ बरस की अच्छाई को

लानी होगी बाहर अपने भीतर से

 

हालत यह है कि हालत हमने इतनी ख़राब कर ली है

कि मनुष्यों वाली अच्छाई अब ढूँढ़ने से नहीं मिलती

न इतिहास न भूगोल न जीवविज्ञान न प्रकृतिविज्ञान में

 

तब भी बेवक़ूफ़ी भरी घोषणा रोज़ आ रही है उनकी ओर से

कि दुनिया में डंका बस हमारा ही बज रहा है इन दिनों

 

ढोलकिया 

ढोलकिया अपनी ढोलक बजाता है

कभी आहिस्ता कभी ज़ोर से

जिस तरह वह हँसता रहा है

कभी आहिस्ता कभी ज़ोर से

 

लेकिन इन दिनों ढोलकिया

ढोलक बजा रहा है बिना मुस्कुराए

अपने दुखों का तर्जुमा करते हुए

 

दुखों के इस तर्जुमे में

किनका दुःख तलाश रहा है ढोलकिया

दरख़्त के साए में दरख़्त से टिका

 

आपको पता हो न हो

मुझे पता है ढोलकिया

ढोलक के स्वर को साध रहा है

जिस सफ़ाई से

जिस मेहनत से

जिस लगन से

अपने दुखों को कहाँ साध कहाँ पा रहा है

उसी जतन से चाहकर भी

 

दुःख अनगिन हैं जिन्हें

ढोलकिया बिना गिने व्यक्त करता है

अपनी ढोलक पर थाप दे-देकर

सन्नाटे को भगाते-तोड़ते

 

लेकिन हमारे दुखों को

हर दिन बढाती सरकारें

संभलती कहाँ हैं

बाज़ आती कहाँ हैं ऐसा करने से

ढोलकिया के विरोध-स्वर को सुनकर भी

उनके दुखों के कारण जानकार भी

 

यह भी सच है

हर ढोलकिया जाग रहा है

अपने विरोध को साधते हुए

अपनी ढोलक की आवाज़

दूसरे ढोलकिया तक पहुँचाते हुए

 

ढोलकिया को पता है

ऐसे ही एक-दूसरे की आवाज़ों को जोड़कर

इन पॉकेटमार

इन आदमीमार

इन जीवनमार सरकारों से

मुक्ति का रास्ता निकलेगा

किसी न किसी रोज़ ज़रूर


शहंशाह आलम

जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार।

शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी)

प्रकाशन : ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’, ‘अभी शेष है पृथ्वी-राग’, ‘अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस’,  ‘वितान’, ‘इस समय की पटकथा’ पांच कविता-संग्रह प्रकाशित। सभी संग्रह चर्चित। ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’ कविता-संग्रह बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। ‘मैंने साधा बाघ को’ कविता-संग्रह शीघ्र प्रकाश्य। ‘बारिश मेरी खिड़की है’ बारिश विषयक कविताओं का चयन-संपादन। ‘स्वर-एकादश’ कविता-संकलन में कविताएं संकलित। ‘वितान’ (कविता-संग्रह) पर पंजाबी विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य।

हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। बातचीत, अालेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित।

पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार के अलावे दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।

संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में सहायक हिन्दी प्रकाशन।

संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।

मोबाइल :  09835417537

ई-मेल : shahanshahalam01@gmail.com

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