शहंशाह आलम की कविता ‘यक्षिणी’

एक

यह आकाश जो कोरा है

तुम्हारी छुअन की प्रतीक्षा में

शताब्दियों-शताब्दियों से

 

अंतरिक्ष की सीढ़ियाँ पकड़कर

अपने यक्षपति से छुप-छुपाकर

तुम उतरते हो सखियों के संग-साथ

और बादलों को सियाही बनाकर

लिखते हो कोरे आकाश पर

प्रेम की अमर कथाएँ मेरे लिए

 

अपार दिनों से पसरा

मेरे चेहरे का सन्नाटा

छू हो जाता है पल में

 

दो

तुमने बताया तुम्हारा घर

मेरी खिड़की के बाहर अनंत में है

जैसे मेरा घर पृथ्वी पर हुआ करता है

इस देह के बचे रहने तक

 

तुमने सच की तरह सच कहा

मेरा घर ढह जाता है वक़्त के साथ

छप्पर उड़ जाता है बिजलियों की कड़क से

ज़रा-सी तेज़ आँधी-बारिश के आते ही

 

तुम्हारे घर के बारे में

तुम्हारा ख़्याल था

कि तुम्हारा घर रत्न-जड़ित है

अजर है अमर है सज्जित है आकाशगंगा से

जैसे तुम अजर-अमर हुआ करते हो

 

तब भी मेरा घर ढूँढ़ निकालते हो तुम

आँधियों बारिशों के गुज़र जाने के बाद

मेरे घर को अपना घर मानते हुए

 

तीन

तुम स्वर्ग की चौपाइयाँ सुनाते हो

जब अपनी धुन में मगन

मेरे आँगन में उग आईं

वनस्पतियों की हज़ार-हज़ार क़िस्में

पुरखों की तरह मुझे आकर दुलारती हैं

मेरी इस योनि को अपनी औषधि से चमकाते

 

तुम्हें लगता है मैं ही यक्ष हूँ तुम्हारा

तुम्हारी ही तरह मृत्यु को पराजित करता हुआ

 

चार

मूँद लेता हूँ पलकें तुम्हारे कहने से

खोलता हूँ जब अपनी मूँदी पलकें

पाता हूँ तुम्हें इस अजब-ग़ज़ब कालखंड को

एक नए आकार में साकार करते

अपने देवचिह्न में रंग भर-भरकर

किसी शुद्ध कलाकार की तरह

 

सुनो, यक्षिणी! भूले हुए सारे शब्द

लौट रहे हैं तुम्हारी नाभि की तरफ़

मेरे हाथों ढले जलकुंड में नहा-धोकर

 

पाँच

तुमने कहा नर्तक अपने इस समय से बतियाते

कि यक्ष-प्रश्न कठिन होते हैं चट्टानों की तरह

 

प्रश्न तो अकसर कठिन ही होते हैं

मेरे मनुष्य-जीवन के और तुम्हारे यक्ष-प्रेम के

 

तुम्हें पाने के लिए पृथ्वी पर नक्षत्रों को छितराते

युधिष्ठिर जैसा हर यक्ष-प्रश्न के लिए तैयार हूँ तब भी

 

छह

मेरा एकांत उस समय भी मेरा था जब तुम नहीं थे

मेरा एकांत अब भी मेरा है जब तुम हो

इसलिए कि यह एकांत मेरी आत्मा की तरह है

जिसमें तुम नृत्य करते हो बिना थके बिना मुझे हारे

 

और यह अंतरिक्ष रोज़ अनथक गाता है तुम्हारी इस देह को

मेरी देह से मिलाता किसी प्राचीन लिपि को स्वर देता हुआ।

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