शहंशाह आलम की छह कविताएं

हमला
हम गहरे, बेहद गहरे अँधकार भरे युग को जी रहे हैं
जिसमें हम प्रेम करते हैं तो हम पर हमले किए जाते हैं
एक सफल हत्या एक सफल बलात्कार के लिए सम्मानित

अब उनके शब्दों के वर्ण विन्यास, अर्थ, प्रयोग, व्युपत्ति, पर्याय यही थे
कि उन्हें भेड़ों के साथ जी रहे गड़ेरिये के नहीं हत्यारे के चेहरे पसंद थे

तुम जो उनके हर हमले में साथ होते हो ‘खी खी’ हँसते हुए
क्या एक दिन वे तुम्हें भी मार नहीं डालेंगे धारदार हथियार से
अपने अत्याचार का स्वर्णिम युग स्थापित करने के लिए

जबकि तुम ख़ुश हो रहे हो कि तुम बचे रहोगे इसी तरह

 

    माँ के एकांत से एक कविता

माँ एकांत में हैं करोड़-करोड़ दिनों से

अपनी सूई, अपने तागे, अपने चश्मे के साथ

अपनों की प्रतीक्षा में जाड़े के इन दिनों उत्सुक

 

इसे ईश्वर का नया चमत्कार कहिए

माँ जिन अपनों के लिए मुन्तज़िर हैं

सच यही है कि माँ के अपने नहीं लौटते

न मैं लौटता हूँ उनके एकांत के दानव से

हज़ार गालियाँ सुनने के बावजूद

 

माँ किससे बहस करें इस ख़राब समय को लेकर

अपनी सूई से, अपने तागे से, अपने पुराने चश्मे से

या अपने एकांत के दानव से

या प्रार्थनाघर में क़ैद अपने ईश्वर से

 

माँ बहस नहीं करतीं अपने एकांत तक से नहीं

सुबह हो रही हवा से संवाद करती हैं

सलामत रहें सभी अपने हर शीतलहरी में।

     थोड़ा

माँ ने कहा चावल थोड़ा है गेहूँ थोड़ा है घर में

सरसों चीनी थोड़ी है बची हुई

मूँग अरहर की दाल है थोड़ी बची हुई

 

जो चूल्हे की आँच पर पक रहा है

वह भी थोड़ा ही है

 

माँ को शायद नहीं मालूम

सभी थोड़े से ही काम चला रहे हैं इन दिनों

 

घसियारे के यहाँ बढ़ई के यहाँ लोहार के यहाँ

नट के यहाँ मदारी के यहाँ कुँजड़े के यहाँ धोबी के यहाँ

कुम्हार के यहाँ जो कुछ है थोड़ा ही है बचा हुआ

 

इज़्ज़त थोड़ी बच रही है प्यार थोड़ा बच रहा है

अचंभा थोड़ा बच रहा है विश्वास थोड़ा बच रहा है

 

तोते के लिए कबूतरों के लिए ऊँटों के लिए

जगहें कम बच रही हैं पृथ्वी पर

 

मुहावरा भी थोड़ा ही बच रहा है जीवन में

 

विवेचन भी उल्लास भी विश्राम भी मूल्य भी

सब थोड़ा ही तो है बचा हुआ हमारे यहाँ

 

जो चीज़ें ज़्यादा बच पा रही हैं घरों में

वे दाल रोटी भात जैसी चीज़ें नहीं हैं

न फल न सब्ज़ियाँ न वनस्पतियाँ

 

न नानी-दादी की दुआएँ न पिता का आशीर्वाद

न रिश्तेदारों की याद न दोस्तों की मीठी तकरार

 

बस जो कुछ बच पा रहा है पूरी ईमानदारी से इन दिनों

हमारे घरों में हमारे जीवन में हमारी दिनचर्या में

 

घृणा बलात्कार हिंसा बच रही है

रोना-रोहट बच रहा है मृत्यु बच रही है

भूख बच रही है कठिनाई बच रही है

 

आरोपण बच रहा है

अपराध बच रहा है

गिरना बच रहा है

धिक्कार बच रही है

हिकारत बच रही है पूरी चालाकी से

 

और ये सारी चीज़ें कठिन हैं कठिनतर हैं

हमारे जीवन में दिक़्क़तें बढ़ा रही हैं

 

विकल्प जो बचा है यही बचा है

कि हमारे हिस्से का बहुत सारा

सरकारें जो हड़प जा रही हैं

 

हम अपने हिस्से का माँगें नहीं

छीन लें देश की सरकारों से

लय

एक लय है जो थिरक रही है उसकी आत्मा में

थिरक रहा है पानी उसकी दिगंबर देह की धुन में

 

थिरक रहा यह पानी आ उतरे इस रेतीले बेहद रेतीले दिन में

वह गाछ हो जाए फिर से हरा जिसके पत्ते सूख चुके भय से

 

मैं जानता हूँ एक नई भाषा जो रची जा है उसी से लयबद्ध

मेरे सूखे दिनों को हरियल दिनों में बदलने के लिए काफ़ी होगी

 

माँझा

क्या मैं एक पतंगबाज़ हूँ

पतंग उड़ाने की कला में माहिर

 

इस ओर से उस छोर जब उमस भर रही है

मेरे कमरे में मेरे घर के बाहर मेरी आत्मा में भी

कैसे कहूँ मैं एक कुशल पतंग उड़ाने वाला हूँ

 

फिर भी तैयार करता हूँ आकुल-व्याकुल

पतंग की डोर को मज़बूत करने के लिए

शीशे का बुरादा एकदम महीन

और लेई बिलकुल गाढ़ी लसीली

 

मैं जो भेड़ों के साथ रहा हुआ गड़ेरिया हूँ

मिट्टी के साथ रहा हुआ कुम्हार

कपास के साथ रहा हुआ सूत कातने वाला

मैं एक दक्ष पतंगबाज़ ना भी होऊँ

तो क्या मुझे पतंगबाज़ी नहीं करनी चाहिए

 

मुझे पता है, आप मुझे क़तई मना नहीं करेंगे

पतंग उड़ाने से तागे को मज़बूत करते हुए

 

मुझे यह भी पता है, वे मुझे मना ज़रूर करेंगे

जिन्हें भय है मेरे माँझे से कि मैं काट दूँगा

अपने कमरे अपने घर के बाहर अपनी आत्मा की उमस को।

    जाड़ा लाँघ रहा है

जाड़ा लाँघ रहा है दूर नज़दीक के सारे दृश्य-दृश्यांकन

नदी जैसे लाँघती है अपना किनारा, बताया था तुमने

तुमने यह भी बताया था कि बारिश अपना काम करती है

जाड़ा भी अपने काम को पूरा कर लौट जाएगा अपने घर

 

सच तो यही है, तुम भी तो आते हो मेरे दिनों को स्वर्णिम बनाने

फिर लौट जाते हो मेरे लिए एक और नए दिन को छूने इस जाड़े जैसी।

 

  • शहंशाह आलम

जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार

शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी)

प्रकाशन : ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’, ‘अभी शेष है पृथ्वी-राग’, ‘अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस’, ‘वितान’, ‘इस समय की पटकथा’ पांच कविता-संग्रह प्रकाशित। सभी संग्रह चर्चित। ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’ कविता-संग्रह बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। ‘मैंने साधा बाघ को’ कविता-संग्रह शीघ्र प्रकाश्य। ‘बारिश मेरी खिड़की है’ बारिश विषयक कविताओं का चयन-संपादन। ‘स्वर-एकादश’ कविता-संकलन में कविताएं संकलित। ‘वितान’ (कविता-संग्रह) पर पंजाबी विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य।हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। बातचीत, आलेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित।

पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार का राजभाषा विभाग, राष्ट्रभाषा परिषद पुरस्कार तथा बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘कवि कन्हैया स्मृति सम्मान’ के अलावे दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।

संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में सहायक हिन्दी प्रकाशन।

संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।

मोबाइल :  09835417537

ई-मेल : shahanshahalam01@gmail.com

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