शैलेंद्र शांत की पांच कविताएं

गांधी जी के बंदर
जो देख सकते हैं
देखना नहीं चाहते
जो बोल सकते हैं
बोलना नहीं चाहते
जो सुन सकते हैं
सुनना नहीं चाहते
बहुत समझदार हो गए हैं
गांधी जी के बंदर!

 

जिंदगी!

तू कहीं
सजा तो नहीं…
खुद ही
पूछ बैठती हो
जब भी
पाती हो तन्हा
कि बताओ-
मजेदार हूं न
बे-मजा तो नहीं…

फिर

फिर धमाके
फिर लपटें
फिर तड़-तड़ की
बौराई आवाजें
फिर रक्त से सनी सड़कें
फिर टूटे-कटे अंग
फिर चीख-पुकार
फिर आर्तनाद
अरे, तुम कैसे हो इंसान

ताल -बेताल !

लड़ोगे
तो मरोगे
साथ साथ
मार डालोगे
बहुत सारी
सम्भावनाओं को
किसी की कोख
कुचल दोगे
किसी की मांग
कर दोगे सूनी
छीन लोगे
प्रेम किसी का
किसी का आसरा
यह मरने मारने का
उन्माद बंद करो तुम
और तुम भी
कुछ निर्माण की बात करो
अब भी सूखे हैं कंठ
खाली हैं पेट
दोनों तरफ
बीमारियां बची हैं
बहुत सारी
नजर उनपे भी
कुछ डालो
बंद करो
यह ताल ठोकना !

पहल
कुछ तो तय करना ही होगा
जंगल, घाटी, खोह, सुरंग
बंकर, टैंक, बारूदी दुर्गंध
जख्म-मवाद, क्षोभ-अवसाद
कटे हाथ, टूटे पांव
सूना शहर सूने गांव
शिविर, पलायन, विस्थापन
क्रंदन-विलाप
और पश्चाताप
कुछ तो तय करना ही होगा
युद्ध!
या फिर शांति!!

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