शैलेंद्र शांत की चार कविताएं

शैलेंद्र शांत

 

उसके सीने पर सवार थी इमारत

मछलियां बार-बार
ऊपर आ जाती थीं
और पलट कर
गोताखोर बन जाती थीं
इस छोर, उस छोर
कुछ लोग उन्हें फंसाने की फिराक में
बैठे थे बंसी डाले
और उधर उस छोर पर
बैठे थे कुछ जोड़े
अपनी सुध खोए
और उस ओर बर्तन साफ कर रही थीं
कुछ औरतें, उन्हें ताकती-मुस्करातीं
कुछ बच्चे सीख रहे थे तैरना
और कुछ बड़ी होतीं बच्चियां
छीटें मार रही थीं एक-दूसरे पर
तभी अचानक दृश्य से गायब हो गए थे सब के सब
लाल हो चुका था तालाब का पानी
कुछ लाशें भी दिखी थीं तैरती हुईं
लाशें दिखीं तो बंदूकें चलने की
आवाजें गूंजने लगी थीं कानों में
(यह सत्तर के दशक के न्याय की इबारत थी)
वह तीसरी मंजिल के एक दड़बे में सो रहा था
सोते से हड़बड़ा कर उठा तो पाया
कि वहां न मछलियां थीं
न बंसी वाले
न जोड़े, न औरतें, न बच्चे
न बड़ी होतीं बच्चियां
वह तालाब भी नहीं था वहां
वह तो भेंट चढ़ चुका था
विकास की वेदी पर
उसके सीने पर सवार थी तीन मंजिली इमारत
जिसमें सो रहे थे लोग गहरी नींद
वह जो जागा था अभी-अभी
लाशों को देख घबरा गया था बुरी तरह!

मैं गलत होना चाहूंगा !

कभी प्रेम
बेहोशी में किया जाता था
नशे में सराबोर
सहराओ में भागते
जंगलों में भटकते
समुद्र में समाते
चैन और नींद से
दुश्मनी निभाते
तारों को गिनते
और बिस्तर पर छटपटाते
कभी पागलपन की हद तक जाते
इन दिनों होशो हवास में
बही खाते के साथ
इसकी उसकी तरह

कहीं मैं गलत तो नहीं
प्रेम के हक में
मैं गलत होना चाहूंगा…

किस्तों में मरते जाते हैं…!

किस्तों में मिलते हैं
किस्तों में बिछुड़ जाते हैं
किस्तों में लुटते हैं
किस्तों में लूट मचाते हैं
किस्तों में मनुहार प्रेम की
नफरत भी किस्तों में निभाते हैं
तोहफा किस्तों की ऐसी
कि किस्तों में जीते हैं
किस्तों में मरते जाते ह

प्रहार

ऊपर आसमान पर छाई है बदली
नीचे उमस का क़हर बरकरार
और इधर बाज़ार में मार पे मार
कितने बेबस, हम कितने लाचार
जिस पर भी करते हैं भरोसा
पेट पर करता वही प्रहार

 

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