बेटा, बेटी और बख्शीश

शैलेंद्र सिंह
ऑपरेशन थिएटर में ऑपरेशन चल रहा है , बाहर परिजन आशंकित है | ऐसे में कोई आ के कह दे, जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित हैं तो, चेहरे खिल उठते हैं |
परिजन अब लालायित हैं ये जानने के लिए कि  लड़का है या लड़की | ओ० टी०के बाहर बैठे चौकीदार ने उनकी लालसा को भाँपा, धीरे से फुसफुसाते हुए कहा “शायद लड़का है” | अब क्या, गांधीजी चौकीदार की मुट्ठी में कैद हो गये | देशी घी की मिठाइयां आ गईं | मुबारकवाद का दौर भी शुरू हो गया | चारों तरफ फोन घूम गये | घर के बड़े बुजुर्ग मूंछों पर ताव देने लगे | स्वीटी, पप्पू ने तो भतीजे का नाम भी सोच लिया और भैया से नेग में, अपने लिए नए मोबाइल की फरमाइश भी कर दी |
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बीस मिनट बाद ओ० टी० का दरवाजा खुला | मुस्कुराती हुई नर्स, सफ़ेद टॉवल में लिपटी हुई एक नन्ही सी, प्यारी सी जान ले आती है |
मुबारक हो घर में लक्ष्मी आयी है |
क्या ?
एक पल के लिए सन्नाटा छा गया और फिर हंगामा कहर बरपाने लगा |
अरे अभी तो लड़का था लड़की कैसे हो गया ? साजिश है, यहां बच्चे बदले जाते है, लड़के बेचे जाते है | डॉक्टर को पीटो | पुलिस बुलाओ, पत्रकार बुलाओ | लूट है, सब चोर हैं |
डॉक्टर ने लाख समझाया कि ये संभव नहीं | चौकीदार ओ० टी० के अंदर आ ही नहीं सकता  लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं।
चौकीदार भी गिड़गिड़ाया, मैंने तो “शायद कहा था” |
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प्रेम बाधाओं से होकर गुजरता है , नफरत तो दौड़ता ही चला जाता है | पुलिस भी आयी, पत्रकार भी, जांच भी हुई | बख्शीश की बात हुई, चौकीदार, नर्स, डॉक्टर की बात हुई | लूट, महंगाई, डॉक्टरों के लुटेरेपन की बात हुई |
लक्ष्मी की बात नहीं हुई |
शायद इस कलियुग में, सोने, चाँदी, कागज़ के लक्ष्मी के आगे घर की लक्ष्मी की आवाज कम लोगों को पसंद आती है |

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