शशांक मिश्रा की एक ग़ज़ल

वो क्या लोग थे साक़ी, क्या अजब मंज़र था।
वही मुस्कुरा के मिले जिनके हाथों में खंजर था।
राज कितने मुस्कुराते लबों ने छुपा लिए।
किसे कब पता था कि आँखों में समंदर था।
साक़ी दिखाते भी तो कैसे दिखाते तुझको।
घाव जो भी था सीने के अंदर था।
नशा-ए-शोहरत ने कब किसे बख्शा है,
किसे पता है कि तू भी कभी सिकंदर था।

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