शिवदयाल की लंबी कविता ‘अंत, अंत हे गर्दनीबाग!’

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2 Responses

  1. अति सुंदर कविता.
    गर्दनीबाग की यादें वापस लौट आईं.
    मेरे स्कूल के दिन भी गर्दनीबाग में बीते हैं. मैंने यहां की बारिशें भी देखीं हैं और बसंत भी देखे. सरकारी क्वार्टर्स के लिए प्रसिद्ध गर्दनीबाग के रक्तिम सेमल के फूलों से लदे पेड़ों से आती पपीहे की “पीकहां” भी सुनी है और मदमाती आम्र-मंजरियों में से आती कोयल की कूक भी…
    पर वक्त चला गया…और वक्त के साथ ही वे वसंत भी चले गए….वे बारिशें भी चली गईं…नहीं गईं तो उस खूबसूरत गर्दनीबाग की यादें…

  2. Krishna kalpit says:

    बेहद मार्मिक कविता ।

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