शिवदयाल की तीन कविताएं

ड्रॉप आउट

सोचा था
तुम पर लिखूँगा एक कहानी

खूब सोचा जब इस बात पर
तो पाया
तुम तो कविता का विषय हो
ए सरिता !

तुमसे भी कहा था
वादा किया था मैंने
कि लिखूँगा जरूर एक कहानी
कि कैसे बनती फिरती है
एक छोटी-सी किशोरवय लड़की
गाँव भर की नानी

लेकिन मेरे कहन पर
भारी पड़ती है तुम्हारी नादानी,
और वह कौतुकपूर्ण विश्वास
‘हमें भी जरूर बताइएगा चाचा – !’

ओह, मैं कैसे पिरोऊँ कथा में यह सब –
जैसे कि
खेल-खेल में तुम जो
इतने सारे काम करती जाती हो –
रोपनी, सोहनी, कटनी, दँवनी
तुम्हारी देह-भंगिमाओं में
व्याख्यायित होता है ऋतु-चक्र

तुमने मास्साहब को कैसे छकाया
और स्कूल जाने से इनकार कर दिया
चारा ढोते कैसे सीधी की
कितकित की उलटी गोटी –
मैं कैसे लिखूँ
कैसे कहूं कि
भुअरी गइया की बाछी की
आखिर तुम लगती कौन हो !

तुम तो हो
स्कूल से ‘ड्राप आउट’
और लिख सकती हो
बस स से सरिता
लेकिन यह तो बताओ
कि गाँव भर के जनावर
और चिरई-चुरुँग
कैसे समझ लेते हैं तुम्हारी भाषा ?

कागज चबाती बकरी
मुर्गियों पर झपट्टा मारता कुत्ता
आपस में सींग लड़ाती गऊएँ
झट मान लेते हैं तुम्हारी बात ?

तुमने आखिर
कौन-सी पढ़ाई पढ़ी है
ए सरिता
तुम पर लिखी जा सकती है
सिर्फ कविता !

सच सरिता,
किसी कथानक में नहीं समाते
तुम्हारे नन्हें-नन्हें सरोकार
जिनसे चलता है वास्तव में
जगत का  जीवन-व्यापार !

(’ कवि के गाँव शीतलपुरा , सीवान की एक बच्ची)

 

घोंघा

घोंघे को मिला है कवच
जो बसेरा भी है उसका !

घोंघा अपना कवच
साथ लिए चलता है
अगर चलने की दरकार हो

जरा-सी आपदा की
आहट हो या
कोई अजनबी स्पर्श
घोंघा दुबक आता है
अपने खोल में
अगर किसी विवशता में
जरा देर के लिए
आ भी जाए बाहर ।

घोंघा जी नहीं सकता
निष्कवच
घोंघा अपने कवच में ही
मर जाना चाहता है ।

आदमी अंदर से कहीं
घोंघा होता है !

नाव                                          

कागज की है
यह नाव
ओ लहरों ….
देखना,
अपनी तरंगों की गति में
कहीं इसे ले न डूबना
यह नाव कागज की है !

चलेगी थोड़ी दूर,
भीगेगी, फूलेगी
धीरे-धीरे इसमें रिसेगा पानी
फिर खुद ही ढूँढ लेगी सतह

तब तक लिए जाना
इसे नजरों से दूर
और करने देना किल्लोलें
शिशु –मन को !
ओ लहरों …

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