शिवदयाल की तीन कविताएं

प्रतीक्षा

प्रियजन-स्वजन सारे छूट गए,
मेरी सूनी-रातों के तारे
हाय बुझ गए !
इस एकाकी अन्धियारे पथ पर
एक टिमटिमाते प्रकाश –स्तम्भ के नीचे
तब भी प्रतीक्षा करती- सी
मैं क्या जानूँ कि तुम ?
हाँ तुम ही खड़ी हो !

प्रतिबद्धता

कुछ नहीं
कहीं कुछ नहीं
इस उबड़- खाबड़
अंतहीन रास्ते पर
दृष्टिहीन कर देनेवाले
अंधियारे में
पसरा हुआ सन्नाटा है
जिसमें हमारी
उखड़ती साँसों का शोर है
बस !

पर अभी पुतलियों में शेष है
उसकी रश्मियों की थिरकन
जिस प्रकाश के लिए
हम इतनी दूर चले ..
फेरीवाले
फेरे लगाते फेरी वाले
कभी न डिगते
कभी न थकते
ये वामन के डगवाले

अपने-अपने फेरों में
जो रहते-हरदम गुम
उन्हें उनकी याद दिलाते
खोमचा बक्सा ठेलावाले

कितनी-कितनी चीजों से
करते हैं आबाद
खाली जगहें भरते हैं
बूंदे झुमके तालेवाले

चाहे सूरज चाँद सितारे
सबके अपने फेरे
घूम-घूम कर बता रहे
‘हरेक माल एक दाम’ वाले

हम भी तो हैं लगा रहे
जनम-जनम के फेरे
सोए हुओं को जगा रहे
पुकार लगाते फेरीवाले

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