शिवदयाल की तीन कविताएं

वार

वे/पहले
मारते हैं शब्दों से,
जुमलों से गोदते हैं
पहले-पहल
जैसे – गद्दार !

तब करते हैं
खंजरों-तमंचों से वार …!

मालूम है इन्हें
कि अगर कहीं
खाली भी जाये वार खंजर का
तब भी शब्द
अपना काम करते रहेंगे …..

एक पूरा,
मुकम्मिल इंतजाम है यह
चाँदमारी का
जिसमें शिकार बच निकला
तब भी जीते जी मरता रहेगा !
मारने वाले को और क्या चाहिए ?

जो खेलते हैं शब्दों से
जो रहते हैं शब्दों की दुनिया में
ताज्जुब हैं,
शब्दों की इस भूमिका से
अनजान बने हुए हैं
कि शब्द भी करते हैं काम तमाम
कि जैसे खंजर और तमंचे
जाने कबसे,
जाने कबसे …. !

शरणार्थी बच्चा

एजीयन सगर की फेनिल लहरों से टकराती
बोडरम तट पर निस्पंद पड़ी
तेरी देह – नन्हीं-सी
धरती पर संवेदना के लिए
करुणा के लिए, दया के लिए
और प्रेम के लिए
दोबारा जगह भर रही है

चिरनिद्रा में लीन बालक
तू इस सोते संसार को जगा रहा है
देख, कैसे तंद्रा टूटी है तुर्की की
कैसे यूरोप अपना वैभव-विलासजड़ित आलस तोड़ अंगड़ाई ले रहा है
कैसे सिहर रहे हैं तेरी देह देख
एशिया-अफ्रीका के लहूलुहान देश
यहां से वहां तक फैले मानवता के महासागर में तेरी छवि से हिलोरें उठ रही हैं

ऐशगाह बोडरम तट पर
तुझे जगाने को मचलती लहरों की नाकाम कोशिशें एेसी ही हैं
जैसे रक्तपिपासुओं व युद्धोन्मादियों के लिए
मानवता की, शांति की, सहिष्णुता की अनसुनी अपीलें

शरणार्थी कहीं से कहीं चले जाते हैं
वे धरती पर ऐसे चरवाहे हैं
जो संवेदना की नई जमीनें तलाशते रहते हैं
वे वहां से चलते हैं जहां
हो गई होती है धरती संवेदना से खाली
वे कहां-कहां से चले आ रहे हैं
कहां-कहां तक पहुंचने को

वे कुर्द हैं, अफगान हैं, सहरावी हैं
यजीदी हैं, फिलीस्तीनी हैं
चकमा हैं वे
वे रोहिंग्या हैं
वे ईसाई हैं, मुसलमान हैं,हिंदू हैं
वे सोमाली हैं, बुरुंडियन हैं
वे केन्या से चले आ रहे हैं
अंगोलासे खदेड़े जा रहे हैं
सुडान से कतारें,निकल रही हैं उनकी
वे होंडुरास ,ग्वाटेमाला, मेक्सिको से
भागे चले आ रहे हैं

वे वहां से भी मारे-भगाए जा रहे हैं
जहां तक हमारी धुंधली नजर नहीं पहुंचती
आखिरकार यह धरती, इसके कोने-अंतरे
इन्हीं से भरकर रह जाने वाले हैं
वे मानो भाग-भागकर
हम्हीं तक वापस पहुंचनेवाले हैं
हम शरणार्थियों की धरती के बाशिंदे बन
एक दिन मानो खुद भी खदेड़ दिए जानेवाले हैं
बेदखल अपनी जमीन से और बसी-बसाई दुनिया से

भगाए गए इन लोगों में तुम ही नहीं,
शामिल हम भी हैं
गोकि अपनी-अपनी पारियों का इंतजार करते…
यों तुम किसी भी देश के हो सकते थे,
किसी भी जात मजहब के
तुम अपने देश में नहीं मरे बच्चे
जिन लहरों ने तुम्हें डुबोया
वे तुम्हारे देश के पानी में नहीं उठी थीं
लेकिन तुम्हारी देह ने तुम्हारा ठिकाना बदल दिया
बदल दी तुम्हारी पहचान
अब प्रशांत-अंध-हिंद महासागरों का जल
तुम्हारा जल है
छहों महादेश की मिट्टी
तुम्हारी मिट्टी है
इस धरा पर जितनी हवा है, आग है
वह सब तुम्हारा है बच्चे
और हमसब पर यह सबकुछ
तुम्हारा कर्ज है –

एक और कर्ज उन कर्जों की फेहरिस्त में
जो हमपर अवतारों-मसीहाओं-देवदूतों के
पहले से चढ़े हुए हैं!
तुम शरणार्थी नहीं मरे बच्चे
सब दुनिया की संवेदना
इतनी-सी तुम्हारी निर्जीव देह में
स्वयं शरण पा रही हैं!

 

खरीदारी

डिपार्टमेंटल स्टोर में
आइटम पसंद आ जाने पर
उन्होंने सेल्समैन को
आदेश  दिया – पैक कर दो !

काउंटर पर
पर्स हाथ में ले
उन्होंने मैनेजर से पूछा –
हाउ मच ?

पेमेंट रिसीव कर
मैनेजर ने जब ‘थैक्स’ कहा
तो मचलते हुए सामान उठाए
वे बाहर निकल आए।

लौटते हुए
उन्होंने खरीदी तरकारी
और मोल-भाव कर
डेढ़ रुपए की बचत कर ली
साथ में गंदे नोटों के लिए
सब्जी वाले को धिक्कारा ।

ऐन गली के नुक्कड़ पर
लड़के से फी दर्जन अंडों पर
अठन्नी कम कराकर
इतराते हुए घर आ गए।

उस दिन
ऐसे की उन्होंने खरीदारी
छोटे मुनाफों में की हिस्सेदारी
और खुश  हुए !

शिवदयाल

बड़े फलक की कई चर्चित कहानियों, कविताओं एवं उपन्यास समेत दर्जनों वैचारिक निबंध प्रकाशित। कवितायेँ,ललित निबंध एवं समीक्षाएं भी लिखीं। रचनायें धर्मयुग, वागर्थ, हिंदुस्तान, आजकल, पूर्वग्रह ,दस्तावेज , परिकथा ,जनसत्ता, प्रभात खबर आदि पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित। पिछले कई सालों से जनसत्ता में वैचारिक लेखों -निबंधों का प्रकाशन।

कुछ कहानियों , लेख एवं कविताओं का अनुवाद मराठी एवं उर्दू में प्रकाशित

बच्चों की पत्रिका ‘झिलमिल जुगनू ‘ और शिक्षकों की पत्रिका ‘ज्ञान विज्ञान’ का संपादन। वंचित बच्चों के लिए टेक्स्ट बुक का निर्माण। पंचायत राज, गवर्नेंस ,विकास आदि विषयों पर दर्जनों पुस्तकों /प्रशिक्षण सामग्री का निर्माण और संपादन।

पिछले कई वर्षों से गत्यात्मकता और विकास पर केंद्रित पत्रिका ‘विकास सहयात्री ‘ के संपादक। 

प्रकाशित पुस्तकें 
छिनते पल छिन –  उपन्यास, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली।
मुन्ना बैंडवाले उस्ताद  –  कहानी संग्रह , भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली।
बिहार की विरासत (सं) –  बिहार पर महत्वपूर्ण वैचारिक पुस्तक, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।

एक और दुनिया होती  –  उपन्यास, प्रकाशनाधीन।
बिहार की राजनीति और विकास बिहार विषयक एक पुस्तक प्रकाशनाधीन

संपर्क – 103 बी ,पूजा निवास अपार्टमेंट, महेश नगर ,(बोरिंग रोड पानी टंकी के दक्खिन) पटना-800024
ई-मेल : sheodayal@rediffmail.com, sheodayallekhan@gmail.com

Blog : sheodayal lekhan / sheodayal.blogspot.com

 

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