शिव कुमार यादव की कहानी ‘किन बैरन लगाई ई आग रे…’

शिव कुमार यादव

जन्म – 28जुलाई 1960
गांव – कतिकनार,बक्सर, बिहार।
रचनाएं – हवा,काले फूल का प्रेम और रामऔतार की भैंस कहानी संग्रह।
ईश्वर का हिन्दू और आस्था की परती पर, कविता संग्रह।
अंधेर अर्थात बेजान बेजुबान समय की कहानियों का बंग्ला,मरठी, पंजाबी और तेलगु में अनुवाद।
संप्रति :- सेल,आई एस पी , बर्नपुर में कार्यरत।
संपर्क :– रामबांध,नियर सुकांत भवन, पश्चिम बंगाल।मो.- 8617629553

उन दिनों गाँव में दंगा फसाद लगा हुआ था। हिन्दू-मुसलमानों के बीच नहीं, बल्कि दलित और सवर्णों के बीच। मेरी बिरादरी के लोग दलितों के साथ जरूर थे, पर किसी तरह के दंगे या फसाद में नहीं थे। फिर भी पुलिस जिस तिस को पकड़ कर ले जाती और संगीन अपराध का मुकदमा दर्ज कर, जेल में ठूंस देती थी।ऐसे में बाबू घर बार छोड़ कर कहीं और चले गए थे।सिर्फ़ बाबू ही नहीं अधिकांशतः गाँव के लोग गाँव छोड़ कर महफूज़ जगह चले गए थे।

धीरे धीरे स्थिति सामान्य हो गई थी।पर बाबू का कहीं अता पता नहीं था। गाँव के एक एक लोग लौट आये थे।वो नहीं लौटे थे।ऐसे में माई को चिन्ता होने लगी थी।परिवार का एकमात्र  कमासूत  व्यक्ति थे, सो चिंता की बात तो थी ही।रोहिणी चढ गई थी।खेती गृहस्थी का समय आ गया था।आकाश में बादलों का उमडना जारी था।कभी कभी बिजली की कौंध से मन डर डर जाता था।गाँव भर के लोगों ने बियड जोतकर लाल कर दिया था।बारिश होने भर की देर थी।धान की रोपाई का कार्य शुरू हो जाना था।माई की चिन्ता बढ़ती गई थी।बाबू को ढूढें तो ढूढें कहाँ….?

उसने एक एक रिश्तेदारों से बाबू के होने, नहीं होने की खोज खबर ली।कलकत्ता के कलिका काका से पूछताछ की।कानपुर की दीदीया से अनुनय विनय किया।हर की ओर से एक ही उत्तर आया-“नहीं…।”

माई की चिन्ता बढती गई थी।सिर्फ चिन्ता ही नहीं,मन की आग भी….।रात दिन, सोते जगते,हर वक्त भूसे की मानिन्द विरह की आग में जलती रहती।दादी भी क्या कर सकती,समझाने के सिवाय….।उसका भी तो जवान बेटा गायब है।उसने अपने मन को कैसे समझा रखा है?यह बात माई को भी समझ लेनी चाहिए थी,पर….।

बाबू को लापता हुए महीनों बीत गये।माई की आँखों के आँसू भी झुरा गये।आखिरकार वह करती भी क्या….?जीवन से जीवन को बचाये रखना, प्रतीक्षा से संघर्षों पर विजय प्राप्त करते रहने की कला सिख ली थी उसने।वह रात दिन अपने सुहाग की चिंता ही करती रही।अपने भगवान से उसे कुशल लौट आने की भीख मांगती रही।

घर की परिस्थिति दिन पर दिन बिगड़ती ही जा रही थी।ऐसे में माई ने हम दोनों भाई-बहनों का हाथ पकड़कर मर जाने का इरादा कर लिया था।यह कहिए कि ऐन वक्त पर लालचंद मामा आ गये और एक खुशखबरी से माई का इरादा बदल दिये-“पहुना काशी में है।” 

“का….?”जैसे माई कुछ सुनी ही नहीं।या सुनकर अनजान ही बनी रही।

“सच्ची…..?”मामाजी ने विश्वास का गमछा बिछाकर पालथी मार ली।फिर सारी बातें खोल कर रख दी।माई सुनती रही और रोती रही।नाना प्रकार के भंवर में डूबती रही और उतराती रही।विश्वास और अविश्वास के पलड़े से मामा की कही बातों को तौलती हुई माई ने पूछा-“कहाँ देखे रहे….?”  

“अस्सी घाट…।दाढ़ी बढ़ाये रहे….।”मामा ने कहा।”हम अकेले नहीं देखे रहे…. हमरे साथ में भोला काका भी देखे रहे।”

“त पकड़कर काहे नहीं लाये….?”माई फफक उठी।

“उ आपन ठिकाना दोसर बतावत रहे सो कैसे पकडकर ले आते….?”मामा का मन भी घायल हो गया।

दूसरे दिन ही माई ने काशी जाने की जिद्द पकड़ ली। हम भाई बहनों को दादी के हवाले कर जाना चाहती थी, माई।परन्तु दादी की यह हालत कि खुद को तो संभाल नहीं पाती हम भाई बहनों को क्या संभाल पाती खाक…।दादी गंगा नहाने क्या गई, कमर तुडवाकर घर में ही बैठ गई।सो माई ने यह निर्णय लिया कि हमें मामा गांव छोड़ आयेगी।फिर उसे याद आयी मामी की।मामी के निरंकुश स्वभाव से वह हमेशा से डरती रही।किसी भी बच्चे को पास फटकने नहीं देती।यह उसके बांझ होने का निर्दयीपन था।कई बार उसने मामा से साथ चलने का अनुरोध भी किया पर मामा थे कि एक कान सुनते और दूसरे कान से निकाल देते रहे।ऐसे में माई  हम भाई बहनों को बिस्तर पर सोता छोड़ कर बनारस के लिए निकल पड़ी थी।जैसे निकल पड़े थे बुद्ध, ज्ञान की खोज में।पर माई को ज्ञान से क्या लेना देना।वह चाहती थी, अपने बुद्ध की सही सलामत वापसी।वह यमराज के पास क्यों न चला गया हो?सती सावित्री नहीं माई, पर अपने बलम की वापसी कर मानेगी….।

रात का मध्य काल रहा होगा, जब माई हमें सोता हुआ छोड़ कर बनारस के लिए निकल पड़ी थी।गाँव के सिवाने पहुंचकर सोचने लगी,काशी की दूरी के बारे में।कितनी दूर होगी काशी…?पैदल जाना संभव हो पायेगा या नहीं, फिर क्या करें….?किससे पूछे….?उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था।मन ऊहापोह में पडा रहा।तभी दूर से कीर्तन गाते लोगों की टोली आते दिखाई दी।जैसे ही टोली करीब आई कि उसने हुलसकर पूछा-“बाबा,काशी कितनी दूर है…और कैसे जाना है?”

पहले उस बाबा ने  अजीब सी दृष्टि डाली।माई डर सी गई।फिर भी उसके जवाब का इंतजार करती रही।अपने रंग और यौवन को छुपाती रही।वह जानती रही, औरत होने का अवगुण।सबसे बड़ा अवगुण स्त्री का सुन्दर होना।यह कहिए कि उसने अपने चेहरे को पल्लू से ढंक रखी थी।माई दुबारा मुंह खोलती कि बाबा बोल पड़े-“काशी…. बाबा विश्वनाथ की नगरी जाओगी….?”

उसने सहमति में गर्दन हिलाई।

“गंगा के रास्ते चली जाओ..सीधे पश्चिम की ओर… घाटे घाट….।”बाबा ने राह तो दिखा दी।पर वह कितने दिनों में पहुंचेगी अंदाजा नहीं।

माई असमंजस में रही कि तभी कीर्तन मंडली से बाहर निकल कर आते हुए एक बच्चे ने पूछा-“कहाँ जाये के बा काकी?”

माई ने बच्चे को ध्यान से देखा।वह हमारी उम्र का रहा होगा, लगभग दस बारह वर्ष का ….।आँखों से उमड़ रही थी स्नेहिल धारा।माई का मन किया कि उसे कलेजे से लगा ले।क्योंकि हमें याद कर उसकी आँखें भी लोरा गईं।तभी उस बच्चे ने दुबारा टोका-“का भईल काकी,कहँवां जईबू।”

“बनारस….।उसने धीरे से जुबान खोली।

“त मुहम्मदाबाद जाके ट्रेन पकड़ ल.।”बच्चे ने सही और सीधी राह बताई।माई का मन गदगद हो गया।और वह चल पड़ी।सीधे मुहम्मदाबाद रेलवे स्टेशन…।

कुछ ही घंटे बाद ट्रेन काशी स्टेशन के एक नम्बर प्लेटफार्म पर रूकी।यात्रीगण उतरने लगे।माई बैठी रही।नहीं… नहीं हम सबों की चिंता में डूबी रही।तभी वहाँ उतरने वाली महिला यात्री ने टोका-“बनारस स्टेशन आ गया, उतरो…।

सांझ हो चुकी है।संझवत दिखाने की बेरा भी।माई को घर की याद आई है।माई ने दीदी को सबकुछ समझा दी थी।कैसे और कब दीया बाती जलाना और दिखाना है।यहां भी कुछ तरह का दिख रहा है।काशी स्टेशन के नीचे से गंगा बह रही है।माई ने खडे खडे उसका मुआयना किया।सूर्य की लालिमा गंगा की बहती धारा के संग बहती जा रही है,अपने अंतिम पडाव की ओर।और चांद उस लालिमा को स्पर्श करने की चाह लिए बाबा विश्वनाथ मंदिर के कंगूरे पर उतरने लगा है, धीरे धीरे….।

आज गंगा दशहरा है।लोक मान्यता के अनुसार आज के दिन ही धरती पर गंगा अवतरित हुई थी।अपनी निर्मल जल से पापों को धोने के लिए।मगर पापियों का पाप धोते धोते गंगा खुद भी इतना अपवित्र हो गई है कि लुप्त हो जाना चाहती है, इस जहाँ से।अगर ऐसा हो गया तो…..?माई ऐसा सोचकर डर सा गई।डर के मारे उसने अपनी आँखें बंद कर ली।तभी किसी ने पुकारा-“ए रे शिवा के माई…..।”

“शिवा के बाबू…..।”माई आवाक सी आँखें खोली और पीछे मुडकर देखी।पीछे घनघोर अंधेरा…. विरान पडे घाट… घाटों पर उतरता जटाधारी कोई देव…. नहीं…. नहीं दानव।सबकुछ  लूट लेने वाला दानव।डर की डोर से बंध गयी।आँखें बंद हो गई, पुनः एक बार।

कई दिन हो गये माई को गंगा घाट की खाक छानते हुए।अस्सी घाट जैसे अस्सी द्वार… राजाओं-महाराजाओं का…..आते रहिये जाते रहिये… राम राम गाते रहिये।माई थक चली थी गंगा महल घाट से लेकर सामने घाट तक का सफर करते हुए।न माया मिली न ही राम ही मिले।उसके मन का राम मिलते भी कैसे..?वह सतयुग की शापित महिला नहीं,वह तो कलयुग की कल्पित महिला है।क्षण में पुण्य क्षण में पाप का भोग भोगने वाली महिला है।पक्का महाल की कच्ची गलियों में रौंदी जाने वाली महिला….महिला भी नहीं, रंडियाँ…..कच्चे महाल की रंडियाँ….।कच्चे महाल की पक्की सड़क के आगे खड़ी है माई।भूखी-प्यासी, मन को जलाती हुई ,न जाने कब से खड़ी है।अपने स्वप्न को सकार होते हुए देखने के लिए,माई ने दशाश्वमेध घाट पर खडे खड्डेश्वरी नागाओं की पूजा अर्चना की।अपने दर्द को साझा किया।पर, उनकी निगाह तो कहीं और ठहरी हुई थी।माई को अपने बस में करने के लिए उनलोगों ने आँखों में भस्म झोंका।उसकी खूबसूरती को स्पर्श करना चाहा।पर माई, सीता माई नहीं, गाँव की लठैत महिला है।अपनी लाज,अपनी आबरू को बचाये रखने की लडाई लडना जानती है।वहाँ से छिटककर माई मणिकर्णिका घाट जा पहुंची।जहाँ हर कोई अपनी मोक्ष के लिए जीवन मरण की सिद्धि में लगे हुए हैं।माई भी वहीं बैठ गई, बैकुण्ठ की प्राप्ति के लिए नहीं, अपने प्रीतम की वापसी के लिए।वह काल के महाकाल बाबा विश्वनाथ से मुठभेड़ करना चाहती है।वह चाहती है कि बनारस के उन तमाम देवी देवताओं से अपने सुहाग की रक्षा।मगर सुहाग के रक्षक ही जब भक्षक बन जाये तो किसके के लिए यहाँ ठहरे।मंदिर में जाओ तो देवी देवता मौन रहते और उसके पुजारी…. पंडित ठगी करते।सिर्फ ठगी ही नहीं करते नारी अस्मिता पर हमला भी बोल देते हैं।तब न प्रशासन किसी की सुनता है और न ही कोई नेता या अफसर…..।सबके सब  भ्रष्ट…।ऐसे में उसने मर जाना ही उचित मार्ग समझा।

शाम हो गई है।गंगा की आरती करने की तैयारी चल रही है।चारों तरफ अजीब सा माहौल।माहौल का भागमभाग।उछाल मारती गंगा की लहरें।उन्हीं लहरों में माई का मन समा जाने का हुआ।पर घाट से नीचे उतरना मुश्किल…।ऐसे में उसने पक्का महाल वाली कच्ची एवं सकरी  गली पकड ली।सामने की गली में एक साँढ़ फंसा रहा।लाख कोशिश के बावजूद न तो वह आगे से निकल पाया और न ही पीछे से।इसलिए उसने कच्चे महाल की पक्की सड़क पकड़ ली।थोड़ी ही देर में वह हरिश्चंद्र घाट जा पहुंची।जहाँ कई चिताएं धधक रही थी।उसने धधकती चिता में अपने को झोंक देना चाहा।तभी किसी ने उसे पीछे की ओर खिंचते हुए कहा-“पागल हो गई हो क्या….मरना चाहती हो…?” 

“हाँ …..हाँ मर जाना है ।” 

“पर, क्यों….?”उसके इस प्रश्न में अपनेपन का एहसास हुआ।आवाज कुछ जानी पहचानी सी लगी।उसने पीछे मुड़कर देखा।बाबू…..हू ब हू शिवा के बाबू …..वही शक्ल सूरत….लम्बी कदकाठी….वही मूँछें….वही रंग और रूवाब…।माई गंगा की तरह उमड़ती हुई उसकी बाँहों में समा गई-“कहँवां रहे….?”

“इसी बनारस में…. हम तुम्हें  ढूढते रहे और तुम हमें……।”बाबू ने अपनी पूरी कथा सुना डाली।माई टुकुर टुकुर बाबू का चेहरा देखती रही।देखती और समझती रही कि किस प्रकार बाबू ही नहीं पूरी की पूरी कायनात…. मुक्ति की काशी में परेशान है।

माई भी सोच सोच कर रोती रही कि किन बैरन लगाई ई आग रे….।

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