शिव कुशवाहा की 6 कविताएं

1.
उम्मीदों का नया आकाश
किसी शहर की सड़क की
परित्यक्त पुलिया के किनारे
ठहरकर देखना कभी 
कि वहां दिखेंगे तुम्हें
धंसते हुए से  धरातल
मटमैले से भावों को समेटे
स्याह बादलों में
गुम होता हुआ जीवन

जीवन ,हां वह जीवन
जो संघर्ष करता है 
अंधियारे भोर से लेकर मटमैली शाम तक
जिजीविषा से जूझते हुए
बाज़ार के किनारे पर
लगा लेते हैं अपनी उम्मीदों का संसार
जैसे जैसे ढलती है साँझ
उनकी उम्मीदें का आकाश धुंआ होता जाता है
बाज़ार में सन्नाटे के साथ
सिमट जाती हैं
उनके जीवन की रंगीनियां 

शहरी बस्तियों से दूर 
टिमटिमाता है 
अधजला- सा दीपक
जो बुझती हुई जिन्दगी का संबल बनकर
बार- बार उम्मीदों को रखता है जिंदा
अलसुबह फिर से सड़क के किनारे
गुलजार होती है उनकी दुनियां
और वे फिर नए सिरे से
उठा लेते हैं अपने सिर
उम्मीदों का एक नया आकाश…

2. वजूद

जब तुम खोजोगे 
अपने पुरखों का वजूद
इतिहास के अंकित पन्नों में,
तब तुम पाओगे 
अपने पुरखों को इस 
इतिहास से गायब.

इतिहास ,
हां , वह इतिहास
जिस पर तुम करते हो गर्व
खाते हो कसमें
देश का निवासी होने का अहसास
हां , वह एहसास जो तुम्हें
गाहे- बगाहे याद दिलाता है 
पुरखों की विरासत का.

तुमने जो सुना और पढ़ा
उस इतिहास में 
ढूंढों अपने पुरखों का
चमचमाता अक्स,
करो कोशिश कि कन्धों पर
टिका हुआ जुआ
ढोते ढोते किस इतिहास में खो गये
तुम्हारे पुरखे..

कभी एकांत के किसी कोने में
चुपचाप सोचना 
कि पुरखे
जो इतिहास की किसी मोड़ पर
जरूर दे रहे होंगे दस्तक
जो पलभर में हिला देते होंगे
राजा- महाराजाओं के सिंहासन
जो खेलते होंगे सिंह से मिलाकर बाहें,
चीरकर धरती की कोख सार्थक बनाते होंगे
धरती को रत्नगर्भा..

इतिहास के पृष्ठ
तुम्हारे पुरखे के लिए रह गये रिक्त,
मिटा दिया गया उनका वजूद
जिसे तुम अपना इतिहास कहते हो
वह इतिहास नहीं
है तुम्हारी बुद्धि पर चढ़ा हुआ छद्म आवरण,
जिस दिन असलियत 
तुम्हारे आंखों के सामने तैरेगी
उस दिन आएगा 
तुम्हारे अंदर एक भीषण सैलाब..

3. असमानता के विरूद्ध

धरती पर अपने पगों को नापते हुए
बढ़ रहा था वह 
आहिस्ता- आहिस्ता
देख रहा था वह
धरती और आकाश के बीच का फासला
उसने कर लिया था संकल्प
इस फासले को पाटने का.

फिर उसने एक दिन अंगड़ाई ली
चल पड़ा अधिकारों की लड़ाई लड़ने
आदमखोर -शेर के जबड़े से निकाल लाया
जीवन की सुसुप्त जिजीविषा
परित्यक्त समाज के लिए 
बीन लाया कुछ निवाले.

वह अकेला चिंगारी बन गया
हाशिए के लोगों के लिए
धीरे-धीरे कारवां बढ़ा
लोग आने लगे साथ.

तब्दील हो गए मुहावरे
धधकते हुए विचारों की खराद पर
ढलता हुआ समाज 
गढ़ रहा है नए प्रतिमान
चल रहा अंदर ही अंदर
एक अघोषित युद्ध,
असमानता के विरूद्ध…

4. विचारधाराएं

अजस्र जल धारा की तरह
प्रवाहित रहती हैं 
विचारधाराएं
फूटता रहता है उनका उत्स 
बनता रहता है 
वैचारिक उर्वर धरातल.

विचारधाराएं 
खत्म करने के बरक्स
उभरने लगती हैं तेजी से
जिस तरह नैसर्गिक धारा को जबरन बांधने पर
भरभराकर गिर जाते हैं बांध

दहशती बयार में 
चिंगारी की मानिंद
होती हैं विचारधाराएं
धीरे धीरे हवा के रुख से
सुलगती रहती हैं 
अंदर ही अंदर…

5. समय के सच के साथ

विचारधाराओं की
टकराहट से उपज रहे
खतरनाक माहौल के बीच
दरक रही हमारी कौमी एकता
और निरन्तर
चल रहे द्वंद्व में पिस रही 
दो पीढ़ियाें की 
अपार सम्भावनाएं.

सिमट रहे
मानवीय संवेदना के दायरे
बदल रहे परिदृश्य में
साम्प्रदायिकता 
रंगों में डूबकर
बन गयी है पहचान.

अंदर ही अंदर
हो रहे उथल- पुथल को
समझना होगा सिरे से
राजनीतिक षडयंत्रों के
यथार्थ को समझते हुए
अब समय के सच के साथ
बढ़ना होगा आगे.

पहचानने होंगे
नीति-नियंताओं के कुचक्र
जो सुलगाना चाहते हैं
समाज के बीच का 
आपसी सौहार्द
दहशत की भयंकर लौ में
झोंक देना चाहते हैं 
देश की सांस्कृतिक विरासत…

6. संवेदना के सूखते दरख्त 

ग्लोबल होती हुई दुनिया के
महानगरीय बोध की चकाचौंध में
आंखों पर बंधी हुई पट्टी 
जो नहीं देखती 
टूटते हुए घरौंदें का दर्द

वह नहीं देखती
मानवीय संवेदना के सूखते हुए दरख़्त
और खो रहे विश्वास के बीच
टूट रहा है आज अपना परिवेश

उत्तरआधुनिकता की 
लपेटे हुए चादर
आज का समय
धीरे-धीरे बढ़ रहा 
पाश्चात्य सभ्यता के ओवरब्रिज से
जो निकल जाना चाहता है बहुत आगे.

समय की गति 
अपनी धुरी से फिसलकर
बढ़ रही एक ऐसी दुनिया की तरफ
जहां दिन- ब दिन
दम तोड़ रही है
संवेदना की बहती हुई नदी…

ृ—————————

शिव कुशवाहा 

जन्मतिथि-  5 जुलाई , 1981
शिक्षा – एम ए (हिन्दी), एम. फिल.,नेट, पीएच.डी.
प्रकाशन-
युद्धरत आम आदमी, दलित अस्मिता, दलित वार्षिकी 2016 , लहक, ककसाड़, प्राची, कविकुम्भ, तीसरा पक्ष, डिप्रेस्ड एक्सप्रेस, अम्बेडकर इन इंडिया, कलमकार, जनकृति, नवपल्लव , लोकतंत्र का दर्द , सच की दस्तक, पर्तों की पड़ताल, शब्द सरिता, निभा, नवोदित स्वर , ग्रेस इंडिया टाइम्स , अमर उजाला काव्य, हस्तक्षेप आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर काव्य रचनाएं प्रकाशित

संपादन- व्यंजना त्रैमासिक पत्रिका
सम्प्रति- अध्यापन
पता – 
ताजपुर नौकास्त
पॉवर हाउस के पीछे
सिंह वाहिनी रोड, मकरंद नगर 
कन्नौज ( उ प्र)
पिन- 209725
सम्पर्क सूत्र- 07500219405
E mail- shivkushwaha.16@gmail.com

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