शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ के पांच नवगीत

आँखें देखीं कहाँ अँजोर  

 

कब तक पकड़े

आम आदमी

आसमान की डोर

दस की सौ में

नमक बेचते

अफवाहों के शोर

 

अदहन जोड़ी

घिसट-घिसटकर

चुम्बकीय वह सींक

घास-पात ही

को उबालकर

पीयी प्राय: छींक

रात हुई तो

देखी आँखें

देखीं कहाँ अँजोर

 

कालाधन के

पास पड़ा है

लोकतंत्र का नोट

बैंक-खिड़कियों

पर लटका है

रामराज्य का वोट

राजसूय के

रथ पर निकला

नोट बदलने भोर

 

सोच सयानी

बहुत हो गई

लोग हुये गुमराह

किस करवट यह

लुढ़के कुरसी

नहीं लगी कुछ थाह

हानि-लाभ की

गाँठ खोलते

राजनीति के मोर

 

भग गई थी माँ !

 

मैं इस तरह की सोच

की औलाद हूँ

छोड़ बचपन में जिसे

भग गई थी माँ !

 

भाग्य की यह बात थी ?

क्या उलझनें थीं ?

समय का परिहास था ?

क्या तड़पनें थीं ?

क्या दबदबों के हाथ ?

लग गई थी माँ !

 

लकड़ियों की आँच कम ?

क्या सुलगता श्रम ?

आँख सागर की लहर ?

क्या लुढ़कता दम ?

क्या दूध का श्रृंगार ?

ठग गई थी माँ !

 

धूथीं ?

क्या तपन ? क्या आग थी ?

दग गई थी माँ !

लौट रहा है दिन

 

घर की छत पर

लिये चाँदनी

उतर रहा है चाँद

 

जाग रहा है

सूनसान में

एक धुएँ का पुल

धूमिल बिजली

की बतियाहट

दीया-बाती गुल

छिपा-छिपी का

खेल खेलती

है चूहे की माँद

 

पेड़ों की उन

कोठरियों में

है चिड़ियों का तन

घूम रहा है

खुली सड़क पर

कवि मौसम का मन

भावों की उस

कठिन भीति को

गीत रहे हैं फाँद

 

जीवनयापन

का बोझा ले

लौट रहा है दिन

महुआ तर के

महुआ को है

भाँज रही खुद बिन

गाय चढ़ाने

चढ़ी नाँद पर

डोल उठायी छाँद

सो रही है धूप दिन की

 

नोट जो थे सब बदलकर

आ गये घर लौटकर हम

जा रहे अब चोटियों की

अरुणिमा से मन बदलने

 

‘सेर’ भी था भार बदला

‘किलो’ रखकर नाम अपना

‘कोस’ भी था ‘मील’ बनकर

बहुत देखा सुघर सपना

थी हुई गायब चवन्नी

गाँव की उस पैंठ से जब

तब गई थी भूख पैदल

बाजरा से धन बदलने

 

काम अब चलता नहीं है

जो रखी है चीज घर में

सो रही है धूप दिन की

अंधता के घोर डर में

बस गया आतंक चौखट

चाकुओं की धार भोथर

जा रहे हैं शब्द विह्वल

अक्षरों से गन बदलने

 

थक चुकी दीयासलाई

तीलियों में दम नहीं है

है शिरा कमजोर सी कुछ

दवा भी अब कम नहीं है

दह गया है गाँव ‘मगहर’

हुआ ‘करगह’ भी पुराना

जा रहा है अब ‘कबीरा’

साखियों से अन बदलने

 

* अन – श्वास-प्रश्वास

 

बेचे गीत ‘भवानी दादा’

 

बेचे गीत

‘भवानी दादा’

मैं भी बेचूँ

ऐसा कोई गीत नहीं है

 

मैंने सपनों

की बैठक में

यादों को आसीन किया है

बिखरे आँसू

को बटोरकर

कुछ मीठा नमकीन किया है

खेल रहा मन

खेल विलक्षण

कदम-कदम पर

जहाँ हार है जीत नहीं है

 

अरुणोदय की

विभु अरुणा को

शब्दों तक मैं खींच न पाया

अक्षर वाली

उस तुलसी को

अलंकार से सींच न पाया

कोई सूरज

अँधियारों में

भोर दिला दे

दीप जला दे मीत नहीं है

 

अपना अभिजन

ढूँढ़ रहा हूँ

हृदय घाव का बना समंदर

वय की छत पर

दुविधा लेटी

कोस रहा विश्लेषण अंदर

मन को कैसे

मैं समझा दूँ

झूठ बोलकर

यह शुचिता की रीत नहीं है

 

शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’

०९४१२२१२२५५

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