शिवराम के की तीन कविताएं

शिवराम के

ग्राम-कुसौली, पो-  नथईपुर, जिला –  भदोही, उत्तर प्रदेश, 221304

शिक्षा- एम.ए- अंग्रेजी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, (BHU)

मोबाइल – +918826222604

ब्लॉग-   shivramkblog. wordpress.com

प्रकाशित पुस्तक- Lamp Post And Other Poetry collection (अंग्रेजी में)

विश्वविद्यालयी काव्य-प्रतियोगिता में पुरस्कृत व प्रकाशित ।

कुछ यादें

कुछ यादें महफूज रहती हैं

सांसों के साथ

कमरे के किसी कोने में

टेबल पर पड़ी किसी किताब की तरह

अक्सर जब कभी अतीत की हवाएं

इन पन्नों को पलटती हैं

वही दुनिया, वही लोग, वही हंसी, वही सोच,

एक बार फिर सब कुछ जिंदा सा हो जाता है

इन्हीं पन्नों में कुछ लंबी रातें

कुछ छोटी रातें

कुछ रातों की सुबह क्यों हो गई?

कुछ दिन के साथ क्यों डर गए?

कुछ बातों का सफर क्यों ठहर गया?

कुछ खोज पूरी हो गई?

कुछ अजनबी चेहरे अपने होकर भी अजनबी ही रह गए?

कुछ चेहरे चेहरे ही रह गए?

कुछ बात बात ही रह गए?

कुछ वक्त क्यों बीत गए?

कुछ सफर क्यों गुजर गए?

शायद… जिंदगी के सफर में जो कुछ पीछे छूट जाते हैं

वही यादें बन जाते हैं

जो महफूज रहती है सांसों के साथ

कमरे के किसी कोने में

टेबल पर पड़ी किसी किताब की तरह/

धूप के कुछ टुकड़े

पेड़ों की टहनियों से

धूप के टुकड़ों सा, तुम्हारी यादें

छनकर   मेरे स्मृति पटल पर

सिमट जाती है.

आती हो अक्सर कुछ इसी तरह,   फिर

हल्की हवा के चलने पर

टहनियों के इधर से उधर होने पर

दो पत्तियों के बीच

किसी  तीसरी पत्ती के आने से

रोशनी का कारवां

कुछ पल मानो कहीं  खो  सी जाती है/

धूप के कुछ टुकड़े

माना कि आंखों पर लगते हैं

त्वचा पर चुभते हैं

मस्तिष्क को भी बेचैन रखते हैं.

लेकिन… धूप के यही कुछ टुकड़े

सुकून देते हैं

जब जब कभी झुरमुट से  छनकर

स्मृति पटल पर सिमट जाते हैं.

सब कुछ ठीक वैसे ही लगता है

जैसे तुम किसी अंधेरी गली से निकल कर

इस मन से लिपट जाते हो

न जाने क्या कुछ इस मन को दे जाते हो.

धूप के ये कुछ टुकड़े न जाने क्यों

अंधेरी रात में नहीं आते

नहीं आते तुम भी

जब कभी जीवन के आकाश में

बादल बिखरे होते हैं.

अंतर्देशीय

एक लिफाफे में जब हम एक उम्र लिखा करते थे

मैं अपना यथार्थ, तुम अपना जीवन  यथार्थ लिखा करते थे

कितना सच था सागर में गागर का मुहावरा

और तुम्हारे शब्द-

जो ओस की बूंदों से भी हल्के तरोताजा

जिन्हें संभाल कर रखे हैं

कोठरी में पड़े पुराने कार्ड की संदूक में

बहुत  कुछ है और कुछ भी नहीं

कुछ हमारे अपने होने का एक एहसास/

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