नीरजा हेमेंद्र की कहानी ‘लड़की की जात’

अक्टूबर का महीना प्रारम्भ हो चुका था। शाम की हवाओं में हल्की-हल्की ठंड  की खनक घुलने लगी थी। आज मैं कार्यालय से घर लौट रहा था तो रास्ते में मेरा ध्यान बार-बार एक विशेष चीज की ओर चला जा रहा था। वो यह था कि  शहर के अनेक घरों में कहीं पुताई का काम चल रहा था तो कहीं मरम्मत के काम में मजदूर लगे थे। सहसा मुझे स्मरण आया कि अगले माह के प्रथम सप्ताह दीपावली है। यह रंगाई-पुताई,  मरम्मत आदि के कार्य उसी पर्व को दृष्टि में रखते हुए हो रहे हैं। लोग पर्व की तैयारियों में लगे थे। घर-बार की मरम्मत,  साफ-सफाई आदि के कार्य उसी को दृष्टि में रखकर हो रहे थे। मैं अपने घर के बारे में सोचने लगा। पाँच-छः वर्ष हो गए हैं,  मुझे अपने घर को पुतवाये हुए। घर रंगाने-पुताने लायक हो गया है किन्तु करवा नहीं पा रहा हूँ। कारण तो मात्र यही है कि मेरे पास इस समय पर्याप्त पैसे नहीं हैं। मन को बहलाने के लिए सोच लेता हूँ कि समय नहीं है। मेरी सेवानिवृत्ति में मात्र दो वर्ष शेष रह गए हैं। सोचता हूँ कि अब सेवानिवृत्ति के पश्चात् ही ये सभी काम करूँ क्योंकि उस समय मेरे पास पर्याप्त पैसे भी रहेंगे और समय भी रहेगा। जैसे अब तक पड़ा है,  वैसे दो वर्ष और सही। घर के बारे में सोचते-सोचते मेरा घर आ गया।

अपने घर के छोटे-से गेट पर पहुँच मैं अपने मकान को ध्यान से देखने लगा। यद्यपि पाँच-छः वर्ष पूर्व घर का रंग-रोगन करवाया था किन्तु देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे बीसियों वर्ष हो गये हों इस घर को पुतवाये हुए। कितना पुराना हो गया है घर। पिताजी कहा करते थे कि जब दादा जी गाँव से यहाँ रहने के लिए आये थे, तब मुख्य शहर में उन्होंने यह जमीन ली थी और दो मंजिला घर बनवाया था। लगभग सत्तर वर्ष पुरानी बात हो गयी है। पुराना घर नवनिर्मित मकानों के समक्ष कहाँ ठहर सकता है भला? अब मरम्मत और पुताई मांगता है। दो वर्ष की धूप-बारिश, आँधी-तूफान रोकते-रोकते इसकी अवस्था थोड़ी और पुरानी, जर्जर हो जाएगी। मकान की हालत खराब हो तो हो, इस मकान की मरम्मत तभी कराऊँगा, जब सेवानिवृत्त हो जाऊँगा। अभी मैं थोड़े-बहुत जमा किए पैसे मकान को सजाने जैसे गैर ज़रूरी कार्य में खर्च करना आवश्यक नहीं समझता।

मैं करूँ भी तो क्या करूँ…? ऐसा नहीं है कि मैं अपने मकान का जीर्णोद्धार करना नहीं चाहता था। तीन-तीन बच्चों की परवरिश, शिक्षा और घर गृहस्थी के अनेक खर्चों को पूरा करना आज के समय में जबकि महंगाई आसमान छू रही है,  आसान नहीं था। मेरे तीन बच्चे हैं। दो बेटियाँ व एक बेटा। बड़ी बेटी का ब्याह मैंने कर दिया है। स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद विवाह से पूर्व नौकरी के लिए अनेक प्रयत्न उसने किए किन्तु सफल न हो सकी। विवाह के पश्चात् इस समय वह अपनी ससुराल में है और ठीक ही है। अब उसके दो बच्चे हैं। बड़ा बेटा चार वर्ष का तथा छोटा तीन वर्ष का है। शेष सब कुछ ठीक ही है। छोटी बेटी ग्रेजुएशन कर रही है। यह अन्तिम वर्ष है। आगे और पढ़ना चाहती है किन्तु भ्रमित है कि आगे कौन-सी पढ़ाई करे जिससे नौकरी में लग जाये। बड़ी बहन ने इतिहास से एमए किया था। प्रयत्न करने के पश्चात् भी नौकरी नहीं मिली। बेटा इण्टर फाइनल में है। वो बी0 टेक0 कर इन्जीनियर बनना चहता है। बी0 टेक0 की फीस कम नहीं है किन्तु बेटे की इच्छा पूरी करनी ही है। बच्चों के भविष्य के लिए सोचना सबसे पहला उत्तरदायित्व है मेरा। बेटे का भविष्य बन जाये, बच्चे आत्मनिर्भर बन जायें उससे अच्छी बात और क्या हो सकती है?  घर-मकान तो बाद में भी सजते-सँवरते रहेंगे।

दिन पंख लगा कर उड़ते चले जा रहे हैं। बेटा आज प्रसन्न है। इण्टरमीडिएट में अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने के पश्चात् इसी शहर के एक अच्छे कॉलेज में बी0 टेक0 में उसका एडमिशन हो गया है। मैं भी खुश हूँ यह सोचकर कि यदि कहीं किसी दूसरे शहर में उसका एडमिशन होता तो मेरे खर्चे बढ़ जाते। मुझे आर्थिक तंगी का समना करना पड़ता। उसकी फीस इत्यादि भर दी गई है। वह कॉलेज जाने लगा है। समय व्यतीत होता जा रहा है। देखते ही देखते दो वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन वो भी आया जब मैं सेवानिवृत्त हो गया। दूसरी बेटी का ब्याह और बेटे की शिक्षा का पूरा उत्तरदायित्व शेष था। सेवानिवृत्ति के बाद कुछ दिनों तक तो घर में अच्छा लगा। किन्तु धीरे-धीरे जीवन में अब नीरसता व्याप्त होने लगी थी। अपने पुराने घर को देखकर मेरी चिन्ता और बढ़ जाती। सोचता यह तो पूरा का पूरा घर ही पुराना है। नीचे से ऊपर तक पूरा का पूरा ही ठीक कराना पड़ेगा। बाहर की दीवारें, बैठक, बरामदा सबके प्लास्टर गिर रहे हैं।

 “मधु, घर की दशा अत्यन्त खराब हो गयी है। अब मरम्मत कराना आवश्यक हो गया है। कब से काम प्रारम्भ कराएं कुछ समझ में नहीं आ रहा है? घर ठीक कराने में अच्छे-खासे पैसे भी लगेंगे। रश्मि का विवाह अब तक नहीं हो पाया है। विवाह में न जाने कितने पैसे लगेंगे? यही सोच कर घर की मरम्मत में हाथ नहीं लगा रहा हूँ। रश्मि का विवाह हो जाता तो कोई चिन्ता न रहती।’’  मन की दुविधा को पत्नी के सामने रखते हुए मैंने कहा।

“मकान पुराना तो अवश्य हो गया है। किन्तु मेरा विचार ये है कि मकान के बाहर-बाहर पुताई करवा लीजिये। रश्मि की शादी के बाद जो कराना है, कराइयेगा। ’’ पत्नी ने कहा।

“हाँ, रश्मि की शादी…?  किन्तु कब?  कैसे करूँ? कुछ समझ में नहीं आ रहा है। अभी तो वह नौकरी के लिए प्रयत्न कर रही है।’’  इससे अधिक मैं कुछ नहीं बोल पाया।

 ’’ आप तो ऐसे आश्चर्य कर रहे हैं, जैसे रश्मि की शादी नहीं करेंगे..? उसकी शिक्षा पूरी हो चुकी है। वह नौकरी के लिए प्रयत्न कर रही है। इतनी शीघ्र नौकरी मिलती कहाँ है.? हम उसे प्रयत्न करने से मना नहीं कर रहे हैं। वो अपना कार्य करती रहे किन्तु हमें तो समय से उसका ब्याह कर देना है।’’  पत्नी ने कहा।

“हूँ…।“ मधु सही कह रही है। इस समय रश्मि का विवाह हमारी पहली प्राथमिकता है। मैंने मकान ठीक कराने का विचार का त्याग कर  पुत्री के विवाह का मन बना लिया।

अब हमारा पहला काम यह था कि हम पुत्री के लिए योग्य वर की  तलाश करें। वर ढूँढ़ने के लिए मैंने उन रिश्तेदारों को भी फोन किया, जिनसे बात किये अरसा हो गया था। यद्यपि मैं जानता था कि इनसे कुछ खास मदद मिलने वाली नहीं है। अखबारों में वैवाहिक विज्ञापन भी देखने लगा। ठीक लगे कुछ लड़कों के फोन नम्बर भी लिख लिए थे। लड़के वालों से बात करने लगा, किन्तु अभी तक बात बनी नहीं थी। वे लड़के मेरी चयन कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे थे। जिन रिश्तेदारों को वर बताने के लिए कहा था, उन्होंने  पलटकर फोन तक नहीं किया था। धीरे-धीरे एक वर्ष और व्यतीत हो गया। मैंने सोचा कि बेटी के लिए वर का चयन करने के लिए इतने कठोर नियमों पर नहीं चलूँगा। मैं उन्हीं लड़कों में से किसी एक सही लड़के का चयन कर लूँगा। यह बात मैंने पत्नी से भी बता दिया।

“सुनिये, एक लड़के के घर से फोन आया था। वे लोग रश्मि को अगले हफ्ते देखने आना चाहते हैं।’’   एक दिन बाजार से मेरे घर आने पर पत्नी ने कहा।

 “ठीक है।’’  मैंने कहा।

“मैं रश्मि को बता देती हूँ। इस समय वो अपने कमरे में है।’’  कह कर पत्नी रश्मि के कमरे की ओर बढ़ गयी।

“मैंने सुन लिया है मम्मी। मैं बाजार में लगाई गई बिक्री  की कोई वस्तु नहीं हूँ कि कोई मुझे देखने आयेगा और मुझे पसन्द करेगा। नहीं ठीक लगी तो मना कर के चला जायेगा।’’  रश्मि अपनी माँ से कह रही थी। उसकी आवाज मुझ तक आ रही थी।

“हूँ…हँ.., शादी कर लो। बस्स… हो गई इन लोगों की जिम्मेदारी पूरी और मेरा जीवन…कुछ नहीं….।’’  रश्मि ने बुदबुदाते हुए कहा।

“ये लो…अब ये बातें सुनो। लड़कियों की ब्याह-शादी तो ऐसे ही होती हैं। उन्हें लड़के वाले देखने आते ही हैं। ’’ पत्नी ने रश्मि को समझाते हुए कहा।

“ नहीं मम्मी, ये सब पहले होता होगा। अब नहीं चलेगा। मैं सज-सँवर कर किसी के सामने नहीं जाऊँगी। मैं नौकरी के लिए प्रयत्न कर रही हूँ। मुझे थोड़ा समय दीजिए। अभी आप लोगों को मेरे लिए लड़का देखने की आवश्यकता नहीं है। ’’ कहती हुई रश्मि कमरे से बाहर आ गयी और रसोई की ओर बढ़ गयी। उसके पीछे-पीछे पत्नी भी बाहर आ चुकी थीं।

रसोई से खट-पट की आवाजें आने लगी थीं। कदाचित् रश्मि रसोई में कोई काम कर रही थी।

“सुनिये, क्या जमाना इतना बदल गया है? आपने बिटिया की बात तो सुनी ही होगी..? ’’ पत्नी मेरे पास ड्राइंग रूम में आकर धीरे से बोलीं। धीरे से बोलने का उद्देश्य यह था कि कहीं रश्मि सुन न ले।

पत्नी की बात सुनकर मैं खामोश रहा। ऐसी उलझी परिस्थितियों में जब कुछ स्पष्ट नहीं होता, मैं बहुधा खामोश हो जाता हूँ।

“इसकी बड़ी बहन ने हम लोगों के कहने से, जहाँ हमने चाहा उसने विवाह किया। चाहे जैसे भी हो, अब अपनी ससुराल में है।…..ये लड़की नये ज़माने की बात कर रही है। हमने पढ़ाया-लिखाया, नौकरी के लिए भी मना नहीं कर रहे हैं….।’’  पत्नी अभी तक धीमे-धीमे बुदबुदा रही थी। मैं यह सोचकर निश्चिन्त होने का प्रयत्न कर रहा था कि आज नहीं तो कल मुझे अपनी बेटी का ब्याह करना है। मध्यमवर्गीय तौर-तरीके से विवाह करने भर के पैसे मेरे पास हैं।

      दिन व्यतीत होते जा रहे थे। ऋतुएं बदल रही थीं। परिवर्तन का प्रभाव मनःस्थितियों पर पड़ता है या नहीं ये मैं नहीं जानता क्योंकि मेरा मकान नवनिर्माण की राह देख रहा था तथा बेटी नये जमाने के साथ चलने की बात कर रही थी। इन्हीं दो उत्तरदायित्वों को पूरा करने की फ़िक्र में बस मेरे दिन व्यतीत हो रहे थे। रश्मि चाहती क्या है..? माता-पिता द्वारा तय की गयी शादी वो करना नहीं चाहती। आखिर कब तक वो ऐसे ही बैठी रहेगी? आत्मनिर्भर बनना चाहती है, किन्तु सत्य यह भी है कि नौकरी आसानी से मिलती नहीं। प्राइवेट नौकरी में शोषण की संभावनाएं भी रहती हैं….शारीरिक स्तर पर हो या मानसिक। यह बात वो जानती है। अतः सरकारी नौकरी की ओर उसका झुकाव है। प्रेम विवाह को आदर्श विवाह मानती है। प्रेम स्वतः उत्पन्न भावना है। उस भावना की वो सृजनकर्ता तो है नहीं…..अतः प्रेम विवाह उसके हाथ में नहीं है। मैं समझ नहीं पा रहा कि आज के बच्चे इतने भ्रमित क्यों है? इन समस्याओं को लेकर घर में भी प्रतिदिन बातचीत होती। हल कुछ न निकलता। इन उलझे प्रश्नों को मैंने यूँ ही अनुत्तरित छोड़ दिया तथा रश्मि के विवाह की बात को कुछ समय के लिए टालना उचित समझा।

रश्मि के विवाह की चर्चा बन्द होते ही अब घर में सब कुछ सामान्य हो गया था। समय अपनी गति से आगे बढ़ता चला जा रहा था। रश्मि अपनी आगे की शिक्षा जारी रखे हुए थी। वह कॉलेज जाती, शेष समय नौकरियों के इश्तिहार देखती।

“पापा, मुझे इसी शहर की एक निजी कम्पनी में नौकरी का प्रस्ताव आया है। मुझे वो नौकरी ठीक लग रही है। मैं वो करूँगी। साथ ही सरकारी क्षेत्र में किसी अच्छी जॉब के लिए भी प्रयत्न करूँगी।’’  रश्मि ने अपनी बात दृढ़ता से कही। उसकी बातों में पूछने का नहीं, बताने का भाव था। रश्मि ने नौकरी ज्वाईन कर ली। वो दिन भर ऑफिस में काम करती। शाम को घर आकर कुछ देर आराम करती। फिर पढ़ने बैठ जाती। देर रात तक पढ़ती।

“ये लड़की घर के काम कब सीखेगी..? दिन भर ऑफिस में तथा शाम को भी पढ़ाई-लिखाई। घर के काम सीखना भी तो आवश्यक है। आख़िर लड़की की जात है। चाहे जितना भी पढ-लिख़ ले, घर के काम करने ही पड़ेंगे। रोटी बनानी ही पड़ेगी।’’  रश्मि ऑफिस के लिए तैयार हो रही थी और पत्नी ने उसे सुनाते हुए कहा।

“ बस माँ, मुझे कार्यालय के लिए निकलना है।’’ माँ की बातों को अनसुना करते हुएरश्मि कार्यालय के लिए निकल पड़ी थी।

        सेवानिवृत्ति के पश्चात् भी मैं अपने उत्तरदायित्वों से निवृत्त नहीं हो पाया था। न तो बेटी का ब्याह कर पाया था न ही पुराने मकान की मरम्मत। रही बात बेटे की तो अभी उसकी शिक्षा पूरी नहीं हुई थी।

“पापा, मैंने नौकरी के लिए परीक्षा दी थी। उसमें उत्तीर्ण हो गयी हूँ। परसों मुझे साक्षात्कार के लिए चेन्नई जाना है।’’  रश्मि ने कहा। और उसकी माँ मेरा मुँह देखने लगी।

  “किस परीक्षा का इण्टरव्यू है बेटा..? ’’ मैंने रश्मि से पूछा।

  “ बैंक का। ’’ रश्मि ने कहा और कार्यालय के लिए निकल गयी।

“ये लड़की न जाने क्या-क्या करती है। ’’ पत्नी ने कहा। पत्नी के चेहरे पर आये प्रसन्न्ता के भाव मुझसे छुप न सके।

शाम को कार्यालय से आकर रश्मि ने सफर के लिए एक छोटा-सा बैग तैयार कर लिया। अगले दिन शाम को उसकी ट्रेन थी। रश्मि ने इन कार्यों में किसी की मदद नहीं ली। ट्रेन के समय के अनुसार वह बैग लेकर निकली। सड़क से ऑटो किया तथा स्टेशन के लिए चल दी। दो दिनों पश्चात् वो अपना साक्षात्कार देकर चली आयी और पुनः अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गई। इस बीच हम कितने चिन्तित थे, ये हम ही जानते थे। रश्मि कार्यालय जाती, यदि समय हुआ तो घर के काम भी करती। इच्छा नहीं हुई तो स्पष्ट मना कर देती।

“सुनिये, रश्मि देर रात तक किसी से फोन पर बातें करती है। ’’ रहस्यमयी अंदाज़ में एक दिन पत्नी ने धीरे से कहा।

“ बच्चे बड़े हो गए हैं। समझदार भी। वो जो कुछ करेंगे, सोच समझ कर करेंगे। ’’ कुछ देर चुप रहने और सोचने के पश्चात् मैंने पत्नी से कहा।

लगभग डेढ़ माह के पश्चात डाकिया घर में एक लिफाफा दे गया,  जो रश्मि के नाम था। मैंने लिफाफा रश्मि की मेज पर रख दिया। शाम को रश्मि ने लिफाफा खोला।

“ माँ…..पापा, मेरी बैंक की नौकरी का अप्वाइंटमेंट लेटर है।’’  रश्मि ने कहा।

 “ये तो बड़ी अच्छी बात है।’’  हम दोनों एक साथ बोल पड़े।

“कहाँ पर नियुक्ति हुई है बेटा…? ’’ मैंने रश्मि से पूछा।

“ कानपुर में!’’  रश्मि ने कहा।

“अरे, दूसरे शहर में…? वो तो यहाँ ये दूर है।’’ रश्मि की माँ बोल पड़ी।

“ठीक है माँ, मैं मैनेज कर लूँगी।’’ रश्मि ने दृढ़ता से कहा।

“दो-चार दिनों के अन्दर मैं नौकरी ज्वाइन कर लूँगी।’’  रश्मि ने कहा और जाने की तैयारियों में व्यस्त हो गयी।

“कहाँ रहोगी? ’’ रश्मि को जाने की तैयारियों में व्यस्त देख, मैंने पूछा।

“मैंने रहने की व्यवस्था कर ली है पापा। कुछ दिनों तक वर्किंग वुमन हॉस्टल में रहूँगी। बाद में सेपरेट व्यवस्था कर लूँगी। ’’ रश्मि ने कहा।

“माँ, आप लोग कहते हैं कि मैं लड़की की जात हूँ। हमारा समाज कहता है कि मुझे घर के काम सीखने चाहिए। दीदी को आप लोगों ने पढ़ाया-लिखाया…घर के काम भी सिखाये किन्तु आत्मनिर्भरता व आत्मविश्वास के गुण विकसित नहीं किये, उस लड़की की जात में! आप लोगों को कदाचित् ज्ञात नहीं है कि दीदी कितनी परेशानी में जी रही है।’’  रश्मि का बात सुनकर उसकी पत्नी आवाक् थी।

“ये क्या कह रही हो, हम लोगें को तो उसने कभी कुछ नहीं बताया। ’’ पत्नी के चेहरे पर सहसा पीड़ा उभर आयी।

“माँ, आप लोगो से उसने कुछ नहीं बताया, कदाचित् इसलिए कि वो मात्र लड़की की जात है। उसका अपना कुछ भी नहीं। न तो उसका जीवन अपना है,  न भावनायें, न दुःख, न ही उसका कोई अपना अस्तित्व। मेरे पास उसके फोन आते हैं। दीदी पढ़ी-लिखी है, घर के कार्यों में कुशल है फिर भी उसका पति, उसके ससुराल के लोग उससे प्रसन्न नहीं है। मुझसे अपनी व्यथा कहते-कहते दीदी अक्सर रो पड़ती है। ’’ कहते-कहते रश्मि रूँआसी हो उठी।

“इतनी परेशानी में है मेरी बेटी। काश! हम लोगों से भी वो अपना दुख बताती। ’’ पत्नी के स्वर पीड़ में भीगे हुए थे।

“माँ, दीदी आपको और पापा को इस उम्र में कोई तनाव देना नहीं चाहती थी। वह जानती थी कि कितनी कठिनाई और काफी पैसे खर्च कर आप लोगों ने उसके उत्तरदायित्व से मुक्ति पा ली है। वह आप लोगों पर पुनः अपना कोई उत्तरदायित्व डालना नहीं चाहती है। वह देर रात को अक्सर मुझे फोन करती है।’’ रश्मि ने कहा। मैं और पत्नी चुपचाप रश्मि की बात सुन रहे थे।

“आप लोग लड़कियों को पढा़-लिखा तो देते हैं किन्तु उन्हें पुष्पित-पल्लवित होने का अवसर नहीं देते। लड़की है, कह कर उसे दबा देते हैं और उसके विकास में अवरोध उत्पन्न कर देते हैं। आज यदि दीदी साहसी और आत्मनिर्भर होती तो उसका पति भी उसे योग्य और आधुनिक समझता। दीदी के पढ़े-लिखे होने के पश्चात् भी वो उसे कुछ नहीं समझता है। यदि ऐसा न होता तो उसे रात में अपनी छोटी बहन को फोन कर अपनी पीड़ा व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। ’’ रश्मि की बातें सुनकर मुझे आत्मग्लानि होने लगी कि रात में फोन करने से हम लोग उसे न जाने क्या समझ बैठे थे। पत्नी के चेहरे पर पश्चाताप के भाव देखकर स्पष्ट था कि वो भी यही सोच रही है। तो रश्मि देर रात अपनी दीदी से फोन पर बातें किया करती थी।

“पापा, समय आने पर मैं विवाह भी करूँगी। लड़का आपकी पसन्द का हो या मेरी, उसे कुछ फर्क नहीं पड़ता। उसे महिलाओं का सम्मान करना आना चाहिए। लड़कों की दोहरी मानसिकता नहीं चलेगी। पत्नी नौकरी नहीं कर रही है तो कोई उसे दो रोटी के बदले प्रताड़ित करे। यदि नौकरी कर रही हो तो उसे चरित्रहीन कहे और उसके पैसों का उपभोग भी करे। ऐसे लड़के से विवाह मैं कतई नहीं करूँगी। ’’ रश्मि कहती जा रही थी और मैं उसका मुँह देखता जा रहा था। कितनी समझदार हो गयी थी रश्मि।

  दो दिनों पश्चात् रश्मि नौकरी ज्वाइन करने के लिए निकलने वाली थी। उसने अपने साथ ले जाने वाले आवश्यक सामानों की एक अटैची तैयार कर ली थी।

“बेटा, हम भी तुम्हें छोड़ने स्टेशन तक चलेंगे। ’’ मैंने रश्मि से कहा। आज रश्मि जाने वाली थी।

“पापा, मैं चली जाऊँगी। आप और मम्मी नाहक परेशान होंगे। ’’ रश्मि ने कहा।

  “नहीं बेटा, माता-पिता बूढ़े हो जाते है तब भी उनमें इतनी हिम्मत शेष रहती है कि आवश्यकता पड़ने पर बच्चों के साथ ढाल बनकर खड़े हो सकें। मैं तुम्हारी दीदी से भी बात करूँगा। कहूँगा निःसंकोच वो अपनी समस्याएं हम लोगों को बताये। उसे जो भी सहायता हम लोगों से चाहिए वो सब हम उसे देंगे। हमारा उत्तरदायित्व उसका विवाह करने तक नहीं, उसे सुखी देखने तक है। ’’ मैंने रश्मि से कहा।

“ पापा, एक और बात आपसे कहनी है। भाई की पढ़ाई और करियर पर जो पैसे लगे लगा दीजिए। यही समय है उसके लिए कुछ करने का। ’’ रश्मि ने कहा। उसकी बात सुनकर सहमति में सिर हिलाते हुए मैं मुस्करा पड़ा।

“सुनिये, रश्मि कितनी समझदार हो गई है। उसे मात्र अपनी ही नहीं, हम सबकी फिक्र है। उसके बारे में मैं कितनी ग़लत थी। ’’ रश्मि को ट्रेन में बैठा कर हम दोनों वापस ऑटो से घर आ रहे थे, तब  मार्ग में पत्नी ने कहा।

“ हाँ….हूँ…। ’’ अपने विचारों में खोया हुआ मैं पत्नी की बातों का बस यही उत्तर दे पा रहा था।

 दरवाजे पर ऑटो से उतरते हुए मैंने अपने घर को देखा। आज मुझे अपना घर नई ऊर्जा व रंगों से सजा हुआ लग रहा था। जब भी इसे नया करने की आवश्यकता होगी, बच्चों की पसन्द के रंगों से सजा लूँगा। अभी बच्चों के जीवन में सफलता के रंगों का होना आवश्यक है। लड़की की जात, मेरा गर्व, मेरी बेटी रश्मि ने मुझे सही मार्ग दिखाया है।

अक्टूबर का महीना प्रारम्भ हो चुका था। शाम की हवाओं में हल्की-हल्की ठंड  की खनक घुलने लगी थी। आज मैं कार्यालय से घर लौट रहा था तो रास्ते में मेरा ध्यान बार-बार एक विशेष चीज की ओर चला जा रहा था। वो यह था कि  शहर के अनेक घरों में कहीं पुताई का काम चल रहा था तो कहीं मरम्मत के काम में मजदूर लगे थे। सहसा मुझे स्मरण आया कि अगले माह के प्रथम सप्ताह दीपावली है। यह रंगाई-पुताई,  मरम्मत आदि के कार्य उसी पर्व को दृष्टि में रखते हुए हो रहे हैं। लोग पर्व की तैयारियों में लगे थे। घर-बार की मरम्मत,  साफ-सफाई आदि के कार्य उसी को दृष्टि में रखकर हो रहे थे। मैं अपने घर के बारे में सोचने लगा। पाँच-छः वर्ष हो गए हैं,  मुझे अपने घर को पुतवाये हुए। घर रंगाने-पुताने लायक हो गया है किन्तु करवा नहीं पा रहा हूँ। कारण तो मात्र यही है कि मेरे पास इस समय पर्याप्त पैसे नहीं हैं। मन को बहलाने के लिए सोच लेता हूँ कि समय नहीं है। मेरी सेवानिवृत्ति में मात्र दो वर्ष शेष रह गए हैं। सोचता हूँ कि अब सेवानिवृत्ति के पश्चात् ही ये सभी काम करूँ क्योंकि उस समय मेरे पास पर्याप्त पैसे भी रहेंगे और समय भी रहेगा। जैसे अब तक पड़ा है,  वैसे दो वर्ष और सही। घर के बारे में सोचते-सोचते मेरा घर आ गया।

अपने घर के छोटे-से गेट पर पहुँच मैं अपने मकान को ध्यान से देखने लगा। यद्यपि पाँच-छः वर्ष पूर्व घर का रंग-रोगन करवाया था किन्तु देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे बीसियों वर्ष हो गये हों इस घर को पुतवाये हुए। कितना पुराना हो गया है घर। पिताजी कहा करते थे कि जब दादा जी गाँव से यहाँ रहने के लिए आये थे, तब मुख्य शहर में उन्होंने यह जमीन ली थी और दो मंजिला घर बनवाया था। लगभग सत्तर वर्ष पुरानी बात हो गयी है। पुराना घर नवनिर्मित मकानों के समक्ष कहाँ ठहर सकता है भला? अब मरम्मत और पुताई मांगता है। दो वर्ष की धूप-बारिश, आँधी-तूफान रोकते-रोकते इसकी अवस्था थोड़ी और पुरानी, जर्जर हो जाएगी। मकान की हालत खराब हो तो हो, इस मकान की मरम्मत तभी कराऊँगा, जब सेवानिवृत्त हो जाऊँगा। अभी मैं थोड़े-बहुत जमा किए पैसे मकान को सजाने जैसे गैर ज़रूरी कार्य में खर्च करना आवश्यक नहीं समझता।

मैं करूँ भी तो क्या करूँ…? ऐसा नहीं है कि मैं अपने मकान का जीर्णोद्धार करना नहीं चाहता था। तीन-तीन बच्चों की परवरिश, शिक्षा और घर गृहस्थी के अनेक खर्चों को पूरा करना आज के समय में जबकि महंगाई आसमान छू रही है,  आसान नहीं था। मेरे तीन बच्चे हैं। दो बेटियाँ व एक बेटा। बड़ी बेटी का ब्याह मैंने कर दिया है। स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद विवाह से पूर्व नौकरी के लिए अनेक प्रयत्न उसने किए किन्तु सफल न हो सकी। विवाह के पश्चात् इस समय वह अपनी ससुराल में है और ठीक ही है। अब उसके दो बच्चे हैं। बड़ा बेटा चार वर्ष का तथा छोटा तीन वर्ष का है। शेष सब कुछ ठीक ही है। छोटी बेटी ग्रेजुएशन कर रही है। यह अन्तिम वर्ष है। आगे और पढ़ना चाहती है किन्तु भ्रमित है कि आगे कौन-सी पढ़ाई करे जिससे नौकरी में लग जाये। बड़ी बहन ने इतिहास से एमए किया था। प्रयत्न करने के पश्चात् भी नौकरी नहीं मिली। बेटा इण्टर फाइनल में है। वो बी0 टेक0 कर इन्जीनियर बनना चहता है। बी0 टेक0 की फीस कम नहीं है किन्तु बेटे की इच्छा पूरी करनी ही है। बच्चों के भविष्य के लिए सोचना सबसे पहला उत्तरदायित्व है मेरा। बेटे का भविष्य बन जाये, बच्चे आत्मनिर्भर बन जायें उससे अच्छी बात और क्या हो सकती है?  घर-मकान तो बाद में भी सजते-सँवरते रहेंगे।

दिन पंख लगा कर उड़ते चले जा रहे हैं। बेटा आज प्रसन्न है। इण्टरमीडिएट में अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने के पश्चात् इसी शहर के एक अच्छे कॉलेज में बी0 टेक0 में उसका एडमिशन हो गया है। मैं भी खुश हूँ यह सोचकर कि यदि कहीं किसी दूसरे शहर में उसका एडमिशन होता तो मेरे खर्चे बढ़ जाते। मुझे आर्थिक तंगी का समना करना पड़ता। उसकी फीस इत्यादि भर दी गई है। वह कॉलेज जाने लगा है। समय व्यतीत होता जा रहा है। देखते ही देखते दो वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन वो भी आया जब मैं सेवानिवृत्त हो गया। दूसरी बेटी का ब्याह और बेटे की शिक्षा का पूरा उत्तरदायित्व शेष था। सेवानिवृत्ति के बाद कुछ दिनों तक तो घर में अच्छा लगा। किन्तु धीरे-धीरे जीवन में अब नीरसता व्याप्त होने लगी थी। अपने पुराने घर को देखकर मेरी चिन्ता और बढ़ जाती। सोचता यह तो पूरा का पूरा घर ही पुराना है। नीचे से ऊपर तक पूरा का पूरा ही ठीक कराना पड़ेगा। बाहर की दीवारें, बैठक, बरामदा सबके प्लास्टर गिर रहे हैं।

 “मधु, घर की दशा अत्यन्त खराब हो गयी है। अब मरम्मत कराना आवश्यक हो गया है। कब से काम प्रारम्भ कराएं कुछ समझ में नहीं आ रहा है? घर ठीक कराने में अच्छे-खासे पैसे भी लगेंगे। रश्मि का विवाह अब तक नहीं हो पाया है। विवाह में न जाने कितने पैसे लगेंगे? यही सोच कर घर की मरम्मत में हाथ नहीं लगा रहा हूँ। रश्मि का विवाह हो जाता तो कोई चिन्ता न रहती।’’  मन की दुविधा को पत्नी के सामने रखते हुए मैंने कहा।

“मकान पुराना तो अवश्य हो गया है। किन्तु मेरा विचार ये है कि मकान के बाहर-बाहर पुताई करवा लीजिये। रश्मि की शादी के बाद जो कराना है, कराइयेगा। ’’ पत्नी ने कहा।

“हाँ, रश्मि की शादी…?  किन्तु कब?  कैसे करूँ? कुछ समझ में नहीं आ रहा है। अभी तो वह नौकरी के लिए प्रयत्न कर रही है।’’  इससे अधिक मैं कुछ नहीं बोल पाया।

 ’’ आप तो ऐसे आश्चर्य कर रहे हैं, जैसे रश्मि की शादी नहीं करेंगे..? उसकी शिक्षा पूरी हो चुकी है। वह नौकरी के लिए प्रयत्न कर रही है। इतनी शीघ्र नौकरी मिलती कहाँ है.? हम उसे प्रयत्न करने से मना नहीं कर रहे हैं। वो अपना कार्य करती रहे किन्तु हमें तो समय से उसका ब्याह कर देना है।’’  पत्नी ने कहा।

“हूँ…।“ मधु सही कह रही है। इस समय रश्मि का विवाह हमारी पहली प्राथमिकता है। मैंने मकान ठीक कराने का विचार का त्याग कर  पुत्री के विवाह का मन बना लिया।

अब हमारा पहला काम यह था कि हम पुत्री के लिए योग्य वर की  तलाश करें। वर ढूँढ़ने के लिए मैंने उन रिश्तेदारों को भी फोन किया, जिनसे बात किये अरसा हो गया था। यद्यपि मैं जानता था कि इनसे कुछ खास मदद मिलने वाली नहीं है। अखबारों में वैवाहिक विज्ञापन भी देखने लगा। ठीक लगे कुछ लड़कों के फोन नम्बर भी लिख लिए थे। लड़के वालों से बात करने लगा, किन्तु अभी तक बात बनी नहीं थी। वे लड़के मेरी चयन कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे थे। जिन रिश्तेदारों को वर बताने के लिए कहा था, उन्होंने  पलटकर फोन तक नहीं किया था। धीरे-धीरे एक वर्ष और व्यतीत हो गया। मैंने सोचा कि बेटी के लिए वर का चयन करने के लिए इतने कठोर नियमों पर नहीं चलूँगा। मैं उन्हीं लड़कों में से किसी एक सही लड़के का चयन कर लूँगा। यह बात मैंने पत्नी से भी बता दिया।

“सुनिये, एक लड़के के घर से फोन आया था। वे लोग रश्मि को अगले हफ्ते देखने आना चाहते हैं।’’   एक दिन बाजार से मेरे घर आने पर पत्नी ने कहा।

 “ठीक है।’’  मैंने कहा।

“मैं रश्मि को बता देती हूँ। इस समय वो अपने कमरे में है।’’  कह कर पत्नी रश्मि के कमरे की ओर बढ़ गयी।

“मैंने सुन लिया है मम्मी। मैं बाजार में लगाई गई बिक्री  की कोई वस्तु नहीं हूँ कि कोई मुझे देखने आयेगा और मुझे पसन्द करेगा। नहीं ठीक लगी तो मना कर के चला जायेगा।’’  रश्मि अपनी माँ से कह रही थी। उसकी आवाज मुझ तक आ रही थी।

“हूँ…हँ.., शादी कर लो। बस्स… हो गई इन लोगों की जिम्मेदारी पूरी और मेरा जीवन…कुछ नहीं….।’’  रश्मि ने बुदबुदाते हुए कहा।

“ये लो…अब ये बातें सुनो। लड़कियों की ब्याह-शादी तो ऐसे ही होती हैं। उन्हें लड़के वाले देखने आते ही हैं। ’’ पत्नी ने रश्मि को समझाते हुए कहा।

“ नहीं मम्मी, ये सब पहले होता होगा। अब नहीं चलेगा। मैं सज-सँवर कर किसी के सामने नहीं जाऊँगी। मैं नौकरी के लिए प्रयत्न कर रही हूँ। मुझे थोड़ा समय दीजिए। अभी आप लोगों को मेरे लिए लड़का देखने की आवश्यकता नहीं है। ’’ कहती हुई रश्मि कमरे से बाहर आ गयी और रसोई की ओर बढ़ गयी। उसके पीछे-पीछे पत्नी भी बाहर आ चुकी थीं।

रसोई से खट-पट की आवाजें आने लगी थीं। कदाचित् रश्मि रसोई में कोई काम कर रही थी।

“सुनिये, क्या जमाना इतना बदल गया है? आपने बिटिया की बात तो सुनी ही होगी..? ’’ पत्नी मेरे पास ड्राइंग रूम में आकर धीरे से बोलीं। धीरे से बोलने का उद्देश्य यह था कि कहीं रश्मि सुन न ले।

पत्नी की बात सुनकर मैं खामोश रहा। ऐसी उलझी परिस्थितियों में जब कुछ स्पष्ट नहीं होता, मैं बहुधा खामोश हो जाता हूँ।

“इसकी बड़ी बहन ने हम लोगों के कहने से, जहाँ हमने चाहा उसने विवाह किया। चाहे जैसे भी हो, अब अपनी ससुराल में है।…..ये लड़की नये ज़माने की बात कर रही है। हमने पढ़ाया-लिखाया, नौकरी के लिए भी मना नहीं कर रहे हैं….।’’  पत्नी अभी तक धीमे-धीमे बुदबुदा रही थी। मैं यह सोचकर निश्चिन्त होने का प्रयत्न कर रहा था कि आज नहीं तो कल मुझे अपनी बेटी का ब्याह करना है। मध्यमवर्गीय तौर-तरीके से विवाह करने भर के पैसे मेरे पास हैं।

      दिन व्यतीत होते जा रहे थे। ऋतुएं बदल रही थीं। परिवर्तन का प्रभाव मनःस्थितियों पर पड़ता है या नहीं ये मैं नहीं जानता क्योंकि मेरा मकान नवनिर्माण की राह देख रहा था तथा बेटी नये जमाने के साथ चलने की बात कर रही थी। इन्हीं दो उत्तरदायित्वों को पूरा करने की फ़िक्र में बस मेरे दिन व्यतीत हो रहे थे। रश्मि चाहती क्या है..? माता-पिता द्वारा तय की गयी शादी वो करना नहीं चाहती। आखिर कब तक वो ऐसे ही बैठी रहेगी? आत्मनिर्भर बनना चाहती है, किन्तु सत्य यह भी है कि नौकरी आसानी से मिलती नहीं। प्राइवेट नौकरी में शोषण की संभावनाएं भी रहती हैं….शारीरिक स्तर पर हो या मानसिक। यह बात वो जानती है। अतः सरकारी नौकरी की ओर उसका झुकाव है। प्रेम विवाह को आदर्श विवाह मानती है। प्रेम स्वतः उत्पन्न भावना है। उस भावना की वो सृजनकर्ता तो है नहीं…..अतः प्रेम विवाह उसके हाथ में नहीं है। मैं समझ नहीं पा रहा कि आज के बच्चे इतने भ्रमित क्यों है? इन समस्याओं को लेकर घर में भी प्रतिदिन बातचीत होती। हल कुछ न निकलता। इन उलझे प्रश्नों को मैंने यूँ ही अनुत्तरित छोड़ दिया तथा रश्मि के विवाह की बात को कुछ समय के लिए टालना उचित समझा।

रश्मि के विवाह की चर्चा बन्द होते ही अब घर में सब कुछ सामान्य हो गया था। समय अपनी गति से आगे बढ़ता चला जा रहा था। रश्मि अपनी आगे की शिक्षा जारी रखे हुए थी। वह कॉलेज जाती, शेष समय नौकरियों के इश्तिहार देखती।

“पापा, मुझे इसी शहर की एक निजी कम्पनी में नौकरी का प्रस्ताव आया है। मुझे वो नौकरी ठीक लग रही है। मैं वो करूँगी। साथ ही सरकारी क्षेत्र में किसी अच्छी जॉब के लिए भी प्रयत्न करूँगी।’’  रश्मि ने अपनी बात दृढ़ता से कही। उसकी बातों में पूछने का नहीं, बताने का भाव था। रश्मि ने नौकरी ज्वाईन कर ली। वो दिन भर ऑफिस में काम करती। शाम को घर आकर कुछ देर आराम करती। फिर पढ़ने बैठ जाती। देर रात तक पढ़ती।

“ये लड़की घर के काम कब सीखेगी..? दिन भर ऑफिस में तथा शाम को भी पढ़ाई-लिखाई। घर के काम सीखना भी तो आवश्यक है। आख़िर लड़की की जात है। चाहे जितना भी पढ-लिख़ ले, घर के काम करने ही पड़ेंगे। रोटी बनानी ही पड़ेगी।’’  रश्मि ऑफिस के लिए तैयार हो रही थी और पत्नी ने उसे सुनाते हुए कहा।

“ बस माँ, मुझे कार्यालय के लिए निकलना है।’’ माँ की बातों को अनसुना करते हुएरश्मि कार्यालय के लिए निकल पड़ी थी।

        सेवानिवृत्ति के पश्चात् भी मैं अपने उत्तरदायित्वों से निवृत्त नहीं हो पाया था। न तो बेटी का ब्याह कर पाया था न ही पुराने मकान की मरम्मत। रही बात बेटे की तो अभी उसकी शिक्षा पूरी नहीं हुई थी।

“पापा, मैंने नौकरी के लिए परीक्षा दी थी। उसमें उत्तीर्ण हो गयी हूँ। परसों मुझे साक्षात्कार के लिए चेन्नई जाना है।’’  रश्मि ने कहा। और उसकी माँ मेरा मुँह देखने लगी।

  “किस परीक्षा का इण्टरव्यू है बेटा..? ’’ मैंने रश्मि से पूछा।

  “ बैंक का। ’’ रश्मि ने कहा और कार्यालय के लिए निकल गयी।

“ये लड़की न जाने क्या-क्या करती है। ’’ पत्नी ने कहा। पत्नी के चेहरे पर आये प्रसन्न्ता के भाव मुझसे छुप न सके।

शाम को कार्यालय से आकर रश्मि ने सफर के लिए एक छोटा-सा बैग तैयार कर लिया। अगले दिन शाम को उसकी ट्रेन थी। रश्मि ने इन कार्यों में किसी की मदद नहीं ली। ट्रेन के समय के अनुसार वह बैग लेकर निकली। सड़क से ऑटो किया तथा स्टेशन के लिए चल दी। दो दिनों पश्चात् वो अपना साक्षात्कार देकर चली आयी और पुनः अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गई। इस बीच हम कितने चिन्तित थे, ये हम ही जानते थे। रश्मि कार्यालय जाती, यदि समय हुआ तो घर के काम भी करती। इच्छा नहीं हुई तो स्पष्ट मना कर देती।

“सुनिये, रश्मि देर रात तक किसी से फोन पर बातें करती है। ’’ रहस्यमयी अंदाज़ में एक दिन पत्नी ने धीरे से कहा।

“ बच्चे बड़े हो गए हैं। समझदार भी। वो जो कुछ करेंगे, सोच समझ कर करेंगे। ’’ कुछ देर चुप रहने और सोचने के पश्चात् मैंने पत्नी से कहा।

लगभग डेढ़ माह के पश्चात डाकिया घर में एक लिफाफा दे गया,  जो रश्मि के नाम था। मैंने लिफाफा रश्मि की मेज पर रख दिया। शाम को रश्मि ने लिफाफा खोला।

“ माँ…..पापा, मेरी बैंक की नौकरी का अप्वाइंटमेंट लेटर है।’’  रश्मि ने कहा।

 “ये तो बड़ी अच्छी बात है।’’  हम दोनों एक साथ बोल पड़े।

“कहाँ पर नियुक्ति हुई है बेटा…? ’’ मैंने रश्मि से पूछा।

“ कानपुर में!’’  रश्मि ने कहा।

“अरे, दूसरे शहर में…? वो तो यहाँ ये दूर है।’’ रश्मि की माँ बोल पड़ी।

“ठीक है माँ, मैं मैनेज कर लूँगी।’’ रश्मि ने दृढ़ता से कहा।

“दो-चार दिनों के अन्दर मैं नौकरी ज्वाइन कर लूँगी।’’  रश्मि ने कहा और जाने की तैयारियों में व्यस्त हो गयी।

“कहाँ रहोगी? ’’ रश्मि को जाने की तैयारियों में व्यस्त देख, मैंने पूछा।

“मैंने रहने की व्यवस्था कर ली है पापा। कुछ दिनों तक वर्किंग वुमन हॉस्टल में रहूँगी। बाद में सेपरेट व्यवस्था कर लूँगी। ’’ रश्मि ने कहा।

“माँ, आप लोग कहते हैं कि मैं लड़की की जात हूँ। हमारा समाज कहता है कि मुझे घर के काम सीखने चाहिए। दीदी को आप लोगों ने पढ़ाया-लिखाया…घर के काम भी सिखाये किन्तु आत्मनिर्भरता व आत्मविश्वास के गुण विकसित नहीं किये, उस लड़की की जात में! आप लोगों को कदाचित् ज्ञात नहीं है कि दीदी कितनी परेशानी में जी रही है।’’  रश्मि का बात सुनकर उसकी पत्नी आवाक् थी।

“ये क्या कह रही हो, हम लोगें को तो उसने कभी कुछ नहीं बताया। ’’ पत्नी के चेहरे पर सहसा पीड़ा उभर आयी।

“माँ, आप लोगो से उसने कुछ नहीं बताया, कदाचित् इसलिए कि वो मात्र लड़की की जात है। उसका अपना कुछ भी नहीं। न तो उसका जीवन अपना है,  न भावनायें, न दुःख, न ही उसका कोई अपना अस्तित्व। मेरे पास उसके फोन आते हैं। दीदी पढ़ी-लिखी है, घर के कार्यों में कुशल है फिर भी उसका पति, उसके ससुराल के लोग उससे प्रसन्न नहीं है। मुझसे अपनी व्यथा कहते-कहते दीदी अक्सर रो पड़ती है। ’’ कहते-कहते रश्मि रूँआसी हो उठी।

“इतनी परेशानी में है मेरी बेटी। काश! हम लोगों से भी वो अपना दुख बताती। ’’ पत्नी के स्वर पीड़ में भीगे हुए थे।

“माँ, दीदी आपको और पापा को इस उम्र में कोई तनाव देना नहीं चाहती थी। वह जानती थी कि कितनी कठिनाई और काफी पैसे खर्च कर आप लोगों ने उसके उत्तरदायित्व से मुक्ति पा ली है। वह आप लोगों पर पुनः अपना कोई उत्तरदायित्व डालना नहीं चाहती है। वह देर रात को अक्सर मुझे फोन करती है।’’ रश्मि ने कहा। मैं और पत्नी चुपचाप रश्मि की बात सुन रहे थे।

“आप लोग लड़कियों को पढा़-लिखा तो देते हैं किन्तु उन्हें पुष्पित-पल्लवित होने का अवसर नहीं देते। लड़की है, कह कर उसे दबा देते हैं और उसके विकास में अवरोध उत्पन्न कर देते हैं। आज यदि दीदी साहसी और आत्मनिर्भर होती तो उसका पति भी उसे योग्य और आधुनिक समझता। दीदी के पढ़े-लिखे होने के पश्चात् भी वो उसे कुछ नहीं समझता है। यदि ऐसा न होता तो उसे रात में अपनी छोटी बहन को फोन कर अपनी पीड़ा व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। ’’ रश्मि की बातें सुनकर मुझे आत्मग्लानि होने लगी कि रात में फोन करने से हम लोग उसे न जाने क्या समझ बैठे थे। पत्नी के चेहरे पर पश्चाताप के भाव देखकर स्पष्ट था कि वो भी यही सोच रही है। तो रश्मि देर रात अपनी दीदी से फोन पर बातें किया करती थी।

“पापा, समय आने पर मैं विवाह भी करूँगी। लड़का आपकी पसन्द का हो या मेरी, उसे कुछ फर्क नहीं पड़ता। उसे महिलाओं का सम्मान करना आना चाहिए। लड़कों की दोहरी मानसिकता नहीं चलेगी। पत्नी नौकरी नहीं कर रही है तो कोई उसे दो रोटी के बदले प्रताड़ित करे। यदि नौकरी कर रही हो तो उसे चरित्रहीन कहे और उसके पैसों का उपभोग भी करे। ऐसे लड़के से विवाह मैं कतई नहीं करूँगी। ’’ रश्मि कहती जा रही थी और मैं उसका मुँह देखता जा रहा था। कितनी समझदार हो गयी थी रश्मि।

  दो दिनों पश्चात् रश्मि नौकरी ज्वाइन करने के लिए निकलने वाली थी। उसने अपने साथ ले जाने वाले आवश्यक सामानों की एक अटैची तैयार कर ली थी।

“बेटा, हम भी तुम्हें छोड़ने स्टेशन तक चलेंगे। ’’ मैंने रश्मि से कहा। आज रश्मि जाने वाली थी।

“पापा, मैं चली जाऊँगी। आप और मम्मी नाहक परेशान होंगे। ’’ रश्मि ने कहा।

  “नहीं बेटा, माता-पिता बूढ़े हो जाते है तब भी उनमें इतनी हिम्मत शेष रहती है कि आवश्यकता पड़ने पर बच्चों के साथ ढाल बनकर खड़े हो सकें। मैं तुम्हारी दीदी से भी बात करूँगा। कहूँगा निःसंकोच वो अपनी समस्याएं हम लोगों को बताये। उसे जो भी सहायता हम लोगों से चाहिए वो सब हम उसे देंगे। हमारा उत्तरदायित्व उसका विवाह करने तक नहीं, उसे सुखी देखने तक है। ’’ मैंने रश्मि से कहा।

“ पापा, एक और बात आपसे कहनी है। भाई की पढ़ाई और करियर पर जो पैसे लगे लगा दीजिए। यही समय है उसके लिए कुछ करने का। ’’ रश्मि ने कहा। उसकी बात सुनकर सहमति में सिर हिलाते हुए मैं मुस्करा पड़ा।

“सुनिये, रश्मि कितनी समझदार हो गई है। उसे मात्र अपनी ही नहीं, हम सबकी फिक्र है। उसके बारे में मैं कितनी ग़लत थी। ’’ रश्मि को ट्रेन में बैठा कर हम दोनों वापस ऑटो से घर आ रहे थे, तब  मार्ग में पत्नी ने कहा।

“ हाँ….हूँ…। ’’ अपने विचारों में खोया हुआ मैं पत्नी की बातों का बस यही उत्तर दे पा रहा था।

 दरवाजे पर ऑटो से उतरते हुए मैंने अपने घर को देखा। आज मुझे अपना घर नई ऊर्जा व रंगों से सजा हुआ लग रहा था। जब भी इसे नया करने की आवश्यकता होगी, बच्चों की पसन्द के रंगों से सजा लूँगा। अभी बच्चों के जीवन में सफलता के रंगों का होना आवश्यक है। लड़की की जात, मेरा गर्व, मेरी बेटी रश्मि ने मुझे सही मार्ग दिखाया है।

 दरवाजे पर ऑटो से उतरते हुए मैंने अपने घर को देखा। आज मुझे अपना घर नई ऊर्जा व रंगों से सजा हुआ लग रहा था। जब भी इसे नया करने की आवश्यकता होगी, बच्चों की पसन्द के रंगों से सजा लूँगा। अभी बच्चों के जीवन में सफलता के रंगों का होना आवश्यक है। लड़की की जात, मेरा गर्व, मेरी बेटी रश्मि ने मुझे सही मार्ग दिखाया है।

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नीरजा हेमेन्द्र
जन्म-पडरौना, ( कुशीनगर ) उ0 प्र0।
शिक्षा- एम.ए.( हिन्दी साहित्य ), बी.एड.।
संप्रति- शिक्षिका ( लखनऊ उ0 प्र0 )
प्रकाशन-  5 कहानी संग्रह अमलतास के फूल, जी हां, मैं लेखिका हूं, पत्तों पर ठहरी ओस की बूंदें, और एक  दिन, माटी में उगते शब्द
2 उपन्यास अपने अपने इंद्रधनुष और उन्हीं रास्तों से गुजरते हुए।
4 कविता संग्रह मेघ, मानसून और मन, ढूंढ कर लाओ ज़िन्दगी, बारिश और भूमि और स्वप्न
सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
सम्मान --  उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का विजयदेव नारायण साही नामित पुरस्कार। शिंगलू स्मृति सम्मान। फणीश्वरनाथ रेणु स्मृति सम्मान। कमलेश्वर कथा सम्मान। लोकमत पुरस्कार।
आकाशवाणी, दूरदर्शन से रचनाएं प्रसारित           
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