समीर कुमार ठाकुर की कहानी “लव यू डैड”

समीर कुमार ठाकुर

समीर नवोदित कथाकार हैं। लिटरेचर प्वाइंट में उनकी ये पहली कहानी प्रकाशित हो रही है। उम्मीद है वो और बेहतर लिखेंगे।

'पापा..पाप..' राहुल गुस्से में चिल्लाते हुए पापा केे कमरे में आया, 'नेट क्यों नहीं चल रहा है पाप? मैंने आप से कहा था कि आप ठीक करवा लेना पर आप कहां किसी की सुनते हो।'

'अभी देखता हूं बेटा।' शर्मा जी को जब कभी भी अपने बेटे से बात करने की इच्छा होती थी, वो नेट के तार को छेड़ दिया करते थे। नोंक-झोंक ही सही पर इसी बहाने राहुल से बात हो जाया करती थी, और दिल को थोड़ा सुकून मिलता था। जब से राहुल की मां छोड़ कर गई थी, वो इसका जिम्मेदार अपने पिता को मानता था। दोनों साथ रहते तो थे, पर अजनबियों की तरह। बात तक नहीं होती थी दोनों के बीच। उनके बीच बातचीत की एकमात्र कड़ी नेट का ये कनेक्शन हीं था। बहुत प्यार करते थे शर्मा जी अपने बेटे से पर उसकी नफरत के सामने कभी जता नहीं पाए। आखिर कैसे बता पाते वो कि अपने जीवन की सारी कमाई लगाने के बाद भी वो अपनी जिंदगी (राहुल की मां) को बचा नहीं पाए। किस मुंह से कहते कि उसने तो सिर्फ अपनी मां खोई है, मैंने तो अपना बेटा भी खो दिया है।

'खाना खा लेना मैं ऑफिस के लिए निकल रहा हूं'  रास्ते में ही था राहुल का कॉलेज पर दोनों कभी भी साथ नहीं गए। साथ रह कर भी अलग रहने का हुनर दोनों बखूबी जानते थे। शर्मा जी का आधा वक्त इसी में गुजरता था कि कैसे इस दूरी को खत्म किया जाए, लेकिन उनके तमाम नुस्खे फुस्स हो जाते।

शर्मा जी के ऑफिस का माहौल पिछले कुछ दिनों से बदला था। शांत रहने वाले ऑफिस में थोड़ी शोरगुल शुरु हुई थी, क्योंकि  उम्रदराज लोगों के बीच एक तेजतर्रार, हंसमुख नौजवान आदर्श ऑफिस ज्वायन किया था। ऑफिस के इस बदलाव से सबसे ज्यादा खुशी शर्मा जी को हुई थी, क्योंकि उन्हें हमेशा एक बेटे की प्यार की कमी रही थी। वो आदर्श से बात करने का कोई भी मौका चूकना नहीं चाहते थे। उन्होंने बातों हीं बातों में अपनी परेशानी आदर्श को बता दी। आदर्श ने उन्हें सोशल साइट्स का सहारा लेने की सलाह दी, पर शर्मा जी का इन सबसे दूर-दूर का कोई नाता नहीं था। लेकिन कुछ दिनों बाद आदर्श की मेहनत रंग लाई और शर्मा जी ने फेसबुक पर एक फेक आईडी बना डाली और फिर सिलसिला शुरु हुआ राहुल से बातचीत का।

शर्मा जी ने सबसे पहला सवाल राहुल से ये किया कि भाई तेरे घर में कौन-कौन है? मानो वो राहुल के दिल में अपना स्थान जानना चाहते हों..

राहुल : मैं हूं और मेरे पापा...

पापा : फिर तो वो तुमसे बहुत प्यार करते होंगे ना..

राहुल :यार रहने दे तू बता तेरे घर में कौन-कौन है?

पापा : मैं अकेला हूं, मुझे नहीं पता मम्मी-पापा का प्यार क्या होता है? तू तो जानता होगा ना..

राहुल के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। इस तरह बातचीत का सिलसिला लगातार चलता रहा और अब राहुल की हर पसंद-नापसंद शर्मा जी को पता थी जो राहुल के बिना कहे पूरी हो रही थी। राहुल अपने पापा के इस बदलाव से अचंभित था, और शर्मा जी को भी ये सब करके बेटे का प्यार हासिल होता दिख रहा था। राहुल अब छोटी से छोटी बात भी अपने इस फेसबुक फ्रेंड से शेयर करने लगा। चिड़चिड़ा राहुल अब अकेलपन से निजात पा चुका था, सो उसके व्यवहार में भी परिवर्तन होने लगा। अब अपने पापा से वो उस लहजे में बात नहीं करता था, जैसै किया करता था।

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, पर होनी को ये मंजूर नहीं था, एक दिन अचानक राहुल के पास पुलिस स्टेशन से फोन आया कि आप राहुल बोल रहे हो ना। आपके पिता का एक्सीडेंट हो गया है, आप फौरन  हॉस्पिटल चले आओ। राहुल भागता हुआ हॉस्पिटल पहुंचा, पर राहुल अपने पापा से आखरी बार भी नहीं मिल पाया, वो फूट-फूट कर रो रहा था। उसे बहुत कुछ कहना था अपने पापा से।

चश्मदीदों ने बताया कि उनका ध्यान मोबाइल पर था, और सामने से आती ट्रक उन्हें टक्कर मार भाग गई। तब तक आदर्श भी वहां भागता हुआ आया, 'राहुल हो ना तुम?'

'हां, आप कौन?

'मैं तुम्हारे पापा के साथ काम करता था। वो हमेशा तुम्हारी हीं बात किया करते थे। तुम्हारे सबसे अच्छे मित्र भी वही थे, उन्होंने ये बात तुम्हें बताने से मना की थी।'

राहुल सिर्फ और सिर्फ रोए जा रहा था,'मैं भी आपसे बहुत प्यार करता था, “लव यू डैड” बस कभी बता नहीं पाया।'

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