राजगोपाल सिंह वर्मा की कहानी ‘…सोलह प्रेम पत्र’

राजगोपाल सिंह वर्मा

पत्रकारिता तथा इतिहास में स्नातकोत्तर शिक्षा. केंद्र एवम उत्तर प्रदेश सरकार में विभिन्न मंत्रालयों में

प्रकाशनप्रचार और जनसंपर्क के क्षेत्र में जिम्मेदार वरिष्ठ पदों पर कार्य करने का अनुभव.

पांच वर्ष तक प्रदेश सरकार की साहित्यिक पत्रिका “उत्तर प्रदेश “ का स्वतंत्र सम्पादन.

इससे पूर्व उद्योग मंत्रालय तथा स्वास्थ्य मंत्रालयभारत सरकार में भी सम्पादन का अनुभव.

वर्तमान में आगराउत्तर प्रदेश में निवासरत. विभिन्न राष्ट्रीय समाचारपत्रोंपत्रिकाओंआकाशवाणी और डिजिटल मीडिया में हिंदी और अंग्रेजी भाषा में लेखन और प्रकाशन तथा सम्पादन का  वृहद अनुभव.  कुल लगभग 800 लेख आदि प्रकाशित. कविताकहानी तथा ऐतिहासिक व अन्य विविध विषयों पर लेखन.

सम्पर्क:

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ओह अभिनव, तुम मेरा जीवन हो और तुम अच्छी तरह से जानते हो कि जब किसी की जिंदगी उससे दूर चली जाती है, तो वह मर जाता है! तुमने कभी मुझे छलने की कोशिश भी की तो मैं अपनी जान दे दूंगी। मैं हमेशा के लिए इस संसार को अलविदा कह दूंगी। अब मुझे देखना है कि तुम कहां तक मेरा साथ दोगे!”

सही पहचाना आपने ! यह नव-प्रेम में डूबी एक षोडसी का पहला पत्र था जो अपने उस प्रेमी के नाम लिखा था जिसके नाम उसने अपनी जिंदगी लिख दी थी ! 17-साल की कृति स्थानीय वैदिक गर्ल्स स्कूल में कक्षा 11 की छात्रा थी। लगभग 5 फुट 5 इंच के कद, गोरे रंग, तीखे नयन-नक्श और छरहरी काया वाली कृति किसी को भी एक दृष्टि में आकर्षित करने की क्षमता रखती थी। उधर अभिनव भी कद-काठी से सुगठित शरीर का स्वामी, जिम का शौक रखता था, बी एस सी में पढ़ रहा था और  मां-बाप और बहन के साथ छोटे-से परिवार का था वह आशा बिन्दु !

कहने को अभिनव और कृति… बचपन से ही पड़ोसी भी थे और  मित्र भी थे ! साथ खेलते-कूदते बड़े हुए तो यह भी नहीं पता चला कि कब उस उम्र की सीमा तक आ पहुंचे जब लड़की के लिये नीची निगाह कर चलना और लड़कों से बात करने पर भी मनाही लागू थी । पर, यह मित्रता भला अचानक कैसे टूट जाये! कोई कारण भी तो हो?  कृति की दुनिया सीमित थी। घर और माँ, पिता एक छोटा भाई बस ! पर हां, मुहल्ला बहुत बड़ा था। हम उम्र लड़कियों के खेलकूद से रौनक रहती | अभिनव यूँ तो उम्र में बड़ा था उससे, पर उसकी बहिन गुड्डी जरूर कृति की हमउम्र थी और दोनों में अच्छी मित्रता थी ! शाम होते-होते तो गली में ऐसा  लगता कि मेले का सा माहौल हो।

और एक दिन जब कृति की बालकनी पर जो छोटे से पत्थर से बंधा पत्र गिरा तो कृति के आश्चर्य का ठिकाना ही न रहा। यह अभिनव का सटीक निशाना था ! वह दूर अपनी बालकनी से खड़ा मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। उस कागज़ के पुर्जे को कृति ने न जाने कितनी बार पढ़ा पर कुछ अच्छा महसूस नहीं कर सकी ! ऐसा लगा कि कुछ बहुत ही गलत हो रहा है ! क्या यही प्रेम है ? अब उसे मालूम हो रहा था कि क्यों उसे लड़कों से बात नहीं करनी चाहिए। उसने तय किया कि वह सख्ती से अभिनव को मना करेगी। उसे नहीं करना किसी से प्रेम-वरेम ! गुड्डे-गुड़ियों तक तो ठीक है पर यह बात कुछ जंची नहीं कृति को कि वह उसे पत्र लिखे । एक बार मन में आया भी कि मम्मी से शिकायत भी कर दें अभिनव की। फिर सोचा, क्यों नया बखेड़ा किया जाए, रहने देते हैं, कहीं पापा तूफान ही न खड़ा कर दें।

तीन दिन बीत गए। अभिनव भी नहीं दिखा। कम से कम एक बार घूर ही देते तो लाइन पर आ जाता, सोचा कृति ने ! पर यह क्या… आज तो गज़ब ही हो गया। अभिनव तो गली के नुक्कड़ पर ही मिल गया। 6.30 बजे सवेरे ! उसको कैसे पता कि अंजलि आज स्कूल नहीं जाएगी और कृति अकेली ही जाएगी।

कृति ने दूर से ही घूरा उसे और निकट आते ही पूछा, “क्या था वह सब..? क्यों पत्थर में रखकर पत्र भेजते हो? ऐसे कोई करता है क्या ? हमें नहीं पसंद यह सब कुछ… ध्यान रखना। आगे ऐसा न हो…!”  पर वह तो शांत खड़ा ऐसे ढीठ बन मुस्कुरा रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो ! उसे क्या पता कि कहीं घर में कोई और देख लेता तो न जाने कौन सी आफत आ जाती।

वह जाने लगी तो अभिनव रास्ता ही रोक कर खड़ा हो गया और बिना कुछ बोले ही एक और कागज़ की तह की हुई चिट्ठी कृति की मुट्ठी में पकड़ा दी थी उसने! …और जब तक कुछ समझे कृति, अभिनव वहां से नौ दो ग्यारह हो गया। एक बार तो सोचा फेंक दे उसे…पर फिर किसी के हाथ न लग जाये यह सोचकर नहीं फेंक पाई और लंबे-लंबे कदमों से सीधे स्कूल में जाकर ही रुकी। तिलमिलाकर रह गई थी कृति !  गुस्सा तो बहुत आया… पर  जब स्कूल में इंटरवल में पढा वह पत्र तो न जाने कैसे भाव तैर गए उसके चेहरे पर ! सब खेल के मैदान में थे और वह नितांत अकेली क्लासरूम में ! नहीं, अकेली नहीं… अभिनव का पत्र… दूसरा पत्र और उसकी कुछ बाल सुलभ यादें, वह भी आसपास ही थीं। आज इतना भी बुरा नहीं लगा था अभिनव का पत्र देना कृति को। शायद उसके खुरदरे हाथ के स्पर्श की अनुभूति थी यह, जिसमें अपनत्व के कुछ तत्व महसूस हो रहे थे कृति को !

स्कूल के बाद घर पहुंची तो कृति के मन में आक्रोश के भाव कम थे, एक नई दुनिया में प्रविष्ट करने की आकांक्षा के हिलोरें अधिक। उसे पता था कि लड़की का प्रेम वही होता है जो विवाह के लिए उसके परिजनों की पसंद होती है। उसे सिखाया जाने लगा था कि सिर्फ पति से ही प्रेम करना चाहिए, अन्य रिश्तों में तो प्रेम की सोच भी वर्जित है। पर…न जाने क्यूं प्रेमपत्रों के इस अचानक शुरू हुए  सिलसिले ने उसके नन्हें कोमल हृदय में प्रेम की ऐसी भावनाएं अंकुरित कर दी थी जो उसकी धडकनों का हिस्सा बन गई थी और वह अपने सपनों को आकार लेता देखने की कल्पना में खोने-सी लगी !

शाम को अंधेरा होने से पहले न जाने कितनी बार कृति ने अपनी संकरी गली की बालकनी से अभिनव की बालकनी को देखा पर उसकी खोजी निगाहें अभिनव को देख सकने में सफल नहीं हो सकी। उधर भाभी की आवाज़ पर वह किचेन में उनकी मदद करने को चली अवश्य गई पर उसका मन अभिनव को ही खोज रहा था।

कुछ ही देर में गली में बुलेट मोटरसाइकिल की जानी पहचानी आवाज़ ने उसे थोड़ा चैन दिया। बहाना बनाकर कृति बालकनी पहुंची। सही अनुमान था उसका। अभिनव मोटरसाइकिल थामे किसी से मोबाइल पर बात कर रहा था। कृति से नजर मिलते ही उसमें आंखों-आंखों में जो इशारा किया, उससे कृति की आंखें स्वतः ही झुक गई। अभिनव थोड़ा नजदीक आया और मुस्कुराते हुए उसने एक और ढेला बालकनी की ओर उछाल दिया।

कृति ने वह पत्थर के टुकड़े में लिपटा पुर्जा उठाया, उसे सहेजा और असंयत धड़कनों को संयत बनाने का प्रयास करती हुई सहज भाव से फिर भूतल पर किचेन की ओर चल पड़ी। दो पत्र वह पहले भी पढ़ चुकी थी अभिनव के, और उन पत्रों को पढ़कर भी कृति यह समझने में असफल रही थी कि प्रेम क्यों हो जाता है…। पर आज… उसे स्वयं कुछ बदलाव के संकेत दिख रहे थे और वह स्वयं इन संकेतों को अपने मन में महसूस कर रही थी। हालांकि अभी उसने अभिनव का दिया हुआ पत्र नहीं पढ़ा था पर उसे पढ़ने की उत्कंठा उस पर कुछ अधिक ही हावी हो रही थी, ऐसा उसने स्वयं अनुभव किया था ।

आखिरकार, वह समय आ ही गया जब उसको एकांत में अभिनव का पत्र पढ़ने का अवसर मिल गया । अपने कमरे में सोने से पहले जब उसने किताब के बीच रखकर धडकते दिल से उसे पढ़ा, तब उसे धीरे-धीरे यह भी समझ में आ रहा था कि लोग प्रेम क्यों करते हैं तथा यह भी कि क्या वाकई प्रेम के बिना भी बेहतर रहा जा सकता है! उस को उत्तर मिल गया था । वह प्रेम के समुंदर में स्वतः बहती-सी जा रही थी। लगता था उतना ही प्रेम वह अभिनव से भी करने लगी थी जितना वह उसे अपने पत्रों के माध्यम से उसे अभिव्यक्त करने लगा था। उसको भी उतनी ही आतुरता होने लगी थी पत्रों की…और फिर मिलन की घड़ियों की…जितनी अभिनव प्रदर्शित करता था.  कहें तो वह अभिनव के प्रेम को लेकर अपने प्रेमल जीवन के नूतन स्वप्न बुनने लगी थी।

न जाने कैसा रोमांच भर दिया था अभिनव ने कृति के मन में कि वह स्वयं ही उससे मिलने को उतावली रहने लगी | दोनों ने इसका रास्ता भी निकाल लिया | एक शनिवार को एक्स्ट्रा क्लास के बहाने से कृति जो स्कूल के लिए निकली तो शाम को चार बजे ही लौटी | कहाँ-कहाँ नहीं घूमे वो लोग! और जहाँ भी घूमे वह जगह कृति के मन में सपनों-सी कैद हो गई | दोनों ने खूब बातें की और सपनों की दुनिया में खोये रहे |

जिन्दगी के १५वें वसंत से शुरू होकर जो यह प्रेम कहानी आरम्भ हुई तो अब हर दिन उत्सव-सा लगने लगा था कृति को | वह बात अलग थी कि कुछ ही दिनों में सुगबुगाहट होने लगी थी उनकी प्रेम कहानियों की | दोनों के घर पर भी यह चर्चा और तनाव का कारण बन चुका था | दिन में न जाने कितनी बार कृति के पिता उसको भला-बुरा कहते | उन्होंने कृति के लिए आनन-फानन में रिश्ते देखने भी शुरू कर दिए थे और उस पर सख्त निगाह भी |

दोनों के प्रेम में जो समानता थी बस वह यह थी कि दोनों के पेरेंट्स इन संबंधों के प्रति अपनी-अपनी सख्त नाराजगी रखते थे और किसी भी दशा में इस रिश्ते को पसंद करने का उनका कोई इरादा नहीं था | आये दिन यह मुद्दा दोनों के घर उठता था और कुछ न कुछ तनाव बना रहता था | दोनों के परिवारों में आने-जाने के सम्बन्ध न जाने कब से टूट गये थे | राहत की बात यह थी कि कृति की मां प्रतिमा देवी अपनी बेटी की भावनाओं को समझती थी और उन्होंने कृति को अपने ढंग से ऊँच-नीच समझानी चाही… न जाने कितनी बार, पर बेटी के प्यार के सामने उन्होंने भी लगभग हार मान ली थी या यूँ कहिये उसके प्रेम सम्बन्ध को मूक स्वीकारोक्ति दे दी थी| पर, यह भी उतना ही सही था कि अंजनी प्रसाद– कृति के पिता के लिए यह संबंध पहले दिन से ही पूरी तरह अस्वीकार्य था |

दरअसल, इस प्रेम सम्बन्ध के आड़े जाति व्यवस्था की भूमिका तो थी ही, अंजनी प्रसाद की उच्च सामाजिक और आर्थिक स्थिति से उपजा अहं और अभिनव का सेटल न होना भी था ! चूँकि वह अभी किसी नौकरी या धंधे में नहीं था और दिन भर इधर-उधर दिखाई देता था, इसलिए वह उसे आवारा की श्रेणी में रखते थे  |  दूसरी ओर  अभिनव के पिता अमित प्रताप का जोर अपनी मूछों और बिरादरी के प्रति कूट-कूट कर भरा था. उनके सपने बिरादरी की पुत्रवधू से ही पूरे होने थे, भले ही बेटा निकम्मा ही क्यूं न हो !

कृति के स्कूल जाने पर रोक लग गई थी. “आखिर तू मर क्यूँ नहीं जाती मुंह काला करने से बेहतर!”, या, अगर कुछ ऊंच-नीच पता चली तो खबरदार तुम्हारी दोनों की ही लाशें बिछ जायेंगी”, “कुलटा”, “बदचलन” सरीखी गालियाँ आम हो चली थी उसके पिता के मुंह से सुनना ! और वह, बस निर्विकार…शांत खड़ी रहती | पर इस सब अपमान से उसके मन में अभिनव के प्रति प्रेम भाव में कोई कमी नहीं महसूस हुई उसे !

भविष्य की अनिश्चिन्ताओं के भंवर से बेफिक्र दोनों प्रेमी अब एक दूसरे के लिए जान देने को उतारू थे | अभिनव से अधिक शिद्दत कृति के प्रेम में थी यह भी स्पष्ट दिखता था, परन्तु उसका दूसरा पहलू यह भी था कि अभिनव वाकई में अभी गृहस्थ जिन्दगी के लिए बिना अपने घर के समर्थन के तैयार नहीं था | ऐसे में वह विद्रोह कर स्वावलंबी बनना तो दूर कृति को घर से अलग रखकर रहने का विचार भी मन में नहीं ला सकता था | यह बात उसने कृति को बता भी दी थी, पर कहते हैं न कि प्रेम अँधा होता है… उसे न रास्ते दिखते हैं, न कोई बाधाएं उसे हतोत्साहित कर पाती हैं, और तार्किकता का तो प्रेम में कोई स्थान होता ही नहीं है | तब प्रेम एक शब्द नहीं, बल्कि एक भावना, अहसास मात्र लगता  है। यह जब दिल में उपजता है, तो सुख-दुख, लाभ-हानि, मान-अपमान, अपना-पराया का भेद मिटा देता है। एक प्रेम ही ऐसा रास्ता लगता है जिससे दुश्मन भी अपने हो जाते हैं। बिना प्रेम का जीवन तो नीरस-सा लगता है। प्रेम है तो खुशी है और जब खुशी होती है तो चेहरे पर मुस्कराहट बनी रहती है। जब मन प्रेम से भरता है तो दिनभर के सभी कामों में प्रेम झलकने लगता है। फिर चलना-फिरना, खाना-पीना, देखना, बोलना सब प्रेममय हो जाता है। और यही सोच कृति को, और थोड़ी बहुत अभिनव को भी जीवन दर्शन लगती थी |

दूसरी ओर यह भी उतना ही उचित लगता कि आकर्षण से मिला प्रेम क्षणिक होता  हैं क्यूंकि वह अनभिज्ञता या सम्मोहन की देन होता है। इसमें आपका आकर्षण से शीघ्र ही मोह भंग हो जाता हैं और आप ऊब जाते हैं । यह प्रेम धीरे-धीरे कम होने लगता हैं और भय, अनिश्चिता, असुरक्षा और उदासी लाता है । इसके विपरीत जो प्रेम सुख-सुविधा से मिलता हैं वह घनिष्टता लाता है परन्तु उसमे कोई जोश, उत्साह , या आनंद नहीं होता है। उदाहरण के लिए आप एक नवीन मित्र की तुलना में अपने पुराने मित्र के साथ अधिक सुविधापूर्ण महसूस करते है क्यूंकि वह आपसे परिचित है। दिव्य प्रेम इस सब को पीछे छोड़ देता है । यह सदाबहार और सदा नूतन रहता है । आप जितना इसके निकट जाएँगे उतना ही इसमें अधिक आकर्षण और गहनता आती है । इसमें कभी भी उबासी नहीं आती हैं और यह हर किसी को उत्साहित रखता है। सांसारिक प्रेम सागर के जैसा है, परन्तु सागर की भी सतह होती है। दिव्य प्रेम आकाश के जैसा है जिसकी कोई सीमा नहीं है। सागर की सतह से आकाश के ओर की ऊँची उड़ान को भरे।

लेकिन यहाँ सब उलझा सा  था | यह प्रेम आकर्षण से जन्मा अवश्य था लेकिन कृति के लिए यह दिव्य प्रेम था | अभिनव की स्थिति त्रिशंकु थी | वह  आकर्षण में आया जरूर था कृति के, और वह जितना कृति को अपने प्रेम में बांधना चाहता था उतना स्वय भी प्रेम में रहना चाहता था लेकिन प्रेम समर्पण और जिम्मेदारी के बिना अधूरा है, इस् तथ्य से अनजान था।

——

(२)

आखिर आज वह हो ही गया था जिससे दोनों परिवार आशंकित थे !

कृति सवेरे सात बजे ही घर से गायब हो गई थी | उधर अभिनव देर रात से ही अपने घर नहीं लौटा था | पूरे दिन की खोजबीन के बाद पता चला कि दोनों शहर के उस छोर पर स्थित महर्षिपुरम कॉलोनी में अभिनव की बुआ के घर से सटे मकान में एक कमरा लेकर रह रहे हैं | अंजनी प्रसाद ने कृति को जाकर पहले न जाने क्या-क्या खरी-खोटी सुनाई, फिर ठन्डे दिमाग से उसे ऊंच-नीच का भी वास्ता दिया | पर कृति को टस-से-मस न होना था, सो नहीं हुई | हार कर अंजनी प्रसाद घर लौट आये |  उसकी माँ ने भी बहुतेरा समझाया कृति को, पर उसका जवाब था, “अब शादी तो मेरी हो ही चुकी ! तुम लोग मानो या न मानो, मुझे अधिक फर्क नहीं पड़ता | मैं अभिनव के साथ हर हाल में सुखी हूँ |” उधर अभिनव के पिता आकर चुनिंदा गालियाँ उसे दे आये थे | उससे भी जी नहीं भरा तो हर दो दिन बाद उसे अपनी इज्ज़त खराब करने की दुहाई देकर लौट आते थे | वह यह भी ऐलान कर आये थे कि अभिनव को अपनी सम्पत्ति में से एक फूटी कौड़ी भी नहीं देंगे !

हालांकि बात इतनी भी सरल नहीं थी जितनी दिखती थी | दोनों परिवारों के बीच तनाव की खाई और गहरी हो चली थी | दोनों पक्ष एक दूसरे को ही दोषी मान रहे थे | संबंध अब सामान्य से वैमनस्यता की ओर बढ़ चले थे, जबकि यह तथ्य भी पूर्णतः शाश्वत था कि इस प्रेम-प्रसंग में दोनों परिवारों की संलिप्तता शून्य थी, वह तो मात्र दो प्रेमियों की नैसर्गिक गाथा थी, जो कृति और अभिनव ने सहज रूप से रच दी थी | उन दोनों के सामने हर तरह से अनिश्चितता का भविष्य सामने खड़ा था, पर न जाने उन्होंने किन परिस्थितियों में यह निर्णय लिया गया, कोई समझ नहीं पा रहा था |

अब कौन समझाए कि प्रेम की बुनियाद कोई ईंट-पत्थर और सोने-चांदी की नींव पर नहीं होती है | दो प्रेमी शायद ही भविष्य की निर्ममता को लेकर सशंकित होते हों | वह तो बस जीने-मरने की कसमें खाते हैं, आने वाली कठिन  समस्याओं के मुकाबलों के लिए हसीं सपनों का महल बुनते हैं पर, धीरे-धीरे उन सपनों की जब मौत होती है तो अपने वह घर वाले ही खेवनहार नज़र आते हैं, जो अभी तक दुश्मन ही दिखते थे ! यही सब कृति और अभिनव के जीवन में होने लगा था | एक तो कोई काम-धाम नहीं, ग्रेजुएट भी नहीं था अभी अभिनव और कृति… वह तो इंटर पास करने वाली थी, अगर यह प्रेम कथा न लिखी गई होती |

एक हफ्ते में ही उन्हें आटे-दाल का भाव मालूम पड़ने लगा था ! सम्बंधों में प्रेम की जगह झुंझलाहट ने ले ली थी, कृति की जिंदगी उस एक कमरे में सिमट कर रह गई थी जबकि अभिनव दिन भर बाहर ही रहता, और जब देर रात लौटता तो नशे में होता। नोंक-झोंक… एक दूसरे को भला-बुरा कहना आम हो चला था। स्थिति बदतर इसलिए भी थी कि दोनों के पास भविष्य की कोई योजना नहीं थी | अभिनव से किसी आर्थिक सहारे की उम्मीद बेमानी थी, क्यूंकि वह इसके लिए पूरी तरह से न तो शिक्षित था और न ही कोई विशेष इच्छुक दीखता था | एक अतिरिक्त गुण और सामने आया था कि वह शराब का भी शौक़ीन था | रोज़ रात को बाहर से पीकर आना उसका नियम था | ऐसे में तो कुबेर का खजाना भी कम ही पड़ता |

उस दिन दोपहर के ३.३० बजे होंगे, जब कृति और अभिनव के घर खबर पहुंची | कृति ने अपनी मात्र १८ दिन की गृहस्थ जिन्दगी के निर्वहन के बाद स्वयं को आग लगा ली थी | लगभग १०० प्रतिशत जली अवस्था में उसे जिला चिकित्सालय में एडमिट कराया गया जहाँ गम्भीर अवस्था में मजिस्ट्रेट को दिए गये अपने बयान में उसने आग को ‘शराबी अभिनव’ द्वारा लगाया जाना आरोपित किया था । यह भी सही था कि अभिनव भी वहां से गायब था | जिन्दगी और मौत से चार घंटे संघर्ष के उपरान्त कृति ने दम तोड़ दिया, पर मालूम चला कि उसने मृत्यु पूर्व अपना बयान दर्ज़ कराया था |

मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गये बयान और परिस्थितियों के दृष्टिगत पुलिस ने प्रथम दृष्टि में अभिनव को दोषी पाया और गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया | दोनों परिवार टूट गये थे | प्रेम की ऐसी परिणिति की किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी | १८ वर्ष की कृति और २२ वर्ष का अभिनव– उन्होंने अभी इस दुनिया में देखा ही क्या था ! पर घटनाक्रम वाकई बहुत दुखद था | फिर से उसके पिता का प्रेम बेटे के लिए उमड़ आया था | आठ महीने तक जेल में रहकर, कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटकर, रुपया पानी की तरह बहाकर अंततः अभिनव की जमानत हो पाई | यूँ कहिये उनका मकान तक गिरवी रखा गया, तब जाकर अभिनव को बाहर की दुनिया में आने की अस्थायी इजाजत मिल पाई |

केस की सुनवाई तो अभी बाकी थी ! कृति के पिता का भी अब रह-रहकर अपनी मृत पुत्री के प्रति आवश्यकता से अधिक प्रेम उमड़ता था, और न जाने कितनी बार उनकी आँखें स्वतः ही नम हो जाती थीं | उन्होंने अभिनव को फांसी की सजा से कम न होने देने का भी ऐलान कर रखा था | उधर अमित प्रसाद– अभिनव के पिता का आधा समय वकीलों से राय-मशवरा और भागदौड़ में ही बीतता था | बेटे को बचाने की जिम्मेदारी तो पूरी थी ही न, शायद उतनी ही जितनी प्रेम को नकारने की रही होगी ?

फास्ट ट्रैक कोर्ट में केस चला, जिसमें अभिनव की पक्ष से वह सोलह प्रेम पत्र पस्तुत किये गये जो कृति ने अभिनव को लिखे थे | सबसे मजबूत सबूत के रूप में इन पत्रों की ही भूमिका बताई गई | उन पत्रों के अनुसार पहले पत्र से ही कृति ने स्पष्ट कर दिया था कि उसे अभिनव के अलावा अपनी जिन्दगी में किसी और का दखल मंजूर नहीं होगा | और यह भी, कि यदि कभी ऐसा होने की संभावना दिखी तो वह अपनी जिन्दगी खत्म करना बेहतर विकल्प समझेगी । अपने दूसरे पत्र में भी उसने लिखा था, “कि अगर उसके घर वालों ने कहीं उसकी शादी तय कर दी तो भी वह अपनी जान देना बेहतर समझेगी |”  कई  पत्रों में उसने शादी के बारे में अपने भाई और मां से बात करने का अनुरोध किया था | सब पत्रों में जो एक बात बार-बार लिखी गई थी, वह शादी न होने पर उसके द्वारा जान देने का इरादा !

कृति का दूसरा पत्र यूँ था, “यदि मेरे परिजनों ने मेरा विवाह कहीं और तय कर दिया तो मैं तो आत्महत्या कर लूंगी | यदि तुम्हारे घर वाले तुमसे कुछ कहते हैं तो तुमको सही बात बता देनी चाहिए | मौका मिलने पर मैं भी अपने ऐसे किसी वैवाहिक बंधन को तोड़ दूँगी | शादी करूंगी तो सिर्फ तुमसे ही, नहीं तो जान दे दूँगी !”

अगले पत्र में फिर वही आत्महत्या की बात ! और कुछ अलग भी, “तुम क्यूँ पूछते हो कि यदि मेरी शादी कहीं और कर दी गई तो मैं क्या करूंगी… तो जान लो, यह जिन्दगी ही नहीं रहेगी तब ! तुमने देखा था क्या इससे पहले मुझे इतना प्रसन्न, जब तक तुम मेरी जिन्दगी में नहीं थे !” फिर १० वें पत्र तक आते-आते उसके पत्रों में खिन्नता के साथ दृढ़ता भी दिखने लगी थी, और साथ में वही जान देने की बात !

“१५वें पत्र में कृति ने लिखा, “आखिर तुम भी वही  निकले ना ?…जैसे चालाक लडके..भोली लडकियों को अपने प्रेम के झूठे जाल में फंसा कर उन्हें इस्तेमाल करते हैं. तुम भी उन भेडियों से अलग कैसे ? सिर्फ तुम्हारी वजह से मैं अपने परिवार वालों की निगाह में गिरी, समाज की निगाह में गिरी, पर तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता दिखा | सोचो, कोई अगर तुम्हारी सगी बहन के साथ ऐसा करता तो भी क्या तुम ऐसा  ही रुख अपनाते ? सच, ऐसी जिन्दगी से तो मर जाना ही बेहतर है |”

और १६वाँ पत्र…अंतिम पत्र केवल कोर्ट मैरिज या मर जाने का विकल्प बताने के लिए लिखा था कृति ने ! यह वही पत्र था जिसके बाद कृति और अभिनव बगावत कर एक दूसरे के साथ रह रहे थे |

निर्णय में इन पत्रों और परिस्थितियों के विश्लेष्ण के बाद माननीय न्यायाधीश ने पत्रों की भूमिका को वाकई में महत्वपूर्ण माना | उन्होंने स्पष्ट किया कि कृति आरम्भ से ही अवसाद की शिकार थी और मेडिकल टर्मिनोलॉजी में वह “आत्महत्या की प्रवृत्ति” से ग्रसित थी । पहले पत्र से उसके व्यक्तित्व का यह पहलू उभर कर सामने आया था, जो अंततः उस पर हावी रहा । अपनी थ्योरी को सिद्ध करने के लिए उन्होंने विश्व के विद्वान मनोवैज्ञानिकों के निष्कर्षों के उद्धरण भी दिए । निर्णय में उन्होंने लिखा कि , “आत्महत्या इस समाज के अपेक्षाकृत उस कमजोर व्यक्ति के लिए अंतिम रास्ता दीखता है जो इस जंगल जैसे समाज में अपना रास्ता भटक चुका हो | ऐसे समय में उसे वर्तमान जीवन की अपेक्षा मृत्यु का वरण अधिक उचित तथा व्यावहारिक प्रतीत होने लगता है”।

उन्होंने यह भी निर्णीत किया कि जिस समय कृति ने आग लगाई, उस समय अभिनव न तो मौके पर मौजूद था, और न कोई परिस्थितियां उसके इस जघन्य अपराध में संलिप्त होने की ओर संकेत करती हैं । साथ ही, कृति के मृत्यु पूर्व बयान को भी कोर्ट ने विश्वसनीय नहीं माना क्यूंकि जब मजिस्ट्रेट ने वह  बयान लिया था, तब अस्पतान के बर्न वार्ड में वह  १०० प्रतिशत जली अवस्था में लाई गई थी, और उस स्थिति में उसके लिए बयान देना तो दूर कोई शब्द उच्चारित करना भी संभव नहीं था ! ऐसा जजमेंट में लिखा गया था ! कुल ग्यारह महीने की सुनवाई, १४ गवाहों के बयान और जिरह के बाद २४४-पृष्ठों के निर्णय में अभिनव को अंततः इस प्रकरण में दोषमुक्त पाया गया और बाइज्ज़त बरी करने के आदेश हुए !

निर्णय सुनते ही कृति के पिता को कोर्ट रूम में ही बेचैनी की शिकायत हुई । दरअसल, उन्हें हल्का दिल का दौरा पड़ा था ! प्रेम में आकंठ कृति की जान चली गई थी, कुछ सम्बन्ध भी असमय काल-कवलित हुए थे, सामाजिक और मित्रता की भावनाओं को चोट पहुंची थी, साथ में उन प्रेमल भावनाओं की भी मृत्यु हुई थी जिन्हें प्रेमी युगल जीते-जी संजो कर रखते हैं। बलिदान सिर्फ प्रेम ने दिया था दिया था इस मामले में, एक ऐसा प्रेम जिसके पास कोई तर्क नहीं था… अँधा था वह प्रेम जिसके लिए सिर्फ अपने स्वप्निल संसार की कल्पना सब कुछ थी…शायद कृति की सोच इस प्रेम के आगे की जिन्दगी देख सकने में समर्थ नहीं थी।

अफ़सोस, कृति के व्यक्तिगत सामान में अभिनव का कोई पत्र नहीं मिला जो उसके प्रेम संबंधों की भावनाओं की कोर्ट के फैसले की तरह सरल पर बेहतर व्याख्या कर सकता ! यह तो कभी पता ही नहीं चल सका कि अभिनव का प्रेम भी उतना ही गहन था या उसकी असमंजसता की तरह अनिश्चित ! कोर्ट ने तो क़ानून के अंधे होने की कहावत पर मुहर लगा दी थी । अंधे प्रेम ने एक नासमझ किशोरी की जान जाने को वैधानिक जामा पहना दिया था और अंधे कानून ने एक संशयी प्रेमी को जीवन दान दे दिया था…इस सच्चाई से अनभिज्ञ कि जीवन लीलने वाली केवल माचिस की तीली ही नही होती, नासमझ उम्र शारीरिक आकर्षण से पनपी प्रेम की चिंगारी भी होती है!

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