डॉ. श्रुति फौगाट की कविता ‘यादों के मौसम’

कभी वक़्त कतरा कतरा बह रहा होता है
तो याद आ जाते हैं कुछ पुराने पल,
मानो सालों से बंद डायरी के पन्ने
पलट गए हों,
और उस बंद पुरानी डायरी की खुशबू
कुछ कुछ नयी सी लगती है हर बार…
खामोश सी हो जाती हूँ मैं,
हर पलटते पन्ने के साथ
एक नया मौसम सामने आ खड़ा होता है…
भला कोई जी सकता है
एक ही पल में इतने सारे  मौसम,
भगा देती हूँ मैं हर मौसम को…
पर ये बारिश का मौसम इतना ढीठ है
भिगोये बिना जाने का नाम ही नहीं लेता
और फिर वक़्त भागने लगता है
उफनती हुई पहाड़ी नदी की तरह,
कर देती हूँ आखिरकार मैं
खुद को हवाले यादों की नदी में डूबने के लिए
कई बार उभरने का यही एक रास्ता होता है…

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