श्रुति फौगाट की कविता ‘लम्हे’

कभी यूँ हुआ था
कि सोचा था
वक़्त को गुज़रने ही ना दूं
और उसे पिरोने लगी
कच्चे धागों में
लम्हा लम्हा

पता ही ना चला
कब घर भर गया
और नये लम्हे बाहर दरवाजे पे खड़े रहे
आज देखा तो सोचा
कुछ पुराने लम्हों को आज़ाद कर दूं
नये लम्हों को भीतर बुला लूँ
हाथ बढ़ाया ही था कि
घर भर में हलचल मच गयी
याचना, निवेदन, चीख , पुकार

मैं कब जानती था कि
लम्हे चीखते हुए मरते हैं

नये लम्हों को भीतर बुलाया,
यहीं किन्हीं कोनों मे जगह दी
और लम्हों का पिरोना यूँ ही जारी रहा

सालों बीत गये…
माना मेरे घर में आज साँस लेने
जितनी जगह की भी कमी है,
पर यहाँ वक़्त महफूज है!!

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