श्रुति कुशवाहा की 5 कविताएं

श्रुति कुशवाहा

जन्म :       13/02/1978  भोपाल, मध्यप्रदेश

शिक्षा :       पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि. भोपाल)

प्रकाशन:           कविता संग्रह कशमकश” वर्ष 2016, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग, भोपाल के सहयोग से प्रकाशित

वागर्थ, कथादेश, कादंबिनी, उद्भावना, परिकथा, समरलोक एवं जनसत्ता, दैनिक भास्कर, पत्रिका, नई दुनिया सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं-कहानियां प्रकाशित

पुरस्कार:          कविता संग्रह कशमकश” को वर्ष- 2016 “वागीश्वरी पुरस्कार” मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा प्राप्त, वर्ष 2007 कादंबिनी युवा कहानी प्रतियोगिता में कहानी पुरस्कृत

संप्रति :      विभिन्न न्यूज चैनलों में कई सालों तक काम करने के बाद  अब गृहनगर भोपाल में स्वतंत्र पत्रकारिता एवं लेखन

संपर्क :          बी- 101, महानंदा ब्लॉक, विराशा हाइट्स, 

दानिश कुंज ब्रिज,

कोलार रोड, भोपाल

 म.प्र. 462042

 मोबाइल – 9893401727

ईमेल – shrutyindia@gmail.com

  1. सच बोलती है कविता

इस संसार में जब तक नदियां हैं
तब तक पाप है
नदियों में पाप धोए जाते रहेंगे अनवरत

इस धरती पर जब तक पर्वत हैं
तब तक विश्वास है
विश्वासघात अक्सर पर्वतों से भारी होते हैं

इस सृष्टि में जब तक प्रेम है
तब तक पीड़ा है
प्रेम अब आनंद की बजाय पीड़ा से अधिक मोहित है

इस लोक में जब तक आस्था है
तब तक ईश्वर है
आस्था के नाम पर ईश्वर अब मानव के विरुद्ध खड़ा है

ये नकार की कविता नहीं है
असल में ये
पवित्रता का अनुवाद है
आपकी भाषा की पवित्रता
कविता तक आते-आते
अब कुछ यूं अनुदित हो चुकी है

कविता ने अभी सच बोलना नहीं छोड़ा है….

  1. लिखने को तो…

लिखने को तो लिख सकती थी कड़ी धूप को छाँव
लहर को नाव
डगर को पाँव
सफर को ठाँव

लिखने को तो लिख सकती थी तिमिर घटा है
भेद मिटा है
दर्द बंटा है
नई छटा है

लिखने को तो लिख सकती थी फूल खिले हैं
दीप जले हैं
साथ चले हैं
सभी भले हैं

लिखने को तो लिख सकती थी आकाओं ने काम किया है
सबका एक मुक़ाम किया है
दुनियाभर में नाम किया है
हमने उन्हें सलाम किया है

लेकिन लिखने भर से क्या सब सच हो जाता….

  1. स्त्रीविहीन

स्त्री ने आसमान निहारा
समंदर तलाशा
पर्वत नापे 
गुफाएं खोजी
जंगल छाने
लेकिन उसके लिये
कहीं कोई जगह नहीं थी

स्त्री ने दफ्तर, बाज़ार
रेलवे स्टेशन, अस्पताल
नदी, पुल, दुकानें
गौशाला, तबेला
और सारी सड़कें भी देख ली
लेकिन कहीं भी
कोई जगह नहीं मिली

अपने घर से तो
सदा ही निर्वासित रही स्त्रियां
किसी भी देश ने 
स्त्रियों को कभी
स्थायी निवासी का प्रमाण पत्र नहीं दिया
सभी धर्मस्थलों के मूल में बद्ध था
स्त्री नर्क का द्वार है

थककर स्त्री
अपनी कोख में भी झांक आयी
लेकिन वहां भी वो अवांछित ही थी
आखिरकार एक दिन
ये धरती स्त्री विहीन हो गयी

अब सब कविताओं में तलाशते हैं स्त्री
स्त्री किताबों में चैन की नींद सो रही है….

  1. सलाहियत

अभी तो हमें सीखना था
सड़क पर थूका नहीं जाता
कचरा डिब्बे में ही डाला जाता है
ट्रेन से नहीं चुरायी जाती चादरें
दूसरों के कपड़ों में झांकने से
अपनी नंगई नहीं छिपती
और प्लेट में भर-भर खाना लेकर छोड़ना तो
गुनाह है इंसानियत के खिलाफ़
अभी तो सीखना था कि
सड़क किनारे पेशाब करना
सभ्यता पर पानी फेरना है दरअस्ल
और गालियों में माँ-बहन
किसी की भी हो
वो गाली लगती ख़ुद ही को है
अभी तो बहुत कुछ सीखना बाक़ी था
लड़कियां छेड़ना बहादुरी नहीं
औरत को पीटना मर्दानगी नहीं
गुटखा खाना सेहत के लिए नुकसानदेह है
खाने से पहले धोना चाहिये हाथ
सीखने को तो ये भी था कि
घर का कचरा सड़क पर डालने से
घर साफ नहीं होता
या रात में ज़ोर से नहीं बजाना चाहिये रेडियो

देखो ना कितना कुछ सीखना रह गया बाक़ी
यहाँ तुम
इश्क़ के आदाब और
सियासी सलाहियत की बात करते हो….

  1. लिख रही हूं मैं

नफरतों के उदास मौसम में
दर्द की बात लिख रही हूँ मैं
क्या है हालात लिख रही हूँ मैं…

फूल करते हैं बात मज़हब की
तितलियां भी नहीं रही ढब की
पेड़ पे उग रहे हैं अब शोले
जान मुश्किल में आ गयी सबकी
ऐसे दम घोंटते अंधेरों में
है घनी रात, लिख रही हूँ मैं
क्या है हालात…

अब न बस्ती में कोई ज़िंदा है
हर कोई परकटा परिंदा है
सबके मुँह पे जड़े हुए ताले
सबके हाथों में एक फंदा है
ज़िंदगी अब रहम पे पलती है
मौत तैनात, लिख रही हूँ मैं
क्या है हालात….

अब हुकूमत के हाथ में सब है
कौन कितना है क्या है और कब है
अब वो करते हैं फ़ैसले सारे
रात औ’ दिन अजब ही करतब है
उनका जलवा है उनकी रहमत है
उनकी ख़ैरात, लिख रही हूँ मैं
क्या है हालात लिख रही हूँ मैं…

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