शुक्ला चौधरी की पांच कविताएं

युद्ध और जीवन

बहुत पेचीदा मामला है
ये युद्ध
हुआ युद्ध तो भी
मैं सोचूंगी अपने बारे में ही कि
किस तरह तुम तक पहुंचू
और तुमसे कहूं कि लो
मुझे छू कर बैठो
शायद-
पृथ्वी बच जाए.

दुनिया

इस फूल पर से
गुज़रकर कोई युद्ध
नहीं होगा/यहीं फूल को
खिलना चाहिए–
हाँ और ना के बीच.
बूंदों की बावरी
बनी नहीं इस बार भी
एक खत है मेरे हाथ में नदी की
दुनिया के सारे दरवाजे बन्द
हो जाते हैं जब बच्चे —-
युद्ध के बारे में सवाल पूछते हैं-

ये समय युद्ध का नहीं

खिलने का समय है
युद्ध करने का तो नहीं

ये हंसने का समय है
रोने का तो नहीं

सीमा पार की चिट्ठियाँ
यों मसलने का तो नहीं

कई गम सर आंखों लिए है
चीख कर कहने का तो नहीं .

सीज़फायर

कांसे की टनक में
जब गोलों की भनक नहीं होती
जब गोलियों की गनक रुक
जाती है /बच्चे जान लेते हैं
सीज़फायर का मतलब-
उड़ जाती है उनकी
भूख प्यास/उन्हें रास नहीं
आता बन्धन, वे मुक्त हो जाते हैं-
चिड़ियों की तरह –तब इस विशाल-
कांसे की थाल में खिलखिलाने की
खनक बज उठती है —

ज़िन्दगी

जिन्दगी हमारी है
हमें अपने तरीके से
मरने दो-

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