शुक्ला चौधरी की 5 कविताएं

शुक्ला चौधरी

युद्ध

न मिसाइलें दाग
न अस्त्र दिखा
तू देखता जा युद्ध
आरंभ हो चुका है
एक बूंद पानी के लिए

एक और युद्ध की तैयारी

रात सरपट दौड़ रही है
पानी के लिए बरतन खाली
कर रही है औरतें/रात दो बजे
सार्वजनिक नल से पतली सी धार
पानी की/दिनभर कई युद्ध फतेह
करने के बाद फिर एक और युद्ध
की तैयारी करती औरतें

चंचला नदी

नदी आज भी चंचला
पहले पानी उड़ाती थी
अब धूल उड़ाती है

तुम लौट आओ

जैसे बचपन में माँ से रूठकर
बच्चा घर से निकल जाता /फिर
कुछ देर बाद उल्टे पांव घर
लौट आता /वैसे ही तुम लौट आओ
ओ जल,नदी तुम्हारा घर है/वह व्याकुल है
तुम्हारे बिना /तुम लौट आओ
मरूस्थल हो चुकी नदी /राह तक रही है
तुम्हारी, तुम लौट आओ

शीशे की सुराही

कभी देखा है उन्नीस साल की
लड़की को पानी पीते हुए/मैं देखती हूं रोज
जब ईंट ढोते-ढोते वह थक जाती है/तब
दौड़ कर आती है मेरे पास/एक बोतल पानी
गटागट पी जाती है/मैं खड़ी रहती हूं अपलक
यह देखते हुए कि बिना एक बूंद छलके
शीशे की सुराही से पानी कैसे
अन्दर जा रहा है और–
वह तृप्त हो रही है

 

1 Response

  1. Sushma sinha says:

    बढ़िया !!

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