श्वेता शेखर की पांच कविताएं

खिलखिलाते हैं मुखौटे

समय के हिसाब से
हमेशा चलता है हमारे साथ
एक मुखौटा
हम ठीक ठीक
नहीं पहचानते
समय की नब्ज को
पर मुखौटा बड़ी तेजी और नजाकत के
पहचान लेता है समय को
अंदर जाने कितने ही हो रंग
पर बाहर दिखता है सभी मुखौटा
सभ्य, शालीन और सुरुचिपूर्ण

रात के अंधेरे में
जब एक एक कर उतरता है मुखौटा
दिखता है आत्मा की पोर पोर से टपकता लहू
प्रश्न चिन्हों की भरमार
उत्तरों का कुछ अतापता नहीं
और इस अकेलेपन में
इधर उधर बिखरे सारे के सारे मुखौटे
खिलखिला उठते है एक साथ ।

तस्वीरें

तस्वीरें दीवारों पर टंगी रहती है चुपचाप
स्थिर, मौन  जैसे गहन विचारों में डूबी हो
सुबह शाम , कल और आज
सभी से बेखबर
निर्लिप्त , निष्प्रभ, घटना विहीन जीवन
समय की धूमिल परतों के भीतर भी
खुद को अक्षुण्ण रखती है
कभी कभी अचानक ही
याद आ जाती है इन तस्वीरों की
और वे फिर से चमका दी जाती है
लगती हैं बिल्कुल तरोताजा एक नयापन
पर उसके पीछे कहीं छिपा होता है
बीते बदरंग और बेबस समय
घर की चारदिवारी और
इंतजार का सन्नाटा
फिर भी वे पुछ तो जाती है
कई बार तो जिंदा ही तस्वीर बन जाती
और पता ही नहीं चलता कि
वह जिंदा तस्वीर है या
तस्वीर जिंदा है ।

नदियां ही क्यों ?

नदियां हीं क्यों  हमेशा शापित होती हैं
पहाड़ों  से उन्हें ही क्यों गिरना पड़ता है
क्यों उन्हें ही टेढ़ी-मेढ़ी
पथरीली राहों को पार कर
समुद्र से मिलना होता है
नदियां हीं क्यों कभी छिछ्ली कभी सूखी
और कभी भरी भरी सी हो जाती है
सारे कूड़े कचरे और सड़ांध को समेट
दर्द भरी हंसी नदियां ही क्यों हंसती हैं
जबकि समुद्र का गर्जन करता है अट्टहास
और जाने क्यों लगता है कई बार
नदियां सिर्फ़ नदियां नहीं होती
पर समुद्र रहता है हमेशा समुद्र ही ।

नदी और पुल

सभ्यताएं आईं और चली गईं
पर है अनसुलझा
आज भी देह और मन का प्रश्न
संबंधों और संभावनाओं के बीच
पानी और पुल की तरह
बसती है अलग अलग दुनिया
पुल के दोनों ही तरफ होता है
दोनों का अपना अपना सच
जिये जाते हैं जो
दिन और रात की तरह
सदियों से चला आ रहा  अंर्तद्वन्द
दिन और रात के बीच
फिर भी है तो सच दोनों ही
पर जहाँ दिन है वहाँ रात नहीं
और रात के बिना
दिन का तो कोई अस्तित्व ही नहीं
तो क्या
दोनों को स्वीकार कर के ही
पूर्ण होगी हमारी दुनिया ।

हिसाब

हिसाब में दो बड़ा जादुई अंक है
दो में दो का जोड़ चार
दो में दो का गुणा भी चार
हम हिसाब में शुरू से जरा कच्चे रहे हैं
और वे हिसाब में शुरू से ही पक्के रहे हैं
हम चलते रहे
दो से चार,चार से छः, छः से आठ
वे चलते रहे
दो से चार, चार से आठ, आठ से सोलह
और देखो तो जरा
आज हम कहाँ हैं और वो कहाँ हैं
दोष तो बस हिसाब का है
हम जोड़ते रहे, वे भागते रहे ।

—————————————————-
नाम – श्वेता शेखर
शिक्षा – अभियांत्रिकी
सम्प्रति   – रेलवे में कार्यरत
पूर्व मध्य रेलवे ‎
हाजीपुर
संपर्क : २ एच/१०८,  बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी
भूतनाथ रोड,कंकङबाग,पटना-२६
email ID:shweta1429@gmail.com

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *