घर : एक आत्मकथा

सिनीवाली

मैं बोल नहीं सकता। पर मैं संवेदनहीन नहीं हूं। जिसमें तुम सब और तुम्हारी विगत पीढि़यों ने जिंदगी गुजारी है, हां मैं ही तो हूं….. तुम्हारा घर । तुम्हारे बाप दादा ने मुझे खून पसीने की कमाई से एक एक रूपया जोड़कर बनाया। जिस दिन मेरी नींव पड़ी थी, उसी दिन मुझमें आत्मा का संचार हुआ। एक एक ईंट जुड़कर मैं बनने लगा। जितना मैं खुश था, उससे अधिक उत्साह में परिवार के लोग थे। सभी की निगरानी में मैं बनने लगा। मुझे नजर नहीं लगे, इसके लिए एक नजरा भी लगा दिया गया।

जिस दिन मैं बन कर तैयार हुआ, विधि विधान और उत्सव के साथ गृह प्रवेश हुआ। सभी सगे संबंधी परिचित आए थे। उन सब के बीच मेरा नामकरण हुआ – घर। इस घर में कई पीढि़यों का जन्म हुआ। सब मेरे ही आंगन में पले बढ़े। मेरा बरामदा, आंगन, छत तुम बच्चों की हँसी में झूमने लगा। जब तुम ठोकर खाकर गिरते थे आंगन में तो चोट मुझे भी लगती, दर्द होता। पर वह दर्द तुम्हारे चोट का होता था, अपना ख्याल भी कहां आता था? तुम्हारे मां बाप की तरह मैंने भी तुम लोगों के नाज नखरे उठाए हैं। याद है, आंगन में वो जो अमरूद का पेड़ था, उसमें तुम सब बच्चे कपड़े का झूला लगाकर झूलते रहते थे, तो मुझे लगता कि मेरे आंगन सावन और बसंत एक साथ झूल रहे हैं।

जब घर में बेटियों का जन्म होता तो लगता कि वो घर आंगन की सुंदरता होती हैं। मैं और सुंदर हो जाता। और जब बेटों का जन्म होता तो मुझे नयी शक्ति मिल जाती। जब बेटी की शादी तय होती तो मैं शादी के गीत गाने लगता। विवाह में मेरी भी रंगाई पुताई की जाती, मुझे भी सजाया जाता। मुझे भी लगता कि मैं जितना सुंदर होउंगा, घरवालों के सम्मान में उतनी वृद्धि होगी। जब बारात आती तो खुशी से मैं भी नाचने लगता। मेरी ही गोद में खेली बेटी, माँ-बाप और परिवार को छोड़  विदा होती तो मेरा आंगन सूना हो जाता, मैं रोता, खूब रोता। तुम्हारी मां इस बात को समझती तभी देहरी पर बैठकर मेरे साथ वह भी रोती।

जब कोई अच्छी खबर मिलती तब दरवाजे पर अपनों के बीच ठहाकों मैं भी झूमता। जब कोई नाम कमाता तो सबके साथ मेरी भी छाती चौड़ी हो जाती। और जब कभी तुममें से कोई ऐसा काम कर जाता जो तुम किसी से नहीं कह पाते तो मैं समझ जाता तब मैं अपना कोई कोना अंधेरा कर देता और तुम उस कोने में अपना मन हल्का कर लेते।

कोई नवब्याहता बहू जब घर आंगन में चलती तो मैं उसकी पायल की रूनझुन और कंगन की खनखन में गुनगुनाता। इस घर की बेटियों की तरह मैंने उन्हें भी अपनाया। जैसे जैसे परिवार बढ़ता, मैं समृद्ध होता गया।

पर बरतनों के टकराने की आवाज से मैं डर जाता। मुझे अपना और पूरे परिवार का अस्तित्व खतरे में नजर आता। कुछ बहुएं तो यहां आकर ऐसे रच बस जातीं, लगता कि वे हमेशा से यहीं की हों। पर जब कुछ बहुएं हमसे अलग होकर      “मैं” बनना चाहतीं तो मुझे लगता कि पूरा परिवार उसे समझा पाएगा। वो समझ जाएगी कि यह हमारा घर है। हम सभी साथ साथ रहेंगे। पर नहीं, धीरे धीरे माहौल विषाक्त होने लगा। मैं घुटने लगा। घर के सभी बड़े समझ रहे थे पर वे विवश थे। वे एक दूसरे को अलग होने से रोक नहीं पाए।

तुम सब ने मेरे हाथ पैर हृदय, गला को काट काट कर अपना अपना हिस्सा अलग कर लिया। जहां मैं ठहाका लगाता था, उस पर तुमने दीवार खड़ी कर दी। जिस दिन दीवार खड़ी होने वाली थी, उस दिन अंतिम बार सूरज की किरणें और चांदनी मुझसे मिलने आयी थी। हम सब खूब रोए थे कि अब हम कभी नहीं मिल पाएंगे। हरे भरे पेड़ पौधे जो मेरा श्रृंगार थे, उसे उखाड़ फेंका। अब तो सुंदरता के स्थान पर भयावहता बसने लगी।

घर की औरतें बच्चों की सुख समृद्धि के लिए व्रत उपवास करतीं, उनके साथ मैं भी भूखा रहता ताकि उनके आशीर्वाद के साथ मेरी भी मंगलकामना से तुम सब खूब तरक्की करो। आज तुम इतने समृद्ध हो गए कि मुझे ही श्रीहीन कर दिया। तुमने मुझे यहां तोड़ा, वहां तोड़ा, मैं बेबस लाचार, अपने आंसुओ को आंखों में ही थाम लिया क्योंकि मेरे आंसुओं में तुम्हारे बुजुर्गों के भी आंसू मिल जाते। तुम्ही बताओ, जिसे पाला हो, उसके आंसू कैसे देखे जाएंगे। सुबह जब मेरे टुकड़े टुकड़े होने वाले थे, उस रात वो बूढ़ी आंखें और कांपते हाथ जिनके बस में अब कुछ भी नहीं था, उठ उठकर कांपते पैरों से मेरे घर आंगन में यहां वहां बेचैन से घूमते। मुझे चूमते और कहते – आज मेरी ही तरह तुम भी बंट गए। तुम लोगों में बंटवारे का जश्न था, चेहरे पर विजयी भाव था। पर मेरे लिए वह दिन मृत्युतुल्य था।

 जब तुम कमाने घर से बाहर जा रहे होते थे, तुम्हारी मां रात भर नहीं सोती थी। वो चाहती कि सवेरा नहीं हो, तुम उससे दूर नहीं जा पाओ। अपने आंचल में वो सूरज को छुपा लेना चाहती। चाहता तो मैं भी यही था पर तुम्हारे स्वर्णिम भविष्य के लिए तुम्हारा जाना जरूरी था। मेरी देहरी लांघ, सबका आशीर्वाद लिए जब तुम जाते मैं चुपचाप कहता, सकुशल फिर घर आ जाना। मैं और तुम्हारे घर वाले तुम्हारा इंतजार करेंगे। तुम्हारी मां छत पर जाकर तुम्हें दूर तक जाते हुए देखती रहती।

तुम हम सब के साथ अपना रोना हंसना जीना मरना कैसे भूल गए। क्या समृद्धि इतनी संवेदनशून्य होती है? शायद इस बदलाव को समय का परिवर्तन कहोगे। मान लेता अगर इस परिवर्तन की जरूरत होती तो मैं स्वयं चाहता, घर वाले खुद सोचते क्योंकि जरूरत से अधिक भार न मैं उठा पाता और न परिवार…. पर ये समय की मांग नहीं…. बहाना था…. जो भी हो, अब तो मेरा पूरा शरीर ही बंट गया। इसलिए आशीर्वाद के लिए हाथ तो नहीं उठ पाएंगे…… फिर भी जहां रहो, खुश रहो। जिसे दुआएं दी हैं, उसे बददुआ तो नहीं दे सकता>

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