स्मिता मृणाल की दो कविताएं

स्मिता मृणाल

रेस्ट इन पीस प्रत्यूषा

कितना आसान होता है
झूठ के आवरण में सच को छुपा देना
जाने कितने ही रहस्य कैद होते हैं
इस सच और झूठ के बीच
और इन रहस्यों की खोज में हम पाते हैं खुद को
तर्क और वितर्क के दो अंतिम छोरों पर
जकड़े से ,उलझे से
हम पाते हैं एक गहरी अँधेरी गर्त सी खाई
जिसमें अन्दर तक हम धंसते चले जाते हैं
और वो एक काली यथार्थ की परछाई
निगलती चली जाती है हमारे अस्तित्व को
हम सब धराशायी होते चले जाते हैं

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अपने अपने संदर्भों में
जब परत दर परत टूटता है खोल रहस्य का
क्योंकि तब सब कुछ उतना सहज नहीं रह जाता
जितना की नज़र आता है
बहुत आसान है हत्या को आत्महत्या
और निडर को कायर करार देना
खारिज करना किसी की मौत को उसकी शुरुआत से
और शुरू करना उसके जीवन को अंत के बाद
हम कुछ और कर भी नहीं सकते
क्योंकि हम तुमसे ज्यादा समझदार और परिपक्व हैं
सम्भव है ज़िंदगी ने तुम्हें पहले भी झकझोरा होगा
ज़िंदगी अब भी हर रोज़ तुम्हें खंगालेगी
तुम बस अपना ख़याल रखना प्रिय
जस्ट रेस्ट इन पीस प्रत्यूषा…..

एक पुल ही तो था मैं

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तो तुम्हीं कहो
आज क्यों ज़िंदगी इस कदर मौन पड़ी है
आज क्यों इस शहर की रफ़्तार थमी है
आज क्यों एक अभियुक्त सा मैं
आज क्यों अभियोगी सारा संसार
एक पुल ही तो था मैं

तो तुम्हीं कहो
क्यों हूँ मैं इस प्रलाप विलाप में
क्यों हूँ बेवजह निशब्द संताप में
आज क्यों मैं राजनीति की हलक में अटका
आज क्यों मैं प्रश्नचिह्नों में भटका
आज क्यों है संशय इस कदर प्रतिमान
एक पुल ही तो था मैं

तो तुम्हीं कहो
जब हाशिये पर था अस्तित्व वह मेरा
अधर में था मेरा वर्तमान
कहाँ थी वो प्रमाणिकता तुम्हारी
कहाँ थी वो संदेहार्थक पहचान
छोड़ो छोड़ो इन बातों को
छोड़ो इन मोहरों की चालों को
देखो तुम्हीं नहीं थमे हो
वक्त तो मेरा भी थमा है
चलो सुनें अब वह एक शोर
की किसी शहर में पुल ढहा है ॥
 

परिचय

स्मिता मृणाल ,भारतीय जनसंचार संस्थान,जे एन यू से पत्रकारिता ,अर्थशास्त्र में एम ए ,कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से बी एड । हिंदुस्तान और नवभारत टाइम्स जैसे स्तरीय मीडिया हॉउस के साथ 15 से अधिक वर्षों का कार्याणुभव ।असोसीयेट लेक्चरर के तौर पर यूनिवर्सिटी में कार्याणुभव । फिलहाल रचनात्मक आलेख और कविता लेखन में सक्रिय ।

3 comments

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