स्मिता मृणाल की तीन कविताएं

स्मिता मृणाल

रिफ्यूजी बचपन

एक कोलाहल सा गुजरता है
हर पल
उन बदबूदार सीलन से भरे
टेंटों में
विस्मृत सी धुंध से उठता
एक शोर
तोड़ता चुप से सन्नाटे को
बेतहाशा
बदहवास
भागती हुई सी एक भीड़
और पीछे
आग की कुछ तेज़ लपटें
जलते हुए कुछ घर
छूटती हुई सरहदें
गुम होते सारे रिश्ते
रक्तिम लाल सड़कों पर
भागते
कितने ही मासूम कदम
पसीने में लथपथ
खून में लिपटे
दुनिया की साजिशों
के विरुद्ध
खौफ के घेरे को तोड़ते
गिरते सम्भलते
तमाम जद्दोजहद के पीछे
सिर्फ़ इतनी सी कोशिश की
दुनिया के किसी कोने में मिले
क़तरे सी जगह
सुकून की
जहाँ साँस लें सकें
उनके सपने
जिंदा रह सके उनका
रिफ़्यूजी बचपन ॥

सूखी सी नदी

कभी झांका है तुमने
उन उदास मलिन बूढ़ी सी
आँखों में
सूखी सी एक नदी है उनमें
बालू के नीचे दबी
कभी घूम आओ वहाँ भी
तपती धूप मिलेगी
कुछ सख्त से पत्थर भी
सुनहरे कण आँखों को
चौंधियायेँगे
चलना मुश्किल लगेगा
पर धैर्य रखना
कुरेदना वहीं कहीं किसी
पत्थर के नीचे दबे बालू को
मीठी सी एक धार फूटेगी
ठंडी शीतल निर्मल
कहीं गहरे तक
भींग जाओगे तुम
फ़िर वही पनीली रेखा
बहा ले जायेगी तुम्हें
संवेदनाओं की बाढ़ में
कभी डुबोयेगी अंतस तक
तो कभी पटकेगी
यथार्थ के धरातल पर
अंततः
एक तृप्त नदी बनकर
निकलोगे तुम
उन आँखो से बाहर
उनकी अतृप्त सी दुनिया में…..

चीखो ,बस चीखो

चीखो
कि हर कोई चीख रहा है ,
चीखो
कि मौन मर रहा है ,
चीखो
कि अब कोई और विकल्प नहीं ,
चीखो
कि अब चीख ही मुखरित है यहाँ ,
चीखो
कि सब बहरे हैं ,
चीखो
कि चीखना ही सही है ,
चीखो ,बस चीखो ,
लेकिन कुछ ऐसे
कि तुम्हारी चीख ही
हो अंतिम ,
इतने शोर में.

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