स्मिता सिन्हा की तीन कविताएं

1.
आलसी सी पड़ी उबासियों में
जब जीवन ऊंघता है
बंद आँखों में वह गढ़ती है
कुछ रेखाचित्र
जैसे लाल फूलों वाला एक पेड़
अमलतास
दूर तक बिछी कोमल हरी दूब
दूध से चमकते बादल
जो पहुँचते हों सीधे चाँद तक
गीली गीली सी
बारिश की कुछ बूँदें
और ऐसा ही बहुत कुछ
आड़ी तिरछी रेखाओं में
भरते हैं कई रंग एक साथ
कुछ सुर्ख चटख
कुछ बेहद फ़ीके
ओह ! मुश्किल है
बहुत मुश्किल
अपने सपनों को रंगना
इससे कहीं आसान है
दर्द में भरना इंद्रधनुषी रंग
गुनगुनाना आँसुओं को सलीके से
निर्झर बहती धारा की
हर एक बूँद में उतरना
कहीं गहरे तक
वैसे ही
जब मुश्किल हो चीखना
फूट-फूट कर रोना
जब हलक में अटकने लगे शब्द
कितना आसान होता है
एक अच्छी सी कविता लिखना ॥

2.
अब इसका निर्णय
कौन लेगा
कि तुम सही हो
या गलत
इस विभ्रम की स्थिति में
जब तुम ही प्रेक्षक हो
इस कालचक्र के
जहाँ वक़्त जकड़ा हुआ है
तुम्हारे ही तर्कों में
उस एक वक़्त में जब
तुम्हारा ही एक तर्क
तुम्हें सही साबित करता है
और दूसरा गलत
जब तुम स्तब्ध होते हो
होते हो आशंकित
विवर्तों में घिरे
और
इस निर्लिप्त
संवादहीनता की स्थिति में
जब तर्कों की लड़ाई जारी है
एक संयमित स्पष्ट मौन ही
तुमसे अपेक्षित है
क्योंकि इसके आगे भी
हर परिणाम में तुम ही होगे
जीत में भी तुम
हार में भी तुम……….

3.
चलो अब लौटते हैं हम
अपने अपने सन्दर्भों में
तथाकथित दायरे से बाहर
ना तुम “तुम “रह सकते हो
ना मैं  “मैं ”
कि तंग संकरी गलियों सा
प्यार हमारा
घोंटता है हमारा वजूद
ढीला करो ये आलिंगन
कि निकल सकूं मैं
मुक्त हो सकूं
तुम्हारे नेह से

उलाहना मत देना
कि जितना भी पाया मुझे
तुमने भरपूर पाया है
सुनो वो अनुगूंज
मुझे पुकार रही है शायद
कि अब लौटना होगा मुझे
मेरा प्रेम और आगे बढ़ने की
इजाज़त नहीं देता ॥

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