स्मिता सिन्हा की कविता ‘मैं गिर रही हूं’

कविता कहती है अक्सर
सुनो तुम मुझको सुनो
बताओ मैं कहाँ हूँ
उन कुछ बुने चुने से शब्दों में
या कि
उन खूबसूरत ख्यालों हसरतों में
उन आकाशगंगाओ में
या कि
कुछ कोमल उपमाओं में
बताओ मैं कहाँ हूँ
कहाँ है वह चुभती सी जमीं
वह जलता सा आसमां
क्यों हो रही हूँ जड़ सी मैं
कुछ अंतर्निहित सन्दर्भों में
क्यों सिमट रही मेरी व्यापकता
क्यों हो रहा मेरा भटकाव
अपने परिप्रेक्ष्य से कहीं दूर मैं
खो रही मेरी परिभाषा
एक निरुद्देश्य निरर्थक सी मैं
हूँ एक बेवजह की कविता
अफ़सोस
कि लड़ती हूँ अक्सर
अपनों से
मुद्दतों से
ओ !!
धूर्त मक्कार बुद्धिजीवियों
सम्भालो खुद को
कि मैं गिर रही हूँ ॥

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