श्रीराजेश की दो कविताएं

श्रीराजेश

देखो कामरेड

देखो कामरेड , देखो

सर्दी की ठिठुरन की मार के निशान

उसके रक्ताभ चेहरे पर

किस कदर दिख रही है

 

अब वह बड़े मालिक को

बेड टी देने लायक नहीं रहा

उसकी धमनियों में बहता खून

लंबे-चौड़े भाषण सुनते-सुनते

फ्रिज हो गया हैं

 

अब हाथों में इतनी

ताकत भी नहीं महसूस होती

कि उठाए हंसिया

फिर भी बूझे मशाल के बीच

जलती चिंगारी की तरह

उसकी बूढ़ी आंखों के सामने

एक टुकड़ा धूप के समान

उसका एक अदद बेटा

हांक लगाता है

शहर के बीच चौराहे पर

दो दिन का काम एक दिन में करेगा

औरों की अपेक्षा दिहाड़ी

आधा ही लेगा

 

लेकिन उसकी आवाज

व्याप्त अराजक व्यवस्था के

कर्णभेदी उद्घोष के नीचे

दब सी जाती है

 

सोचता है

कल अपने साथ

दूसरे बेटे को भी लाएगा

और दोनों मिल कर लगाएंगे हांक

कर्णभेदी उदघोष से भी ऊंची होगी

उनकी हांक

 

रात के अंधियारे में जला कर रखेंगे मशाल

और साथ ही खुरपी, हंसिया और हथौड़ा

क्या पता कब मिल जाए काम

और क्या पता कब दे दें जवाब अपने हाथ

तब शायद काम आएंगे ये औजार

 

देखो कामरेड, आज से

रामेश्वर और सिंहासन काका नहीं आएंगे

चौराहे पर हांक लगाने

उनके हाथों ने तलाश लिया है काम

पुराने लोगों की छंटनी कर

उन्हें रखा गया है काम पर

पीछे भी कई इंतजार कर रहे हैं

कि कब होगी फिर छंटनी

रामेश्वर व सिंहासन काका की

कि फिर मिलेंगे

किन्हीं दूसरे हाथों को काम

 

देखो कामरेड

मैंने भी पी है आधी कप चाय

और आधा टुकड़ा सिगरेट

कि फिर आधी कप चाय और आधा टुकड़ा सिगरेट से

शाम का भी काम चला लूंगा

 

कामरेड देखो, देखो कामरेड, देखो

वह कुछ कह रहा है

लेकिन मशीनों की गड़गड़ाहट के नीचे

उसकी आवाज दब-सी जा रही है,

 

उसके होठों में गति है

शायद वह कह रहा है

कि मुझे सांस भर हवा चाहिए

और भूख भर रोटी

 

देखो कामरेड

वह ठेकेदार से बतिया रहा है कि

चौथाई दिहाड़ी पर वह बारह घंटा

मेहनत व शिद्दत के साथ करेगा काम

इससे ऊपर की कमाई ठेकेदार के नाम कर देगा

 

लालकिला एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे की

धक्कम पेल भीड़ के बीच

खड़ा, वह इत्मीनान से चना

और चिउड़ा का भूंजा फांक रहा है

और सोचता है कि दिल्ली के

कस्बेनुमा मोहल्ले में

कैसे मिलेगा एस्बेस्टस सीट

की छत वाला सस्ता मकान

बगैर किसी पहचान के

 

तभी याद आती है अपने नवरोत्तम भाई की

जिसकी भट्ठी में हंसिया का लोहा पकता है

और बंदूक की नाल भी

 

देखो कामरेड, देखो

देखो बदलते परिवेश को निरंतर।

 

जगो मेरे विश्वास

जगो मेरे विश्वास, जगो

आज तुम्हें हूंकार देता हूं

उठो, मेरे विश्वास, उठो

तुम्हें देने हैं बहुत सारे काम अंजाम

मुट्ठी भर भात के लिए

जुगाड़ बैठाता कलुआ

आज अविश्वास की नजर से

देख रहा हैं तुम्हें

 

वो मेरे विश्वास

जगो न, उठो न

देखो

भूख की मार के निशान

कलुआ के पूरे शरीर पर दिख रही है

कपड़े की तंग हाली में

उग आए हैं, उसके शरीर पर

बबूल के कांट

 

अधपके धानों का बोझा लिए सिर पर

खांसती कलुआ की बूढ़ी मां

आज नहीं मरेगी

दिलाओ उसे विश्वास

 

विश्वास, ये विश्वास

तुम उठते क्यों नहीं

नींद कब से इतनी गहरी लगने लगी तुम्हें

देखो, इंतजार कर रही है

कलुआ की पत्नी

कूटे हुए धान के चावल की

बनान के लिए भात

लिए तुम्हारा विश्वास

 

उसे क्या पता था कि

आज के बाद मय्यसर नहीं होगी भात

और न ही तुम्हारा साथ

 

विश्वास

आज तुम्हारी क्षणिक अनुपस्थिति

बड़ी अखड़ रही थी

क्यों दरक गए थे तुम

इस तरह जिंदा रहने का साहस ही

खो बैठे थे तुम

गूंगे की तरह चुप क्यों हो

कुछ बोलते क्यों नहीं

जीवन के हर वहशी

चोट का जवाब देना है तुम्हें

और इस अधूरे काम को

छोड़ कर जा रहे थे तुम

तुम्ही तो नियंता हो

चलो, अब उठो

जगो, जगो विश्वास

जगो।

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श्रीराजेश

कार्यकारी संपादक, किसान वर्ल्ड विजन

ई-मेल rajesh06sri@gmail.com

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