एस एस पंवार की पांच कविताएं

मेरे शब्द घायल हैं

मेरे शब्द घायल हैं पिछले कई रोज से
मेरे पास नहीं बची
अब कोई भी शुद्धतम कविता
मैं घसीटता हूँ कलम
यूँ ही बस औंधे मुँह लेटकर

मैं प्रलाप लिखता हूँ कभी-कभी
तुम्हारे चले जाने का,
सिसकियाँ लिखता हूँ कभी
जो लेती थी तुम
मेरे सीने पर सर रखकर

मैं रोटी लिखता हूँ आजकल
चाँद-सी गोल रोटी
उन अनाथ बच्चों के नाम
मंदिर के प्रसाद से जिनका पेट नहीं भरता…

मैं ढांढस लिखता हूँ
मेरे दरवाजे की उन मादा चिड़ियाओं के नाम
एक कड़ी साधना के बाद भी
जिनके अंडे
जमीं पर बिखर जाते हैं…

मेरे बहुत से शब्द
लहूलुहान पड़े हैं आजकल
जो लिखना चाहते हैं
सैनिकों की घायल आवाजें
युद्ध के मैदान की चीत्कार, ध्वनियाँ
आग, विस्फोट, बलात्कार…

मगर लिख नहीं पाते,
क्योंकि मेरी पीड़ित कलम
कोई जवां मुद्दा नहीं लिखना चाहती अब
केवल तुम्हें छोड़कर
और मधुर बचपने को छोड़कर

उस करुण दर्द को छोड़कर;
जो अस्तित्व हुआ हो
महज़ गलतफहमियों के पानी से
धराशाई हुआ हो
षड्यंत्र से, जहर से, नाइंसाफी से
कृतघ्नता से, जान-बूझकर किये अन्यायों से

 

ख्याल

हिज़्र की सर्द रातों से उचककर
कुछ कमजोर-सी
उदास रातें
मेरे पुराने गाँव चली जाती हैं कभी-कभी
मैं सहमता हूँ
रुकता हूँ एकदम
देखता हूँ अपने आस-पास,
कुछ डरावने से ख़याल,
पाता हूँ
किसी रिश्ते को हक मांगते हुए,
मिटाते हुए
किसी सिन्दूर की लकीर
अचानक
कुछ आवाजें घेरती हैं मुझे
और सुनाती है संदेश
एक रूह का
एक पिंजर का, एक ज़िस्म का,
एक गीत
सुनता हूँ मैं खुद
तुम्हारी अपनी आवाज में,
ठीक उसी वक्त
सह नहीं पाता मैं वीभत्सता
इस दौर की
टूट जाता हूँ तब मैं
कर लेता हूँ आत्महत्या…
मेरे साथ तब
दफ़्न हो जाते हैं
तुम्हारे साथ बिताए कुछ हसीं दिन
और मुट्ठी-भर
ख़यालों की चादर में लिपटी
उदास रातें,
जो गवाही मांगती रहेंगीं
ता-रोज़े-हश्र
मेरे चरित्रहीन होने की…

दुश्मनी

मेरी दीवाल से सटा पेड़
तुम्हारे आँगन में अमरूद गिराता है
तुम्हारी लताएँ
फूल बिखेर देती है
मेरे ड्राइंगरूम के ठीक सामने
वो कबूतर
जो मेरे छज्जे पर बैठते हैं
तुम्हारे रोशनदानों में
इश्क लड़ा आते हैं पूरे-पूरे दिन
बताओ जरा
हम क्या कर सकते हैं !

वो रशियन औरत

तुम्हारी दीवारों पर लगे
वो रेशमी चित्र
कभी समझ नहीं आए मुझे
जब भी आता हूं
देर तक पढता हूं तुम्हारी तुलिकाएं
पूछता हूं हर कलम से
तुम्हारे हाथों से
उंगलियों से, पोरवों से
कि आखिर किस जगह होता है
गर्भधारण इनका
देखता हूं मुसलसल
दराज़ों में रखी
वो सुनहली रंगीन शीशियां
तुम्हारे कैनवास
एस्ट्रे में पड़े
सिगरेट के टुकड़े
और लौट जाता हूं अक्सर
निःशब्द होकर
सामने की पीली दीवाल पर
स्वतंत्र लटकती
रशिया की वो मजदूर औरत…
बंधुआ मजदूर
उफ्फ्फ…
शायद ही कभी समझ पाऊं
तुम्हारे तमाम चित्र
ठीक तुम्हारी तरह होते हैं ये
सुनहरे, प्रगाढ़, जीवंत
और सम्मोहन भरे
कई मर्तबा दर्शन भरे भी
ठीक एक साथ
कई कहानियां कहते
सुदूर इलाके की
उस गुमनाम औरत की तरह

भंवरा

जब रात गहरा जाती है
रौशनी बुझ जाती है जब, सड़क के उस पार
उदास-निराश छज्जों को चीरकर
रात की रानी* को…
दिन कहने वाली मजबूर रौशनी,

तब तुम्हारी रूह से निकलकर कोई भंवरा
सैर करने लगता है,
भंवरा; जो होता था बाबा की कहानियों में
औ कहता था हर चांदनी में
नित नए राजा की बात…

हाँ, वो सैर करता है
रूह से बाहर की, कथन से बाहर की सैर,
जिसमें नहीं होता है कभी
स्वप्नीला बादशाह,
परियों का नाच या कोई इंद्र का दरबार

वादों के वचन नहीं देता वो कभी
इरादों के, चाहतों के
खुले निमन्त्रण दे आता है सो रही रातों को
ख़ाब में गुदगुदी पैदा करता है वो
जब-जब भी आता है

कभी-कभी तुम्हें दिखा आता है वो
एक नंगी रूह
ना चाहते हुए भी मुहब्बत के ब्रेकेट में
लिख आता है वो
किंकृतव्यविमूढ़-सा ‘ज़िस्म’ शब्द

हाँ, कभी-कभी आता है
बारिश में कबूतरों की मुहब्बत देखकर
इधर-उधर की बातें सुनकर
या फिर बचपन में सुनी
सखियों की बातों को मुकुट पहनाते वक्त

 

 

परिचय-
युवा कवि-कथाकार एस एस पंवार दिल्ली में रहते हैं।  एक टीवी चैनल में भी काम कर चुके हैंष मार्च 2014 में साहित्य अकादमी की ओर से प्रकाशित पत्रिका ‘कथा-समय’ इनकी पहली कहानी ‘अधूरी कहानी’  प्रकाशित हुई थी।

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