सुबोध श्रीवास्तव की पांच कविताएं

आज भी
आज फिर
मचल गया
देहरी पे पांव रखता
नन्हा बच्चा।
एक पल ठिठक कर
कल मिली
पिता की डांट याद करता है
फिर, हौले से पुचकार कर
ज़मीन पे रेंगते
जहरीले कीड़े को-
सूखे पेड़ के सुपुर्द करते हुए
क्लास में
टीचर के पढ़ाए सबक को
कार्यरूप देता है।
बच्चा/कीड़ा/पेड़
तीनों-
एक दूसरे के कोई नहीं
शायद इसीलिए
अब भी सांस ले रही है
मानवता..!
उसे आना ही है…
खोल दो
बंद दरवाजे/ खिड़कियां
मुग्ध न हो/ न हो प्रफुल्लित
जादू जगाते
दीपक के आलोक से।
निकलो
देहरी के उस पार
वंदन-अभिनंदन में
श्वेत अश्वों के रथ पर सवार
नवजात सूर्य के।
वो देखो-
चहचहाने लगे पंछी
सतरंगी हो उठीं दिशाएं
हां, सचमुच
कालिमा के बाद
आना ही है/ उसे
रश्मियां बिखेरकर
आल्हादित करने
विश्व क्षितिज को..!
बंदूकें

 

तुम्हें

भले ही भाती हो

अपने खेतों में खड़ी
बंदूकों की फसल
लेकिन-
मुझे आनन्दित करती है
पीली-पीली सरसों
और/दूर तक लहलहाती
गेहूं की बालियों से उपजता
संगीत।
तुम्हारे बच्चों को
शायद
लोरियों सा सुख भी देती होगी
गोलियों की तड़तड़ाहट
लेकिन/सुनो..
कभी खाली पेट नहीं भरा करतीं
बंदूकें,
सिर्फ कोख उजाड़ती हैं।
वर्षा: एक शब्दचित्र
गली के नुक्कड़ पे
बारिश की रिमझिम के बाद
उस छोर से आती
छोटी सी नदी में
छपाक-छपाक करते
अधनंगे बच्चे,
डगमगाकर आतीं
कागज़ की छोटी-छोटी कश्तियां
पल भर को ताजा कर गईं
स्मृतियां-
घर/बचपन की।
घर और बचपन
दोनों ही पर्यायवाची शब्द हैं
अस्थायित्व के
बचपन-
हमेशा पास नहीं रहता
सरक जाता है घुटनों के बल
जाने कब?
और घर भी
हमेशा ‘घर’ होने का एहसास
नहीं दिलाता
हर किसी को।
उम्मीद का दायरा
जहां खत्म होता है
उम्मीद का दायरा
वहीं से करो/ तुम
इक नई शुरुआत।
याद रखना-
हर शुरुआत
लबरेज़ होती है
ताज़ातरीन उम्मीदों से
जिसमें/ नाउम्मीदी की
कोई गुंजाईश नहीं होती
और
उम्मीद पे
दुनिया कायम है..!
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सुबोध श्रीवास्तव पेशे से पत्रकार हैं।

‘दैनिक भास्कर’, ‘स्वतंत्र भारत’ (कानपुर/लखनऊ) आदि में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य।

रचनाएं देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं,प्रमुख इंटरनेट पत्रिकाओं में प्रकाशित। दूरदर्शन/आकाशवाणी से प्रसारण भी।
प्रकाशित कृतियां:-‘सरहदें’ (काव्य संग्रह),-‘पीढ़ी का दर्द’ (काव्य संग्रह),-‘ईर्ष्या’ (लघुकथा संग्रह), ‘शेरनी मां’ (बाल कथा संग्रह),-‘कविता अनवरत-2’, ‘कानपुर के समकालीन कवि’ सहित कई काव्य संकलनों में रचनाएँ संकलित।
-विशेष: काव्यकृति ‘पीढ़ी का दर्द’ के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत।
-साहित्य/पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘गणेश शंकर विद्यार्थी अतिविशिष्ट सम्मान’।
-कई अन्य संस्थाओं से भी सम्मानित।
संपादन: ‘काव्ययुग’ ई-पत्रिका
संप्रति: ‘आज’ (हिन्दी दैनिक), कानपुर में कार्यरत।
संपर्क: ‘माडर्न विला’,10/518, खलासी लाइन्स, कानपुर (उ.प्र.)-208001, उत्तर प्रदेश (भारत)।

ई-मेल: subodhsrivastava85@yahoo.in

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