सुधा चौरसिया की तीन कविताएं

संस्कार के कीड़े!

जिया तुमने हजारों साल
जिस मिथकीय इतिहास में
रेंगता है खून में
वह तुम्हारे आज भी

निकल नहीं पायी
अभी तक तुम अपने
आदर्श ‘सीता’ के जाल से

बोल लेती हो बहुत
लिख भी लेती हो बहुत
पर झेलती हो अभी तक
उस भीषण आग को

मत भूलो
अभी तक हवा में
तैर रहे हैं पैर तुम्हारे
तुम्हारे पैरों के लिए अभी तक
धरती ठोस नहीं
ना ऊपर कोई आधार है

बस धधकती आग है
या फिर फटी धरती का आगोश……

बुढ़ापा!

बच्चे जब नीड़ से
उड़ जाते हैं
उस समय तक तो
हमारे पंख
हवा से खौफ खाने लग जाते हैं

हमें हमारे कंधों का
दर्द बहुत याद आता है
जब ढ़ोया था उन्हें वर्षों
हमारे कंधों ने

दिशाएँ दिग्भ्रमित
होने जब लगती हैं
हमारी अंगुलियों की जकड़न
हमें बहुत याद आती है
जब चलाया था उन्हें
डगमगाकर गिरने से बचाने को वर्षों

हमारे आँसू को
उनका खिलखिलाना याद आता है
जब हँसाते थे उन्हें
नित नए-नए तरीकों से

जागती है
जब रात भर टिक-टिककर
घड़ियां हमारे साथ
गाकर लोरियाँ
उनको थपथपाना
बहुत याद आता है

हमारा घर!

बंदरों का अखाड़ा बनता
हमारा खपरैल का छप्पर
अगल-बगल के छत पर
ऊँची कूद लगाता
सामंती षड्यंत्र सा

रोयें-रोयें काँप जाते हैं
जब बरसाती घन
यौवन पाते
गरज-गरज कर
धमका-धमका कर
टूट बरसते, हमारे
छितराये छप्परों पर

इधर बाल्टी
उधर कठौता रख
चीजों को विस्थापित करते
रात-दिन सब एक से हो जाते
टप-टप, छप-छप
क्षत-विक्षत घर
सोना, खाना सभी असम्भव

गायन, नृतन, वादन
सभी हमारे घर के अंदर

—–
-सुधा चौरसिया
जमालपुर(बिहार)
7870786842
piyuparitosh@gmail.com

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